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Friday, January 23, 2015

फैंटेसी


झील के दूसरे छोर पर
दिखी वो, शायद निहार रही थी जलधारा
पर, मैंने देखा, टिकी मेरी नजर
और.... आह !
वो नहाने लगी 
मेरे काल कल्पित झरने में...
मेरी मन्दाकिनी !!
मन ने कहा
चिल्ला कर कहूँ,
सुनो, ए लड़की इधर तो मुड़ो, देखो न !
इश्श्श, मेरी चिल्लाहट
मौन से भरी मेरी आवाज
पल्लू बन कर ढक रही थी
उसका चेहरा, उसका वक्ष !
धत्त !!
दिन ढल रहा था
पर मैं हूँ कि अटक ही गया
झील के उस किनारे पर
टिकी थी, मैं और मेरी परछाई भी
मैं, जितना उसको नजरों से उघाड़ता
पर, मेरी परछाई ने
बना दिया उसके लिए घर
ताकि न पड़े मेरी बदनजर उसपर!!
खैर जाने दो,
उसकी ख़ामोशी, उसका मौन
पता नही क्यूँ?
मुझ में भर रही अलीशा चिनॉय सी
मदभरी, मस्त सुरीली आवाज
थोड़ी ठहरी.. थोड़ी खनकती सी!!
मैं - वो !
झील व फैंटेसी!!
सब ढलने लगी
आखिर शाम हो चुकी थी !!

10 comments:

daisy jaiswal said...

झील और फैंटसी बहुत-सुंदर अभिव्यक्ति

daisy jaiswal said...

झील और फैंटसी बहुत-सुंदर अभिव्यक्ति

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

प्रभात said...

वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।............श्रृंगार युक्त खूबसूरत रचना!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (25-01-2015) को "मुखर होती एक मूक वेदना" (चर्चा-1869) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
बसन्तपञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत सुन्दर फंतासी चित्रण !
वसंत पंचमी

Neeraj Kumar Neer said...

बहुत सुंदर ॥

Onkar said...

सुन्दर प्रस्तुति

Digamber Naswa said...

फंतासी में जहां जाना चाहें पलक झपकते ही जा सकते हैं ...

Aparna Sah said...

श्रृंगार रस में डूबे शब्द ---बहुत अच्छे