जिंदगी की राहें

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Wednesday, April 6, 2022

हुकूमत



रात
नींद
सपने
बिस्तर
देह
और आराम
फिर
इन सबका घाल मेल
और इनके बीच
घुसपैठ करती तुम
ऐसे कोई कहता है क्या कि
मुझ पर कविता लिखना
हर जगह तो दिखाती हो हुकूमत
रात की चंदा
नींद के सपने
सपने की नायिका
बिस्तर की सिलवटें
देह की सिहरन
और, और आराम की खूबसूरत खलल बनकर
क्यों पहुंचती हो इस हद तक
कि कविता पहुंचें
हदों के पार
खैर, मानोगी थोड़ी
नींद के साथ, नींद से पहले भी
आया ही करोगी तुम
वजह बेवजह।
आती रहना !
... है न!
~मुकेश~


Sunday, February 27, 2022

बारूद और प्रेम


जब हवाओं में
हो बारूद की गमक
उस समय सबसे जरूरी होती हैं
कि लिखी या पढ़ी जाएं
प्रेम कविताएँ।

ताकि 
बारूद के प्रयोग की आशंका
हो सके निर्मूल
प्रेमिल एहसासों से पगे
प्रेम पत्र बदल जाएं
संधियों के दस्तावेज़ में ।

प्रेम भी बेशक युद्ध ही है
पर इन गुलाबी युद्धों में
सेनापतियों पर बरसती हैं
गुलाबी पंखुड़ियां । 
ऐसे में बाणों को 
इश्क़ के इत्र से डुबो कर
छोड़ी जाती हैं बिन कहे,
गर लगे तो प्रेम सफल।

और न हुए सफल तो भी
मुस्कुराहटों के बादल ही संघनित होंगे।
...है न!

~मुकेश~



Thursday, February 3, 2022

मन्नत का धागा



कभी निहारना
मेरे घर से तुम्हारे घर तक
पहुंचने वाले रास्ते को
रास्ते में है एक पेड़
पेड़ पर बंधा मिलेगा
मन्नत का धागा
धागे का ललछौं रोली सा रंग
है रंग मेरे प्रेम का
बेशक जिंदगियां जी रही हैं
कठिनतम दौर में
विषाणु तैर रहे हवाओं में
फिर भी, लॉकडाउन के गलियारे में
जब भी चाहो मेरी उपस्थिति
बांध लेना उसी मौली को
कह देना धीमे से
"लव यू" - संस्कृत में
शायद प्रेम में बहती ये आवाज
शिवाले से आती
ॐ की प्रतिध्वनि सी हो
जो प्रस्फुटित हो
धतूरे के खिलने से
या आक के फूल के
बैगनी रंग में लिपटे अहसास तले
जिस कारण
शायद शिवलिंग से
छिटके एक बेलपत्र
जिस के तीन पत्तों में से
एक पर हो मेरा नाम
बाकी दो है न सिर्फ तुम्हारे खातिर
आखिर
तभी तो महसूस पाता हूँ कि
तुम चंदा सी छमकती हो
जटाओं के बाएं उपरले सिरे पर
मेरे चंदा
कल फिर उसी रास्ते से जाते हुए
तुम्हारे घर की सांकल को
हल्के तीन आवाज से बता दूंगा
कि हूँ तुम्हारे इर्द गिर्द
बेशक दूर-दूर पास-पास
के इस खेल में
समझते रहना
तुम प्रेम में हो, और मैं
मैं तो प्रेम समझता ही नहीं।
समझी न ! बकलोल !!
~मुकेश~


Monday, January 10, 2022

... है न !

