जिंदगी की राहें

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Friday, March 5, 2021

प्रेम की दवा



सुनो तो,
तुम हो पैरासिटामॉल
या तुम ही हो क्रोसीन
या कहीं कोरोना वैक्सीन तो नहीं
तभी तो हर छह घंटे बाद के
मेडिकल खुराक की तरह
मैं जुकाम पीड़ित
पहुंचता हूँ तुम्हारे प्रोफ़ाइल पर
काश ये बुखार
साँप सीढ़ी की तरह खेलता रहे
काश तुम्हारा असर बना रहे !
वैसे भी कुछ दवाइयाँ
आयुर्वेदिक काढ़े जैसी
बिना डाक्टरी सलाह के भी
बिना किसी साइड एफ़ेक्ट्स के
होती है गुणकारी
तुम भी ऐसी ही हो न !
..... है न !!! 😉
~मुकेश~



Friday, February 19, 2021

एडेनियम : रिपोटिंग



एडेनियम के पौधे की रिपोटिंग की तो बस उन क्रिया कलापों को शब्द दिए हैं, बेशक कविता न कहें पर संवेदना तो जुड़ी ही है , है न !!

😊
गुलाबी ठंड के साथ आ ही गयी फरवरी
अब आएंगे गुलाबी दिन-सप्ताह
और फिर प्रेम बरसाता
गुलाबों वाला वेलेंटाइन डे भी
फूलों के पौधों को भी चाहिए
इसी खास महीने का प्रेम, तभी तो
रिपोटिंग के लिए
एडेनियम के गमले की मिट्टी को कुरेदते हुए
थी कोशिश कि
जड़ों के रेशे-रेशे के साथ
आ जाए पौधा बाहर
निकल जाए मिट्टी का कण-कण
जीवन में रंग भरने से पहले
अपने अंदर सिंचित करने के लिए ऊर्जा
पौधा ले पाए जड़ों से सांस
इसके लिए जरूरत है रिपोटिंग की
ऐसा बताया एक मित्र ने
तभी तो, एडेनियम के पौधे को जड़ों से
पूर्ण रूपेण बाहर कर
खिली गुलाबी धूप दिखाई है
कई दिनों तक
लगाई लेप एंटी-फंगस की
ताकि हो पाए देखभाल
जड़ों के हर संरचनाओं की।
मरीज को डॉक्टर से ज्यादा पसन्द आते हैं
केयर करने वाले नर्सिंग स्टाफ
कुछ ऐसा ही महसूस रही थी हथेली
एडेनियम के तने की जीवंत छुअन से।
कुछ दिनों की खुली हवा के बाद
एडेनियम ने दिखाई चाहत
फिर से फिक्स आधार की, मिट्टी की
तो फिर
मिट्टी-रेत-ऑर्गेनिक खाद-नीम-कोकोपीट आदि को
सहज हथेलियों से मिलाते हुए
निहार रहे थे, सुषुप्तावस्था में पड़े
एडेनियम के पौधे को
जो सोया-सोया, लगा कुछ ऐसा
जैसे आंखों के कोर से निहार रही हो गुलाबी स्त्री
स्त्रियोचित नज़र की नमी ने,
संवेदनशीलता का पहनाया खूबसूरत जामा
तभी तो गमले में लग कर
एडेनियम मुस्काया
और विस्पर करते हुए बोला
- जरूर खिलूँगा
आखिर प्रेम सिक्त कुछ जल के बूंदों से
सिंचित तो करते ही रहोगे न तुम।
गमलें को हल्की धूप-छाया वाले स्थान पर
रखते हुए, किसी तरह से मैंने भी कहा
इंतज़ार करूँगा, खिलने का एडेनियम।
खिलते-खिलखिलाते रहना तुम।
- तुम भी।
~मुकेश~



Friday, January 29, 2021

प्रेम

 


प्रेम तो बस
डूबते हुए भी तैरते रहने का बहाना मात्र है
आखिर मर जाना कहाँ कोई पसन्द करता
इन दिनों...
....है न !

