जिंदगी की राहें

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Thursday, May 7, 2026

अनायास की यात्रा : जिम कॉर्बेट की ओर


पिछले गुरुवार की साधारण-सी ऑफिस ड्यूटी फाइलों और रूटीन की लय में बहती हुई, करीबन गुजर चुकी थी, शुक्रवार की छुट्टी थी । लेकिन जैसे ही शाम तक पहुंची , समय ने अचानक छोटा-सा ट्विस्ट लिया। चूंकि सामने तीन दिनों की छुट्टियाँ थीं, तो मेरे मित्र सदृश्य 'सर' ने एक सुंदर ऑप्शन दिया बिना किसी खास प्लानिंग के, एकदम स्पॉन्टेनियस-सा प्लान : जिम कॉर्बेट जाने का।

सब कुछ इतना फास्ट-फॉरवर्ड में हुआ कि अंजू से डिस्कस तक नहीं कर पाया। सुबह होते-होते हम व अंजू, मेरे मित्र सदृश्य बॉस अपनी फैमिली के साथ, कॉर्बेट के लिए निकल पड़े। यह सफर अनप्लांड जरूर था, लेकिन हर मोड़ पर इतनी खूबसूरती से खुलता गया कि लगा जैसे सब कुछ परफेक्टली प्लान्ड हो।

ढाई सौ किलोमीटर से ज्यादा की दूरी, बढ़िया सड़क, कम्फर्टेबल ड्राइव, और साथ में बेहद वॉर्म कंपनी के साथ तीन दिन कट गए। ड्राइवर की सहजता और गाड़ी की गति ने सफर को एफर्टलेस बना दिया। रास्ते में लंच लेते हुए हम अपने डेस्टिनेशन की ओर बढ़ते रहे, और टस्कर रिसोर्ट पहुँचते ही वहां की खूबसूरती व सुविधाओं से जैसे सारी थकान पीछे छूट गई।

कुछ घंटों के रेस्ट के बाद, शाम ने एक नया आमंत्रण दिया। ड्राइवर ने कहा, चलिये, एक मंदिर घुमा लाते हैं। करीब 15 किलोमीटर दूर, कोसी नदी के बीचों-बीच, एक छोटी-सी पहाड़ी पर बसा गर्जिया मंदिर, अपनी सादगी में अनोखा था । निर्माण कार्य चल रहा था, फिर भी उस जगह की स्पिरिचुअल आभा जस की तस थी। मंदिर कुछ ऐसा जैसे जैसे जल और शिला के बीच संतुलन साधे खड़ा हो। नदी की पतली, ठंडी, कल-कल करती धार मन के भीतर तक उतरती चली गई। लौटते-लौटते रात हो गई, और डिनर के साथ दिन ने सुकून से खुद को समेट लिया।

अगली सुबह अपने साथ एक नई उम्मीद लेकर आई। सर ने पहले ही कहा था कि कैंची धाम भी चलेंगे, लेकिन दूरी और समय देखकर प्लान कैंसिल हो गया था। पर रात में ड्राइवर ने सहजता से कहा, अगर सुबह छह बजे निकलें, तो नैनीताल के साथ कैंची धाम भी कवर हो जाएगा। नेकी और पूछ जैसी बात थी !

सुबह साढ़े छह बजे हम तैयार थे। पहाड़ों के बीच घुमावदार रास्ते, बीच-बीच में चाय, परांठे और कुछ कैमरा क्लिक्स 🙂 ने समय बिता दिया । हर मोड़ पर प्रकृति अपना नया फ्रेम खोल रहा था। लेकिन भवाली पहुँचते ही एक परेशानी सामने था, आगे गाड़ी जाना अलाउड नहीं था। भीड़ इतनी कि शटल से ही जाना संभव था, और शटल मिलना इम्पॉसिबल लगा । अपनी इनोवा पार्किंग में लग गईं लेकिन कुछ मिल ही नहीं रहा था, दूरी करीबन ग्यारह किमी थी ।