पहली कविता जब रश्मि दीदी केव वजह से एक साझा संग्रह में प्रकाशित हुई थी और उस अधपके प्रेम को इमरोज के हाथों विमोचित होते देखा था पर तब ये तक न पता था कि इमरोज़ क्यों पहचाने जाते हैं । यानी मैं ये इसलिए बताना चाहता हूँ कि पता चले उमर से इतर मेरा साहित्यिक सफर बेहद छोटा है । 😊

मैं मन से, वो नादान बालक जैसा हूँ जो हर बार कुछ भी नया कर पाने पर, पीठ पर स्नेह की थाप महसूसना चाहता है । ☺️ तभी तो जब पिछले दिनों अमिताभ बच्चन ने "है न" ट्वीट किया, तो मैंने सहेज लिया 😊

पहला कविता संग्रह "हमिंग बर्ड" हिन्द युग्म से ही प्रकाशित हुआ और उस समय दोस्तों ने उसे हाथों हाथ लिया । उस संग्रह से इतनी भर खुशी मिली कि 800 प्रतियों का पहला संस्करण खत्म होने के बाद, दूसरे संस्करण को छापा गया। 😊

इसके बाद "लाल फ्रॉक वाली लड़की" छोटी सी लप्रेक संग्रह को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया। डरते-डरते, जिसका प्रकाशन हुआ, उसको सराहना के शब्दों का अंबार मिला। ये कहना बेशक अतिशयोक्ति होगी पर ये सच है कि उन दिनों जारी बेस्ट सेलर लिस्ट्स में कइयों से बिक्री में ऊपर थी ये चहकती लड़की वाली किताब। अंततः नव भारत टाइम्स ने वर्ष की लिस्ट में इसको दर्ज भी किया 😊

तो करीबन तेरह वर्षों से कविताएँ लिख रहा हूँ और तीसरी किताब के प्रकाशन की बाट जोह रहा हूँ। सोचा था पुस्तक मेले में इसकी चहचहाट को सँजोउंगा । पर ऐसा लगता है जैसे समय ने सब कुछ को स्टेचू कह रखा हो । 😊

तो तकिया कलाम जैसे शब्द "... है न !"  मेरे कविताओं में बराबर आते हैं, उसे ही शीर्षक बना कर हिन्द युग्म नया संग्रह ला रहा है। कवरपेज की पेंटिंग मित्र डॉ. अंजना टण्डन ने बनाई है, जो स्वयं में वरिष्ठ और समर्थ कवयित्री हैं । उनका स्नेह मेरे लिए आशीष जैसा ही है 😊

फिर से बता रहा हूँ, मेरी कविताओं में प्रेम होता है, होता है विज्ञान - भूगोल आदि आदि। और साथ मे होते हैं रिश्ते, स्नेह व प्यार।  कवर को मेरे छोटे भाई से मित्र दिव्य ने देखते ही कहा - मैं देख पा रहा हूँ कि इस बार लाल फ्रॉक वाली लड़की बड़ी (mature) हो गयी है और हमिंग बर्ड पेड़ पर, अपने और साथियों के साथ आ गयी है (सामाजिक हो गयी है)। ... है न! 😊

तो
सपनों की सरजमीं है ये
और फिर, जिस पर
उम्मीदों का चद्दर ओढें
अहसासों के तकिये पर
लेटा हूँ मुंह ओंधे

बस इतना करना
मेरे बाएं काँधे पर हौले से थपकी देकर कहना
उम्मीदों की लकीरें चेहरे पर बेशक ज्यादा हैं
फिर भी, लिखते रहना
पढ़ेंगे हम ।

... है न !    #है_न । 😊💝




Monday, December 13, 2021

क्षणिका (खर्राटा)

1.

