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Saturday, July 14, 2018

कभी कभी रो लिया करो


अनंत तक पसरा ये अन्तरिक्ष
उनमें तैरते न जाने कितने सारे सौरमंडल
सबका अलग अलग सूरज
न जाने कितनी आकाशगंगाएं
सबका अलग अलग वजूद 
और फिर
अपनी अपनी तय कक्षा में
परिक्रमा करते ग्रह, उपग्रह
तारे, धूमकेतु सब-सब
लेकिन फिक्स रहता है
उन सब खगोलीय पिंडों के बीच का स्पेस
विस्तार की हक़ीकत को स्वीकारते हुए भी
रखते हैं दूरी, अपने आप
नैसर्गिकता की है न एक ख़ास पहचान !
उपलब्ध कागज़
और धधकते कलम की स्याही
मन की तरंगों से उपजे
अजब गजब ख्याल और
फिर निकल पड़ती है स्याही
नुकीले निब की बीच की दरार से
आड़े तिरछे शब्दों के तले
बनती जाती है कवितायेँ
पर इन सुन्दर कविता के लिए
या कविताओं के कारण भी
तथाकथित शब्दों के योद्धा
नहीं बना पाए वो ख़ास स्पेस
जिसकी उम्मीद के लिए बनी थी कवितायेँ
ये कैसी जद्दोजहद
हर वक़्त आज़ादी की परिधि को छलांगते हुए
होती है मुठभेड़ें !
दरकती है चाहतें
और फिर ख़यालात ने किया है कलुषित मन
तो बस, समझ लीजिये
चारो और
क्रोध और द्वेष का पजल बोर्ड फैला है
चल रहे सभी योद्धा अपनी अपनी चालें
विचारा जा रहा है लाभ-हानि
तिरोहित हो रही हैं मर्यादाएं
ढाई घर के घोड़े के साथ, कुछ ने किया पीछे से वार
तो कुछ के लिए हम जैसे प्यादे हैं
सबसे आगे
शहीद होना मायने रखता है,
हम भी तो हैं न वीर चक्र के मोहताज
याद रखना मठाधीशों
संवेदनाओं के लिए
भारीभरकम शब्दों से भरपूर पंक्तियाँ जरुरी नहीं होती
जरुरी होती है
छीछालेदर और वैमनस्यता से इतर कुछ बूंदें लवण युक्त
जो पलकों के कोर से टपकती है
कभी कभी रो लिया करो
इतना ही कहूँगा .....
कुंठाएं पिघल जायेंगी !
~मुकेश~


इंद्रप्रस्थ भारती में प्रकाशित 

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