क्षणिका सा हो गया है, क्षणिक प्रेम
जब भी अच्छे से बात करती हो, हो जाता है
और फिर,
यूं डूबें कि तैर न पाएं
प्रेम में तेरे तर ही जाएं...

काश
ऐसी स्थिति माने
आगोश का सुख
फिर भरी आंखों को कौन निहारे
कभी सहमति हो शब्द भर की
और न चाहते हुए भी मर ही जाएं

भरी आंखों का वाचालपन शब्दों को मौन तो नहीं करता
वैसे भी एकतरफा आकर्षण ऐसे है
जैसे
भोर के साढ़े चार बजे
मिलेगी
मृत्यु दंड, पक्का पक्का !

सुना ही होगा न,
मुस्कराहट
जिंदगी की लड़ाई का सबसे कारगर हथियार है ।

~मुकेश~


Friday, November 27, 2020

मोनालिसा


सुनो
सुन भी रही हो
सुनोगी भी
उफ़ सुनो न यार !

मैंने अपने जिंदगी के कैनवास पर
नोकदार डबल-एच पेंसिल से
खिंचा था, सिर्फ एक ही स्कैच
थी बहुत हल्की सी आभासी स्कैच
फिर मेरी दुनिया में तुम आ गयी
तुमने कोशिश की रंग भरने की
शुरूआती दिनों में, स्कैच के आउट लाइन पर
तुम्हारे भरे रंग, नहीं जंच रहे थे
पर जैसे जैसे, बीते दिन, बीती जिंदगी
ब्रश चला, रंग भरते चले गए, सुनहले
और, फिर, वो स्कैच, उसमे दिखने लगा
तुम्हारा अक्स !

बहुत बार, बदरंग सी लगी कैनवास
लगा, नहीं बेहतरीन बन पायी पेंटिंग
न तो कोई शउर, न ही कोई नजाकत
फिर,
मेरे अन्दर के पुरुष चित्रकार का विचलित मन
बनाऊं कुछ दूसरा, फिर से करूँ कुछ अलग कोशिश
पर मिली निराशा,
या तो पेंसिल की ग्रेफाईट टूट गयी
या जिंदगी का कैनवास ही मुड़-तुड गया !

अब अंततः, मुझे वही स्कैच
जो बनाई थी, पहली और अंतिम बार
मेरी लगती है सबसे बेहतरीन व सर्वोत्तम कलाकृति
अनमोल !

सुन रही हो न
अतिम बार कह रहा हूँ
गाँठ बाँध कर याद रखना

किसी ने कहा भी,
चित्रकार
जिंदगी में सर्वोत्तम कलाकृति एक बार ही गढ़ता है

मोनालिसा हर दिन नहीं गढ़ी जाती न !

~मुकेश~



Wednesday, October 21, 2020

प्रेम कविता लिखने की शर्त



प्रेम कविता लिखने की शर्त लगी थी
इस तंज के साथ कि
आज तक मुझ पर नहीं रच पाया कोई
प्रेम कविता !

बिन कहे कुछ
सोचा कि
लिखूं तो क्या लिखूं
होंठ लिखूं या लिखूं गुलाब की गुलाबी पंखुडियां
जो कभी हुआ करते थे प्रेम पत्र के साथ
रुमानियत भरने के लिए
हुआ करता था जो जरूरी

या फिर लिखने से पहले
ताकूं सुरमई आँखों में
हाँ, नजरों में अटकना ही तो है शायद
प्रेम के पहले पग पर ठिठकना
अगर अटका तो खोया
फिसला तो, हमें पता है
कह ही दोगी
ओये लड़के उतनी दूर तक नहीं !