खर्राटा
वो फड़फड़ाती प्रेम कविता है
जिसको सुनाते हुए प्रेमी सुख का गोता लगता है
जिसको सुनते हुए माशूका
दर्द में होती है
2.
खर्राटा
है आवाज़ की तरंगित वेवलेंग्थ
जिसमें घटते-बढ़ते आयामों के साथ
ख़ुद की नींद पक्की करते हुए
साथ वाले की नींद को तोड़ने की
कोशिश मात्र होती है
3.
खर्राटा
है एक के लिए नींद का ऑक्सीजन
जो साथ वाले के लिए
बन जाता है
कार्बन-डॉय-ऑक्साइड का सबब।
~मुकेश~



Wednesday, October 6, 2021

लखनवी प्रेम



मेरा प्रेम
था अलिंद के बाएं कोने पर
ऐसा रिक्त स्थान
जहाँ हमने सहेजी
सिर्फ व सिर्फ तुम्हारी मुस्कान
परत दर परत
चिहुंकती चौंकती खिलखिलाती
तो कभी मौन स्मित मुस्कान

ओ मेरे प्रेम
हो अगर इजाजत तो
बस, बहक कर कह दूं
क्यों लगती हो इतनी सुंदर
क्यों डिम्पल बनते गालों पर
छितरा जाती हैं लटें
जैसे गोमती ने बदला हो बहने का रास्ता
क्यों खो जाता हूँ
इन मुस्कानों के भूलभुलैया में,
इमामबाड़े सी हो गयी हो तुम
और मैं एक बेवकूफ पर्यटक
बिना गाइड के, खोया हुआ
तसल्लीबख़्स घूम रहा
हाँ पहुंच ही जाऊंगा अंततः
क्यों होना परेशान

जुल्फों का झटकना ऐसे
जैसे हो उसमें भी
नफासत से भरा लखनवी अंदाज
चिकन के कुर्ते सा
झक्क चमकता हुआ चेहरा
जिस पर थीं कुछ लकीरे
महीन कारीगरी थी बनानेवाले की।
सच में
कहूँ या न कहूँ
तुम्हारी मुस्कुराहटें मेरी हैरानियाँ,
तुम्हारी नादानियाँ मेरी गुस्ताखियाँ,
बिना इजाजत करती रहती है अठखेलियाँ
कहीं नबाबों वाली नबाबी तो नहीं?
~मुकेश~


Tuesday, September 14, 2021

ब्लॉग पर करीबन नौ लाख (9,00,000) पेज-व्यू

हिंदी दिवस के अवसर पर ख़ुश होने के लिए एक बहाना भर ही तो है मेरा ब्लॉग !!! 

ब्लॉग 'जिंदगी की राहें' मेरे लिए हर समय अदम्य जिजीविषा जैसी अनुभूति भरता है, इसकी बातें मेरे लिए हर समय एक नई शुरुआत सी लगती है। लगता है जैसे कहीं तो एक पहचान के काबिल हिस्सा है मेरे लिए भी । कुछ एडिटेड रिपोस्ट आंकड़ों और भावों को भी एडिट करते रहते हैं 😊

बात 2008 की थी, उन दिनों ऑरकुट का जमाना था, तभी एक नई बात पता चली थी कि "ब्लोगस्पॉट" गूगल द्वारा बनाया गया एक अलग इजाद है, जिसके माध्यम से आप अपनी बात रख सकते हैं और वो आपका अपना होगा | जैसे आज भी कोई नया एप देखते ही डाउनलोड कर लेता हूँ, तो  कुछ वैसा ही ब्लॉग बनाना था।  रश्मि दीदी ने बताया था ब्लॉग भी गूगल की एक फेसिलिटी है जो एक तरह से इंटरनेटीय डायरी सी है। पहली पाठक भी वही थी।

