Followers

Tuesday, May 23, 2017

स्किपिंग रोप: प्रेम का घेरा





स्किपिंग रोप
कूदते समय रस्सी
ऊपर से उछल कर
पैरों के नीचे से
जाती है निकल 
जगाती है
अजब सनसनाती सिहरन
एक उत्कंठा कि वो घेरा
तना रहे लगातार
एक दो तीन ... सौ, एक सौ एक
इतनी देर लगातार !!
बैलेंस और
लगातार उछाल का मेल
धक् धक् धौंकनी सी भर जाती है ऊर्जा!
जैसे एक कसा हुआ घेरा
गुदाज बाहों का समर्पण
आँखे मूंदें खोये
हम और तुम !!
उफ़, सी-सॉ का झूला
अद्भुत सी फीलिंग
साँसे आई बाहर, और रह गयी बाहर
ऐसे ही झूलते रहा मैं
तुम भी ! चलो न !
फिर से गिनती गिनो, बेशक ...
बस पूरा मत करना !!
काश होती वो रस्सी थामे तुम और
.....और क्या ?
मैं बस आँखे बंद किये बुदबुदाता रहता
एक दो तीन चार पांच...............निन्यानवे ...........एक सौ तेरह ...!!

5 comments:

yashoda Agrawal said...
This comment has been removed by the author.
yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 26 मई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Dhruv Singh said...

आदरणीय ,सुन्दर व विचारणीय रचना, किन्तु मेरे शब्दकोष में शब्द नहीं हैं कि इसकी व्याख्या कर सकूँ ,परन्तु प्रस्तुत रचना पढ़ने का सौभाग्य मिला मेरे जैसे युवा कवि के लिए बहुत हर्ष का विषय है ,आभार। "एकलव्य"

Sudha Devrani said...

बहुत सुन्दर...।

Onkar said...

बहुत बढ़िया