जिंदगी की राहें

जिंदगी की राहें

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Friday, December 27, 2019

असर


ज़ीरो डिग्री पर जम जाना
रूम टेम्परेचर पर पिघल जाना
सौ पर खौलने लगना
तापमान का ये प्रतिकारक असर
परिवर्तित होता रहता है 
स्थिति के अनुरूप
लेकिन
स्नेह कि
अजब-गजब अनुभूति
रहने नहीं देता एक सा तापमान
एक हलकी सी स्मित मुस्कान
और फिर
भरभरा कर गुस्स्से से चूर व्यक्ति
टप से बहा देता है नदी
या फिर कुछ ठंडे बर्फ से एहसास
पिघल ही जाते हैं
एक हल्के से
प्यारे स्नेहिल स्पर्श से ...
~मुकेश~

Tuesday, December 3, 2019

खून का दबाव व मिठास


जी रहे हैं या यूँ कहें कि जी रहे थे
ढेरों परेशानियों संग
थी कुछ खुशियाँ भी हमारे हिस्से
जिनको सतरंगी नजरों के साथ
हमने महसूस कर
बिखेरी खिलखिलाहटें
कुछ अहमियत रखते अपनों के लिए
हम चमकती बिंदिया ही रहे
उनके चौड़े माथे की
इन्ही बीतते हुए समयों में
कुछ खूबियाँ ढूंढ कर सहेजी भी
कभी-कभी गुनगुनाते हुए
ढेरों कामों को निपटाया
तो, डायरियों में
कुछ आड़े-तिरछे शब्दों को जमा कर
लिख डाली थी कई सारी कवितायेँ
जिंदगी चली जा रही थी
चले जा रहे थे हम भी
सफ़र-हमसफ़र के छाँव तले
पर तभी
जिंदगी अपने कार्यकुशलता के दवाब तले
कब कुलबुलाने लगी
कब रक्तवाहिनियों में बहते रक्त ने
दीवारों पर डाला दबाव
अंदाजा तक नहीं लगा
इन्ही कुछ समयों में
हुआ कुछ अलग सा परिवर्तन
क्योंकि
ताजिंदगी अपने मीठे स्वाभाव के लिए जाने गए
पर शायद अपने मीठे स्वाभाव को
पता नहीं कब
बहा दिया अपने ही धमनियों में
और वहां भी बहने लगी मिठास
दौड़ने लगी चीटियाँ रक्त के साथ
अंततः
फिर एक रोज
बैठे थे हरे केबिन में
स्टेथोस्कोप के साथ मुस्कुराते हुए
डॉक्टर ने
स्फाइगनोमैनोमीटर पर नजर अटकाए हुए
कर दी घोषणा कि
बढ़ा है ब्लड प्रेशर
बढ़ गयी है मिठास आपके रक्त में
और पर्ची का बांया कोना
135/105 के साथ बढे हुए
पीपी फास्टिंग के साथ चिढ़ा रहा था हमें
बदल चुकी ज़िन्दगी में
ढेर सारी आशंकाओं के साथ प्राथमिकताएँ भी
पीड़ा और खौफ़ की पुड़िया
चुपके से बंधी मुट्ठी के बीच
उंगलियों की झिर्रियों से लगी झांकने
डॉक्टर की हिदायतें व
परहेज़ की लंबी फेहरिस्त
मानो जीवन का नया सूत्र थमा
हाथ पकड़ उजाले में ले जा रही
माथे पर पसीने के बूँद
पसीजे हाथों से सहेजे
आहिस्ता से पर्स के अंदर वाली तह में दबा
इनडेपामाइड और एमिकोलन की पत्तियों से
हवा दी अपने चेहरे को
फिर होंठो के कोनों से
मुस्कुराते हुए अपने से अपनों को देखा
और धीरे से कहा
बस इतना आश्वस्त करो
गर मुस्कुराते हुए हमें झेलो
तो झेल लेंगे इन
बेवजह के दुश्मनों को भी
जो दोस्त बन बैठे हैं
देख लेना, अगले सप्ताह
जब निकलेगा रक्त उंगली के पोर से
तो उनमे नहीं होगी
मिठास
और न ही
माथे पर छमकेगा पसीना
रक्तचाप की वजह से
अब सारा गुस्सा
पीड़ाएँ हो जायेंगी धाराशायी
बस हौले से हथेली को
दबा कर कह देना
'आल इज वेल'
और फिर हम डूब जाएंगे
अपनी मुस्कुराहटों संग
अपनी ही खास दुनिया में
आखिर इतना तो सच है न कि
बीपी शुगर से
ज्यादा अहमियत रखतें हैं हम
मानते हो न ऐसा !!
~मुकेश~