हमने रिटर्न का मन बना लिया था, तभी जैसे बाबा की अनदेखी कृपा ने साथ दिया, एक शटल अचानक सामने आकर रुक गई, और उसमें हमारे लिए जगह भी मिल गई। आगे बढ़े तो एक किलोमीटर पहले ही जाम। इस बार हमने पैदल चलने का निर्णय लिया। पहाड़ों की ढलानों से उतरते हुए, हल्की थकान और गहरी उत्सुकता के साथ हम कैंची धाम पहुँचे।

कैंची धाम, जहाँ नीम करोली बाबा की उपस्थिति आज भी महसूस होती है। 1964 में स्थापित यह स्थान, अपनी शांति और नैचुरल ब्यूटी के लिए जाना जाता है। कहते हैं कि Steve Jobs और Mark Zuckerberg भी यहाँ आ चुके हैं। हमने शांत मन से दर्शन किए और लौटते समय भीतर एक अजीब-सी फीलिंग्स महसूस हुई।

अब नैनीताल जाना था पर नई दिक्कत, भीड़ के कारण रास्ता बंद था । मूड थोड़ा ऑफ हुआ। लेकिन शायद यह यात्रा सिर्फ प्लान्स की नहीं, कृपा की भी थी। उसी रास्ते से हनुमान गढ़ी जाने की अनुमति मिल गई, शर्त बस इतनी कि दर्शन करके लौटेंगे, सिर्फ तीन किमी दूर मॉल रोड नहीं जाना है।

हमने हनुमान गढ़ी में दर्शन किए, और फिर जैसे कोई अदृश्य परमिशन मिल गई, हम मॉल रोड पहुँच गए। वहाँ की हलचल, झील की चमक, बोटिंग की धीमी लय, सब कुछ उस पल को जीवंत बना रहा था। लंच, थोड़ी घुमाई, और झील में बोटिंग, दिन अपने शिखर पर था। हल्की बूंदाबाँदी शुरू हो चुकी थी। लौट कर सोने की प्लानिंग शुरू हो गईं।

उधर हमारे ड्राइवर साब ने अगले दिन की जंगल सफारी भी बुक कर दी थी। जिसका कन्फर्मेशन आ गया था।



अगले दिन, सुबह साढ़े पाँच बजे पहुंचना, ठंडी हवा, रात की बारिश का असर, और ओपन जीप में बैठने की चुनौती 🙂 साथ आई । जंगल की खामोशी में हमारी जीप तेजी से आगे बढ़ रही थी। ठंड जैसे हड्डियों तक उतर रही थी, लेकिन आँखें शेर, बाघ या हाथी की तलाश में दूर तक टिकी थीं। हमारे साथ छोटा हीरो बायनोकुलर लेकर हर झाड़ी में कुछ ढूँढ़ रहा था।

पर उस दिन जंगल अपने रहस्यों को समेटे रहा, एक चूहा तक न दिखा। फिर भी, उस नैचुरल जंगल ने जो ताज़ी हवा हमारे भीतर भरी, वह किसी भी साइटिंग से कम नहीं थी। करीब दस बजे हम लौटे, रिसोर्ट का नाश्ता इंतज़ार कर रहा था।

दोपहर साढ़े बारह बजे चेकआउट, और फिर वही रास्ते लेकिन इस बार मन में यादों का एक पूरा एल्बम था। रात आठ बजे हम अपने-अपने घरों में थे, बेशक थके हुए, लेकिन भीतर से भरे हुए।



यह यात्रा सिखा गई कि हर प्लान का परफेक्ट होना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी अनप्लांड मोमेंट्स ही जिंदगी के सबसे खूबसूरत चैप्टर्स बन जाते हैं, जहाँ इटिनरेरी से ज्यादा, एहसास मायने रखते हैं… और जहाँ रास्ते खुद तय करते हैं कि हमें कहाँ पहुँचना है। 🥰

- मुकेश कुमार सिन्हा

Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दिनों में उम्मीद

बेशक

मिसाइलों की आवाज़

सिर्फ खबर नहीं,

नींद के बीच

काँपते हुआ एक डर है

मानवता के नाम पर...