खैर, रहने दी कविता
कर ली अपनी आँखे बंद
और फील करने लगा मुस्कराहट
तभी तो फैले बाहों से इंद्रधनुषी आसमान के साथ
महसूसने लगा तुम्हारी आहट
थे मेरे हाथो में तुम्हारे हाथ
थी स्पर्श की उष्णता
शायद कहीं प्रेम कविता की मांग में था
छिपा हुआ विस्मयकारी प्रेम भी तो

सोचा लिखूं तुम्हारे भरे हुए कंधे
और लिखूं तुम्हारी आवाज सुरीली
तभी आवाज सोचते ही फना होने लगी रूह
धधकने लगा अलिंद और निलय के बीच
बहने वाला रुधिर
टूटती नींद के साथ खिलखिलाते सपने भी तो
तकिये के अगल बगल से चिढाते हुए कह उठे
कवि तुम प्रेम में तो नहीं हो उसके

कब आ चुकी थी निद्रा
कब नींद में भी बहकने लगा था मन
पता चला तब,
जब तकिये में दबाये चेहरे को
करने लगा देह की यात्रा
देह से देह तक
कमनीयता से नज़ाक़त तक
मन से मन तक पहुँचने से पहले
पर, कुछ अजब गजब सोच भी
होती है प्रेम में निहित
किसी ने बताया था कभी
फिर जैसे चुप्पी होती है वाचाल
वैसे ही सोया हुआ जिस्म दौड़ता है अत्यधिक

चलो हो चुकी है अब भोर
फिर कभी लिखूंगा तुम पर
प्रेम और प्रेम कविता
आज तो बस जान लो
कवि के मन की बात कि
खिलखिलाते हुए लोग होते हैं खूबसूरत !

हाँ फिर से कह रहा हूँ
मुझे प्रेम कविता लिखते रहनी हैं
हर नए दिन में नए नए
झंकार था टंकार के साथ !
समझी ना !

~मुकेश~



Saturday, September 12, 2020

परिधि प्रेम की



परिधि सीमा नहीं होती
पर फिर भी,
एक निश्चित त्रिज्यात्मक दूरी में
लगा रहा हूँ वृताकार चक्कर
खगोलीय पिंडों सा
तुम्हारी चमक और तुम्हारा आकर्षण
जैसे शनि ग्रह के चारों ओर का वलय !
कहीं मैं धूमकेतु तो नहीं ।
2.
काश
संबंध होते
किवाड़ के कब्जे सरीखे
जो समेटे रखते परिधि में
काश
अधिकतम दूरी का भी होता ज्ञान
फिर संबंधों की
चिटखनी होती मजबूत
~मुकेश~


Wednesday, August 19, 2020

स्वरों को मिला सुर


उम्मीदों की बात कहूँ तो

कभी लगा था, वो
'ह्रस्व उ' की तरह घूम फिर कर लौटेगी
पर 'दीर्घ उ' की सरंचना सरीखी
एक बार जो मोड़ से घूमी
दूर तक चली गयी

'ए-कार' सा रह गया अकेला
पर 'ऐ-कार' बनने की उम्मीद में
ताकता रहा हर समय एक आंख से 'चन्द्रबिन्दु' जैसा
किंतु परन्तु के सिक्के को उछाले
दरवज्जे से तिरछी हो, झांकी ऐसे, जैसे हो
'अ:' की तरह, दुपट्टा से खुद को छिपाए

बस, बेशक दरवाजा था बन्द 'ह्रस्व इ' सा
पर आ कार सा खुला, 'अ' आया और
'दीर्घ इ' की तरह अंदर से बहते प्रेम संग बन्द हो गया

जिंदगी फंसी रही 'ऋ' जैसे दुविधाओं में
पलटती तो कभी खोलती रही
पर अंततः 'ओ-कार' के झंडे में
आना ही पड़ा 'औ-कार' की तरह उसको भी।

इस तरह, स्वरों को मिल ही गया सुर।

~मुकेश~ #poetryonpaper