जिंदगी की राहें

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Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दिनों में उम्मीद

बेशक

मिसाइलों की आवाज़

सिर्फ खबर नहीं,

नींद के बीच

काँपते हुआ एक डर है

मानवता के नाम पर...


ड्रोन की भनभनाहट

जैसे सिरहाने मंडराती बेचैनी,

और फाइटर प्लेन

दिल की धड़कनों पर

तेज़ उड़ान भरते हुए।

क्रेश करती प्रतीत होती है 


रात जो 

चीखों की रिपीट टेलीकास्ट है,

तभी तो अंततः 

टीवी बंद करना होता है 

पर दृश्य

अंदर कहीं चलते रहते हैं।


मन पूछता है

क्या सच में हम इतने बेबस हैं?

शायद, हमारे भीतर का मनुष्य

धीरे-धीरे म्यूट हो रहा है,


पर फिर,

एक छोटी-सी, 

शर्मिंदगी से भीगी उम्मीद

कहती है 

कि स्ट्रैट ऑफ़ होरमुज़ से

हमारे हिस्से के 

तेल-गैस के जहाज़

सही-सलामत आ जाएँ…


जैसे

ज़िंदगी अब बस

सप्लाई चेन पर टिकी हो।



Tuesday, January 6, 2026

Happy Birthday Rishabh ...

 


बुढ़ाते जीवन की थाती में

सबसे अमूल्य वही है,
पापा के रूप में
जिया गया
बेटे का बचपन।

वो छोटे-छोटे कथन
जो ऑफिस से लौटते हुए
सुनने पड़ते थे,
अब समझ आता है,
वही थे
सबसे खास, सबसे अहम्।

“पापा, पता है
आज मैम ने पूरे क्लास पर
नज़र रखने को कहा।”

“पापा, आज तो गज़ब ही हो गया—
मैडम ने सिर्फ मुझे कहा
Good Boy।”

“देखो पापा,
स्टार मार्क -
सिर्फ मुझे!”

“साइंस में सबसे ज़्यादा नंबर,
जूनियर सेक्शन का
Best Student प्राइज,
और पापा,
Astronomy Olympiad में Gold,
Maths में Silver!”

“पापा,
अंग्रेज़ी में Poem भी लिख ली है मैंने ।”

हर दिन
ऐसे ही, खुश होने लायक
ख़बरों के कतरन लेकर
साहबज़ादा करता रहा इंतज़ार,
और हमारा चेहरा
उसी की चमक से
दमकता रहा।

इनके बचपन को
हमने यूँ ही सहेजा।

वो दिन भी देखे
जब हम पापा-मम्मी
ऑफिस में होते,
और साहबज़ादा
दिन भर
टीवी से चिपका रहता।

पर मूड और ज़रूरत पड़े तो
छोटी उम्र से ही
देर रात क्या,
पूरी रात
किताबों में
फोड़ देता था कपार

ऐसे ही रहे ये हर समय।
अब हो गए हैं बड़े
पापा के साथ
रहती है गम्भीर-सी दूरी,
पर हाँ
बेतक़ल्लुफ़ बॉन्डिंग
अब भी है अम्मा के साथ

समय के साथ
साहब फोकस्ड हुए,
रही इनकी बस एक चाहत
हमने भी मन में सहेज रखी थी
कि IIT की
एडमिशन लिस्ट में
नाम हो इनका।

पूरी-पूरी रात
इनका पढ़ना
भी झेला है हमने ।
ख़ैर, भागते वक्त के साथ
IIT Engineer,
अब नौकरी में हैं।

इंतज़ार रहता है
इनके आने का,
पर समय और
Engagement का
बहाना
आ ही जाता है अक्सर

फिर भी
एक Parent के रूप में
हम हर समय
ख़ुश ही रहे हैं।

एक वक़्त था
जब मन कहता
कुछ भी कर लूँ
इनकी उम्मीदें
पूरी कर पाऊँ।
अब बस
इतनी-सी रह गई है
हमारी उम्मीद।
कि इनकी उम्मीद पर हम
बन पायें best ... !