Monday, November 11, 2019

ब्यूटी लाइज इन द आइज ऑफ द बीहोल्डर


हो बेहद खूबसूरत
इतना ही तो कहा था
कि बोल उठी
लजाती भोर सी
हल्की गुलाबी स्नेहिल प्रकाश के साथ
रंग बिखेरती हुई
- ब्यूटी लाइज इन द आइज ऑफ द बीहोल्डर
तत्क्षण
आंखों की पुतलियों संग
छमकते प्रदीप्त काली चकमक संगमरमर सी
कोर्निया और रेटिना के मध्य
लहरा उठा सारा संसार
कहाँ तक निहारूं ?
हो सकता है,
खूबसूरती की वजह थी
निकटता का अक्षुण्ण एहसास
या फिर
आखों के उस
गहरे लहराते संसार में
प्रेम का चप्पू थामे
डूबता उतराते महसूस रहा था
भीग चुके मन के अन्दर की नमी को
या पता नहीं
थी एक अलग तरह की उष्णता
उसके पास आने के वजह से
दूसरों के आवाजाही से इतर
प्रेम के रौशनदान सरीखे
उसके आँखों में ही
सिमटते हुए
चाह रहा था समझना कि
क्यों न एक सपनों का घोंसला हो
इन पलकों के भीतर
और बरौनियों का झीना पर्दा रहे हरसमय
ताकि प्रेम के आगोश का सुख
ताकते हुए ले सके चुपचाप
निहारने का सुख
निकटता के भाव को नवीनीकृत करने का
एक तर्कसंगत युक्ति भर ही तो है
.... है न !!!
~मुकेश~
साहित्य आज तक 2019 में कविता पढ़ते हुए

Monday, September 30, 2019

प्रेमसिक्त धड़कन



तेज धड़कनों का सच
समय के साथ बदल जाता है

कभी देखते ही
या स्पर्श भर से
स्वमेव तेज रुधिर धार
बता देती थी
हृदय के अलिंद निलय के बीच
लाल-श्वेत रक्त कोशिकाएं भी
करने लगती थी प्रेमालाप
वजह होती थीं 'तुम'


इन दिनों उम्र के साथ
धड़कनों ने फिर से
शुरू की है तेज़ी दिखानी
वजह बेशक
दिल द मामला है
जहाँ कभी बसती थी 'तुम'

तुम और तुम्हारा स्पर्श
उन दिनों
कोलेस्ट्रॉल पिघला देते थे
शायद!
पर, इन दिनों उसी कोलेस्ट्रॉल ने
दिल के कुछ नसों के भीतर
बसा लिया है डेरा
बढ़ा दिया करती हैं धड़कनें
ख़ाम्ख़्वाह!

मेडिकल रिपोर्ट्स
बता रही हैं
करवानी ही होगी
एंजियोप्लास्टी
आखिर तुम व तुम्हारा स्पर्श
सम्भव भी तो नहीं है