ड्रोन की भनभनाहट

जैसे सिरहाने मंडराती बेचैनी,

और फाइटर प्लेन

दिल की धड़कनों पर

तेज़ उड़ान भरते हुए।

क्रेश करती प्रतीत होती है 


रात जो 

चीखों की रिपीट टेलीकास्ट है,

तभी तो अंततः 

टीवी बंद करना होता है 

पर दृश्य

अंदर कहीं चलते रहते हैं।


मन पूछता है

क्या सच में हम इतने बेबस हैं?

शायद, हमारे भीतर का मनुष्य

धीरे-धीरे म्यूट हो रहा है,


पर फिर,

एक छोटी-सी, 

शर्मिंदगी से भीगी उम्मीद

कहती है 

कि स्ट्रैट ऑफ़ होरमुज़ से

हमारे हिस्से के 

तेल-गैस के जहाज़

सही-सलामत आ जाएँ…


जैसे

ज़िंदगी अब बस

सप्लाई चेन पर टिकी हो।



Tuesday, January 6, 2026

Happy Birthday Rishabh ...

 


बुढ़ाते जीवन की थाती में

सबसे अमूल्य वही है,
पापा के रूप में
जिया गया
बेटे का बचपन।

वो छोटे-छोटे कथन
जो ऑफिस से लौटते हुए
सुनने पड़ते थे,
अब समझ आता है,
वही थे
सबसे खास, सबसे अहम्।

“पापा, पता है
आज मैम ने पूरे क्लास पर
नज़र रखने को कहा।”

“पापा, आज तो गज़ब ही हो गया—
मैडम ने सिर्फ मुझे कहा
Good Boy।”

“देखो पापा,
स्टार मार्क -
सिर्फ मुझे!”

“साइंस में सबसे ज़्यादा नंबर,
जूनियर सेक्शन का
Best Student प्राइज,
और पापा,
Astronomy Olympiad में Gold,
Maths में Silver!”

“पापा,
अंग्रेज़ी में Poem भी लिख ली है मैंने ।”

हर दिन
ऐसे ही, खुश होने लायक
ख़बरों के कतरन लेकर
साहबज़ादा करता रहा इंतज़ार,
और हमारा चेहरा
उसी की चमक से
दमकता रहा।

इनके बचपन को
हमने यूँ ही सहेजा।

वो दिन भी देखे
जब हम पापा-मम्मी
ऑफिस में होते,
और साहबज़ादा
दिन भर
टीवी से चिपका रहता।

पर मूड और ज़रूरत पड़े तो
छोटी उम्र से ही
देर रात क्या,
पूरी रात
किताबों में
फोड़ देता था कपार

ऐसे ही रहे ये हर समय।
अब हो गए हैं बड़े
पापा के साथ
रहती है गम्भीर-सी दूरी,
पर हाँ
बेतक़ल्लुफ़ बॉन्डिंग
अब भी है अम्मा के साथ

समय के साथ
साहब फोकस्ड हुए,
रही इनकी बस एक चाहत
हमने भी मन में सहेज रखी थी
कि IIT की
एडमिशन लिस्ट में
नाम हो इनका।

पूरी-पूरी रात
इनका पढ़ना
भी झेला है हमने ।
ख़ैर, भागते वक्त के साथ
IIT Engineer,
अब नौकरी में हैं।

इंतज़ार रहता है
इनके आने का,
पर समय और
Engagement का
बहाना
आ ही जाता है अक्सर

फिर भी
एक Parent के रूप में
हम हर समय
ख़ुश ही रहे हैं।

एक वक़्त था
जब मन कहता
कुछ भी कर लूँ
इनकी उम्मीदें
पूरी कर पाऊँ।
अब बस
इतनी-सी रह गई है
हमारी उम्मीद।
कि इनकी उम्मीद पर हम
बन पायें best ... !

बदलती उम्मीदों की नाव में
बहते जा रहे हैं हम
इसलिए
ख़ुशियों की दस्तक का
इंतज़ार बना रहता है।

वो दिन थे
जब हमारे आने से
पापा मुस्कुराते थे,
अब हम
उस इंतज़ार में रहते हैं

बच्चों के होने से ही
घर की खिड़कियाँ
खुलती हैं।

और जब
ख़ुशियों से भरी स्मृतियाँ
पंक्तिबद्ध हो जाती हैं,
तो बन जाती है
एक अनमोल कविता।

Happy Birthday, ऋषभ!