बदलती उम्मीदों की नाव में
बहते जा रहे हैं हम
इसलिए
ख़ुशियों की दस्तक का
इंतज़ार बना रहता है।

वो दिन थे
जब हमारे आने से
पापा मुस्कुराते थे,
अब हम
उस इंतज़ार में रहते हैं

बच्चों के होने से ही
घर की खिड़कियाँ
खुलती हैं।

और जब
ख़ुशियों से भरी स्मृतियाँ
पंक्तिबद्ध हो जाती हैं,
तो बन जाती है
एक अनमोल कविता।

Happy Birthday, ऋषभ!


Thursday, September 25, 2025

बेटे के जन्मदिन पर



समय कितनी जल्दी सरक जाता है
कल तक नन्हें कदमों संग चलना था,
आज वही कदम
नई दिशाओं की ओर बढ़ चले हैं।

बेशक यादगार ज़िंदगी न दे पाए,
पर यादों में दर्ज है
गुस्से और मुस्कुराहटों का गुलदस्ता,
जो हमने तुम दोनों पर लुटाया था।

याद है मुझे
दिल्ली की गलियों में
तुम्हारे सहमे हाथों ने हमें थामा था,
हवाओं के थपेड़ों में
तुम हमारी पीठ से चिपके रहते थे।
बाइक पर मम्मी-पापा को कसकर पकड़े,
साहस जुटाते हुए,
हवाओं के झोंके सहेजते रहे
वही दृश्य आज भी आँखों में ताज़ा हैं।

अब जब तुम उड़ान भरो
सुदूर दक्षिण की ओर,
तो मन गर्व से भर उठता है,
हाँ, यही तो चाहते थे हम,
कि बेटा अपने सपनों का आकाश छू सके।

याद आया कि कैसे
दिन बीते, महीने और बरस गुज़रे,
तुम मुस्कुराते हुए दूर कॉलेज गए,
हम सोचते रहे—कैसे रहेंगे हम अकेले?
फिर समय बदला, लगा,
अब तो साथ का सान्निध्य बरसेगा।
पर तुम्हें और आगे जाना है,
क्योंकि तुम्हारे सपने बड़े हैं,
तुम्हारी ऊँची हैं उम्मीदें

ख़ैर…
अब स्नेह की तारें
मोबाइल और इंटरनेट से जुड़ेंगी।
पर क्या दूरियाँ
कभी मुस्कुराने की वजह बन सकती हैं?
फिर भी एक कोना भीग जाता है
सोचकर कि मुस्कुराहटें
अब स्क्रीन पर चमकेंगी,
गले की ऊष्मा
सिर्फ नेटवर्क की लकीरों में ढल जाएगी।

जाओ बेटा,
दुनिया जीतने की हसरतें समेटो।
बेशक कम पैसे कमाना,
पर ढेर सारा प्रेम लुटाना,
अथाह स्नेह बटोरना।
याद रखना कि
दुनिया का सबसे बड़ा खजाना
प्यार बाँटना है,
दिलों को जीतना है।

भाषा से परे भी
प्रेम समझा जाता है,
यहाँ तक कि ब्रेल लिपि में भी
दिल की रौशनी सुनहरी हो उठती है।

तुम्हारा सफ़र मंगलमय हो,
हर कदम पर ऊपरवाले का हाथ हो,
और हर मोड़ पर
अम्मा-पापा की दुआएँ
तुम्हारा आसमान बनकर
साया करती रहें।

जन्मदिन मुबारक हो, बेटे! 🎂💐



Friday, June 27, 2025

रजनीगंधा या रेन लिली




आज टैरेस पर टहलते हुए

रजनीगंधा की भीनी ख़ुशबू
और रेन लिली की गुलाबी चमक
छा गई कहीं भीतर तलक...
बारिश भी आई
बस तुम्हारी ख़ुशबुओं की तरह...
तुम मुस्काई,
जैसे लटों पर
छतरी से फिसली कोई बूँद
झिलमिलाई हो चुपचाप...
अपने प्रिज्मीय अपवर्तन के साथ
तुम्हारे शब्द भी
उस पल हँस पड़े थे —
काश!
तुम होती रजनीगंधा
और तुम्हारी फ्रॉक पर
टँकी होती गुलाबी लिली...
और मैं, हाँ मैं
माली सा जुड़ा रहता
तुम्हारी देखभाल में
चुपचाप, मगर मगन...
काश! तुम होती
मेरे गमलों की कोई खिलती कविता...!
रचते रहता दिन रात 🥰

Monday, May 5, 2025

चिट्ठियाँ

 

1.