Friday, September 6, 2019

जिंदगी का ओवेरडोज़


बचपन में थी चाहतें कि
बनना है क्रिकेटर
मम्मी ने कहा बैट के लिए नहीं हैं पैसे
तो अंदर से आई आवाज ने भी कहा
नहीं है तुममे वो क्रिकेटर वाली बात
वहीं दोस्तों ने कहा
तेरी हैंडराइटिंग अच्छी है
तू स्कोरर बन
और बस
इन सबसे इतर
फिर बड़ा हो गया
जिंदगी कैसे बदल जाती है न
सुर चढ़ा बनूंगा कवि, है न सबसे आसान
पर
हिंदी की बिंदी तक तो लगाने आती नहीं
फिर भी घालमेल करने लगे शब्दों से
भूगोल में विज्ञान का
प्रेम में रसायन का
गणित के सूत्रों से रिश्ते का
रोजमर्रा के छुए अनछुए पहलुओं का
स्वाद चखने और चखाने की
तभी किसी मित्र जैसे, ने मारा तंज़
कभी व्याकरण पढ़ लो पहले
तुकबंदी मास्टर
पर होना क्या था
मृत पड़े ज्वालामुखी से रिसने लगी
श्वेत रुधिर की कुछ बूँदें
जो सूख कर
हो गई रक्ताभ,
खैर न बन पाये तथाकथित कवि
बदलती जिंदगी कहाँ कुछ बनने देता है
कभी दिल से रही करीब, एक खूबसूरत ने
कहा, रहो तुम अपने मूल आधार से करीब
यही अलग करती है तुमको, सबसे
दिमाग का भोलापन ऐसा कि
स्नेह से सिक्त उसके माथे से चुहचुहाती बूंद के
प्रिज़्मीय अपवर्तन में खोते हुए
की कोशिश ध्यान की
की कोशिश मूलाधार चक्र को जागृत करने की
अजब गज़ब पहल करने की ये कोशिश कि
कोशिकाओं की माइटोकॉन्ड्रिया
जो कहलाती है पावर हाउस,
ने लगा दी आग
तन बदन में
जिंदगी फिर भी कहकहे लगाती हुई खुद से कहती है
क्या कहूँ अब जिंदगी झंड ही होती रही
फिर भी बना रहा है घमंड
आखिर खुशियों का ओवेरडोज़
दर्द भरी आंखो मे कैसे बहता होगा
पर बहाव ओवरडोज़ का हो या भावो के अपचन का
लेकिन इंद्रधनुष देखने को भीगापन तो चाहिए ही।
है न।

Wednesday, September 4, 2019

जन्मदिन


जब सैंतालीस,
धप्पा करते हुए बोले अड़तालीस को
जी ले तू भी उम्मीदों भरा साल
है भविष्य के गर्त में कुछ फूल
जो बींधेंगे उंगलियों को
क्योंकि है ढेरों काटें भरे तने
तब तुम सब हैप्पी बड्डे कहना।
जब सैंतालीस
करे याद छियालीस की झप्पी को
जो सर्द निगाहों से ताक कर
नम हो चुकी आवाज में
पिछले बरस थी, बोली
स्नेह पापा का भी समेटो
बरस भर ही तो हुआ
जब गए थे पप्पा इसी दिन
बेशक मम्मी के फोन पर झिझक कर
थैंक यू कह लेना
पर तुम सब मुझे हैप्पी बड्डे कहना
जब सैंतालीस
के सपने में
पैंतालीस ने सिसकते हुए
पापा की जलती चिता की गर्मी को महसूसा
जिसने नम आंखों से था देखा
ऊष्मा में आशीर्वाद
समय बीत गया अब तो
सुनो तुम सब हैप्पी बड्डे जरूर कहना।
जब सैंतालीस
आने वाले उनचास और
फिर खिलखिलाते पचास को
आसमां के सितारों में ढूंढे
और जाते जाते कह दे मुस्कुरा कर
बेशक मर जाना, पर मुक्कू तुम न बदलना
तुम, तुम्हारा बचपना
तुम्हारी सुनहरी छवियां जो अब बता रही उम्र
फिर भी ख़ुश ही रहना
इसलिए मैं खुद कह रहा हूँ
तुम सब, सब सब
हैप्पी बड्डे जरूर कहना।
कहोगे न।
~मुकेश~

Wednesday, August 7, 2019

सावन-भादों

ब्लॉगर ऑफ द इयर के उपविजेता का अवार्ड 

तुम्हारी अनुपस्थिति में
है न,
सावन-भादो
बादल

बारिश
बूँदें !
पर,
हर जगह
चमकती-खनकती
तस्वीर
सिर्फ तुम्हारी !
पारदर्शी हो गयी हो क्या?
या
अपवर्तन के बाद
परावर्तित किरणों के समूह सी
ढ़ल जाती हो
तुम !!
बूँद और तुम
दोनों में
शायद है न
प्रिज्मीय गुण !!
तभी तो चमकती हो
छमकती भी हो
चमकते ही रहना
तुम !!



💝