Monday, June 21, 2021
सुनहरी बूंद
Thursday, April 15, 2021
सफर
Friday, March 5, 2021
प्रेम की दवा
Friday, February 19, 2021
एडेनियम : रिपोटिंग
एडेनियम के पौधे की रिपोटिंग की तो बस उन क्रिया कलापों को शब्द दिए हैं, बेशक कविता न कहें पर संवेदना तो जुड़ी ही है , है न !!
Friday, January 29, 2021
प्रेम
Friday, November 27, 2020
मोनालिसा
सुनो
सुन भी रही हो
सुनोगी भी
उफ़ सुनो न यार !
मैंने अपने जिंदगी के कैनवास पर
नोकदार डबल-एच पेंसिल से
खिंचा था, सिर्फ एक ही स्कैच
थी बहुत हल्की सी आभासी स्कैच
फिर मेरी दुनिया में तुम आ गयी
तुमने कोशिश की रंग भरने की
शुरूआती दिनों में, स्कैच के आउट लाइन पर
तुम्हारे भरे रंग, नहीं जंच रहे थे
पर जैसे जैसे, बीते दिन, बीती जिंदगी
ब्रश चला, रंग भरते चले गए, सुनहले
और, फिर, वो स्कैच, उसमे दिखने लगा
तुम्हारा अक्स !
बहुत बार, बदरंग सी लगी कैनवास
लगा, नहीं बेहतरीन बन पायी पेंटिंग
न तो कोई शउर, न ही कोई नजाकत
फिर,
मेरे अन्दर के पुरुष चित्रकार का विचलित मन
बनाऊं कुछ दूसरा, फिर से करूँ कुछ अलग कोशिश
पर मिली निराशा,
या तो पेंसिल की ग्रेफाईट टूट गयी
या जिंदगी का कैनवास ही मुड़-तुड गया !
अब अंततः, मुझे वही स्कैच
जो बनाई थी, पहली और अंतिम बार
मेरी लगती है सबसे बेहतरीन व सर्वोत्तम कलाकृति
अनमोल !
सुन रही हो न
अतिम बार कह रहा हूँ
गाँठ बाँध कर याद रखना
किसी ने कहा भी,
चित्रकार
जिंदगी में सर्वोत्तम कलाकृति एक बार ही गढ़ता है
मोनालिसा हर दिन नहीं गढ़ी जाती न !
~मुकेश~
Wednesday, October 21, 2020
प्रेम कविता लिखने की शर्त
प्रेम कविता लिखने की शर्त लगी थी
इस तंज के साथ कि
आज तक मुझ पर नहीं रच पाया कोई
प्रेम कविता !
बिन कहे कुछ
सोचा कि
लिखूं तो क्या लिखूं
होंठ लिखूं या लिखूं गुलाब की गुलाबी पंखुडियां
जो कभी हुआ करते थे प्रेम पत्र के साथ
रुमानियत भरने के लिए
हुआ करता था जो जरूरी
या फिर लिखने से पहले
ताकूं सुरमई आँखों में
हाँ, नजरों में अटकना ही तो है शायद
प्रेम के पहले पग पर ठिठकना
अगर अटका तो खोया
फिसला तो, हमें पता है
कह ही दोगी
ओये लड़के उतनी दूर तक नहीं !
खैर, रहने दी कविता
कर ली अपनी आँखे बंद
और फील करने लगा मुस्कराहट
तभी तो फैले बाहों से इंद्रधनुषी आसमान के साथ
महसूसने लगा तुम्हारी आहट
थे मेरे हाथो में तुम्हारे हाथ
थी स्पर्श की उष्णता
शायद कहीं प्रेम कविता की मांग में था
छिपा हुआ विस्मयकारी प्रेम भी तो
सोचा लिखूं तुम्हारे भरे हुए कंधे
और लिखूं तुम्हारी आवाज सुरीली
तभी आवाज सोचते ही फना होने लगी रूह
धधकने लगा अलिंद और निलय के बीच
बहने वाला रुधिर
टूटती नींद के साथ खिलखिलाते सपने भी तो
तकिये के अगल बगल से चिढाते हुए कह उठे
कवि तुम प्रेम में तो नहीं हो उसके
कब आ चुकी थी निद्रा
कब नींद में भी बहकने लगा था मन
पता चला तब,
जब तकिये में दबाये चेहरे को
करने लगा देह की यात्रा
देह से देह तक
कमनीयता से नज़ाक़त तक
मन से मन तक पहुँचने से पहले
पर, कुछ अजब गजब सोच भी
होती है प्रेम में निहित
किसी ने बताया था कभी
फिर जैसे चुप्पी होती है वाचाल
वैसे ही सोया हुआ जिस्म दौड़ता है अत्यधिक
चलो हो चुकी है अब भोर
फिर कभी लिखूंगा तुम पर
प्रेम और प्रेम कविता
आज तो बस जान लो
कवि के मन की बात कि
खिलखिलाते हुए लोग होते हैं खूबसूरत !
हाँ फिर से कह रहा हूँ
मुझे प्रेम कविता लिखते रहनी हैं
हर नए दिन में नए नए
झंकार था टंकार के साथ !
समझी ना !
~मुकेश~