चिट्ठियाँ,
जो कभी प्रेम की संवाहक थीं,
लौटती डाक में आकर
प्रेम की मज़ार बन गईं।

कभी कभी उन्हें पढ़ कर ही
चमकती आंखों का दीया दिखाता हूँ

चिट्ठियां लिखी जानी चाहिए।

2.
गलत पते पर भेजी गयी थी
जो तुम्हें चिट्ठियां
लौट कर बताती रहीं अहमियत
दो-दो बार

भेजने से ज़्यादा,
तब खुद से हो गया था प्यार।
जब वापस लौटी लिफाफे में से
खुद के लिखे गुलाबी शब्दों को
महसूस कर, खुद ही हुआ गुलाबी।

3.
ढलती उम्र में भी
सहेज रखा है मैंने —
तुम्हारी चिढ़, जलन,
वो चिट्ठियाँ और कलम भी।
सूखी गुलाबी पंखुडियां संग
स्नेह व अथाह प्यार भी

सब है धरोहर
कुछ पर्स में
कुछ बक्से में
कुछ दिल के गलियारे में !

4.
पुराने
प्रेम पत्रों को पढ़ते हुए
जी रहा था
हर्फ़-हर्फ़ प्रेम को
कुछ पन्ने गुलाबी हुए
कुछ ने रोष जताया
पर हर पन्ने ने व्हिस्पर कर
लगाई गुहार

- बचाये रखना प्रेम को ।

5.
मोबाइल चोरी हुई
नम्बर भी गया तुम्हारा
संदेशें जो कागज पर थे
बस वही रह गए
इतना बताने को कि

बस इतना बताने को था —
लिखा करो अब भी चिट्ठियाँ,
चाहे बेनाम, बेतिकाना ही सही।

...ठीक है न!

~मुकेश~



Wednesday, October 9, 2024

खिड़की




खिड़की के पल्ले को पकड़े
कोने से
जहाँ से दिख रहा था
मेरा वर्गाकार आकाश
मेरे वाला धूप
मेरा ही सूरज व चन्दा भी
मेरी वाली उड़ती चिड़िया भी...

दूर तक नजर दौड़ाए
छमकते-छमकाते पलकों के साथ
आसमान की ओर नजरें थमी
तो जेहन खन-खन बजता रहा
घनघनाती रही बेसुरी सांसे
पर लफ्ज नहीं बुदबुदाते
मोड़कर पलकें
जमीं की ओर
लौटती रही आंखें

ऐसे में, बस
इंतजार अंतहीन हुआ करता है

- मुकेश



Monday, September 9, 2024

~ प्रणय निवेदन, ऐसी भी ~

 


बेशक कभी जाहिर न कर पाया
कि करता हूँ प्रेम
या है कोई अलग सा आकर्षण
हां, कभी कहा भी तो वो लगा
ऐसे जैसे
दिया गया हो मित्रवत एप्लिकेशन

पर चाहतों का गुब्बारा उड़ता रहा
चाहते न चाहते
अटकते रहे, स्क्रॉल करते हुए
बातों मे आदरसूचक शब्दों के साथ भी
ढूंढते रहे, गुलाबी चमक
उम्र के ढलान पर
जीते रहे जिंदगी की आभासी शरारतों को

हाँ, मन के अंदर से हर वक्त आई
हल्की सी व्हिसपर करती हुई आवाज कि
किसी शाम बैठेंगे तुम्हारे साथ
चाय की चुस्कियों संग
और फिर कहेंगे धीमे से
कल भी आना, आओगी न...

और ये शाम बराबर आए,
बस इतनी सी रहेगी उम्मीद
ठीक न !

- मुकेश कुमार सिन्हा