ये सच्चाई है कि ब्लॉग के वजह से ही हिंदी से करीबी बढ़ी, टूटे फूटे शब्दों में अपनी अभिव्यक्ति को आप सबके सामने रखने लगे। ये भी सच है पर कि इन दिनों ब्लॉग पर जाना कम हो गया है, फेसबुक पर संवाद ब्लॉग के तुलना में थोडा श्रेयस्कर है। पर, आज भी मेरा लिखा सब कुछ ब्लॉग पर देर सवेर पोस्ट होता है, बेशक हर रचनाकार के तरह उनको कागज़ पर प्रकाशित होना देखना चाहता हूँ ! पर मेरा ब्लॉग मेरे साहित्यिक जीवन की अमूल्य थाती है। slow and steady के सिद्धांत पर रहा हूँ ! ब्लॉग पर बेशक पोस्ट करने में अंतराल लम्बा रहता है लेकिन कोशिश रहती है अपडेट बराबर होती रहे !  स्मृतियों में कुछ चटख रंग ढूँढने की कोशिश करूँ तो उनमें कुछ रंगीन छींटे इस ब्लॉग ने दिये ! दो बार ब्लॉग के लिए ब्लोगोत्सव का अवार्ड पा चुका हूँ | 2019 में भी बेस्ट ब्लॉग का रनर अप रह चुका है मेरा ब्लॉग 😊

ये भी आज की सच्चाई है कि बहुत से नामी गिरामी साहित्यिक ब्लोग्स के बीच चुप्पी साधे मेरा ब्लॉग "जिंदगी की राहें" अपने पाठक संख्या में उतरोत्तर वृद्धि को दर्ज होते देख पा रहा है ! मेरा दूसरा ब्लॉग "गूँज...अभिव्यक्ति दिल की" है।

आंकड़े बताते हैं कि एक समय करीब 200 कमेंट्स तक पोस्ट पर आवागमन होता था जो किसी सामान्य हिंदी पत्रिका से कम नहीं था। पर आज भी ट्रैफिक की संख्या बताती है साइलेंट पाठको की संख्या में इजाफा हुआ है बेशक प्रतिक्रिया देने से हिचकिचाते हैं।

अपने 407 फोलोवर्स की संख्या के साथ हिंदी दिवस पर इस ब्लॉग ने कछुए के चाल के साथ अपने पाठक के संख्या (viewers) को करीबन नौ लाख छूते हुए देख रहा है जो बहुत से सामूहिक ब्लॉग् मैगजीन के तुलना में भी बहुत आगे है, पिछले वर्ष हिंदी दिवस के ही दिन ये संख्या साढ़े छह लाख से ज्यादा थी | तो इन वजहों से आज धीरे से कह पा रहा है कि गिलहरी के मानिंद हम भी साहित्यिक पुल को बनाने में लगे हैं। 

इसी ब्लॉग से बने आकर्षण के वजह से आज मेरे हिस्से में भी एक कविता संग्रह "हमिंगबर्ड", एक लप्रेक संग्रह "लाल फ्रॉक वाली लड़की" और हिन्दयुग्म से छः साझा संग्रहों - कस्तूरी, पगडण्डीयाँ, गुलमोहर, तुहिन, गूँज और 100कदम का सह संपादन और कारवां का संपादन है | समर प्रकाशन से सौ कवियों के कविताओं का संग्रह शतरंग प्रकाशनाधीन है। करीबन 350 नए/पुराने साथियों को अपने साझा संग्रह के माध्यम से प्रकाशन का सुख दे पाए, जिसकी पहुँच भी ठीक ठाक रही | हिंदी से जुड़े अधिकतर पत्रिकाओं ने कभी न कभी कागज़ का कोई एक कोना मेरे नाम भी किया है | आल इंडिया रेडिओ/आकाशवाणी के माइक के सामने अपनी आवाज रख पाया हूँ | पिछले वर्ष ही Blogger of the Year 2019 में उप विजेता के लिए चुना गया हूँ । बेशक औसत हूँ, पर आंखो पर छमकते सपने हमारे भी हैं|

तो इन सबसे इतर बस ये भी जोर देकर कहना है - हाँ, इस ब्लॉगर के अन्दर छुटकू सा हिंदी वाला दिल धड़कता है, जो हिंदी की बेहतरी ही चाहता है

और हाँ, बताना भूल गया, गूँज के माध्यम से भी कुछ दूर तक हिंदी की गूँज पहुंचाने की कोशिश भी करते रहे हैं 😊

हिंदी दिवस की शुभकामनायें ! 

~मुकेश~।