जिंदगी की राहें

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Friday, January 29, 2021

प्रेम

 


प्रेम तो बस
डूबते हुए भी तैरते रहने का बहाना मात्र है
आखिर मर जाना कहाँ कोई पसन्द करता
इन दिनों...
....है न !

क्षणिका सा हो गया है, क्षणिक प्रेम
जब भी अच्छे से बात करती हो, हो जाता है
और फिर,
यूं डूबें कि तैर न पाएं
प्रेम में तेरे तर ही जाएं...

काश
ऐसी स्थिति माने
आगोश का सुख
फिर भरी आंखों को कौन निहारे
कभी सहमति हो शब्द भर की
और न चाहते हुए भी मर ही जाएं

भरी आंखों का वाचालपन शब्दों को मौन तो नहीं करता
वैसे भी एकतरफा आकर्षण ऐसे है
जैसे
भोर के साढ़े चार बजे
मिलेगी
मृत्यु दंड, पक्का पक्का !

सुना ही होगा न,
मुस्कराहट
जिंदगी की लड़ाई का सबसे कारगर हथियार है ।

~मुकेश~


Saturday, July 14, 2018

कभी कभी रो लिया करो


अनंत तक पसरा ये अन्तरिक्ष
उनमें तैरते न जाने कितने सारे सौरमंडल
सबका अलग अलग सूरज
न जाने कितनी आकाशगंगाएं
सबका अलग अलग वजूद 
और फिर
अपनी अपनी तय कक्षा में
परिक्रमा करते ग्रह, उपग्रह
तारे, धूमकेतु सब-सब
लेकिन फिक्स रहता है
उन सब खगोलीय पिंडों के बीच का स्पेस
विस्तार की हक़ीकत को स्वीकारते हुए भी
रखते हैं दूरी, अपने आप
नैसर्गिकता की है न एक ख़ास पहचान !
उपलब्ध कागज़
और भभकती कलम की स्याही
मन की तरंगों से उपजे
अजब गजब ख्याल और
फिर निकल पड़ती है स्याही
नुकीले निब की बीच की दरार से
आड़े तिरछे शब्दों के तले
बनती जाती है कवितायेँ
पर इन सुन्दर कविता के लिए
या कविताओं के कारण भी
तथाकथित शब्दों के योद्धा
नहीं बना पाए वो ख़ास स्पेस
जिसकी उम्मीद के लिए बनी थी कवितायेँ
ये कैसी जद्दोजहद
हर वक़्त आज़ादी की परिधि को छलांगते हुए
होती है मुठभेड़ें !
दरकती है चाहतें
और फिर ख़यालात ने किया है कलुषित मन
तो बस, समझ लीजिये
चारो और
क्रोध और द्वेष का पजल बोर्ड फैला है
चल रहे सभी योद्धा अपनी अपनी चालें
विचारा जा रहा है लाभ-हानि
तिरोहित हो रही हैं मर्यादाएं
ढाई घर के घोड़े के साथ, कुछ ने किया पीछे से वार
तो कुछ के लिए हम जैसे प्यादे हैं
सबसे आगे
शहीद होना मायने रखता है,
हम भी तो हैं न वीर चक्र के मोहताज
याद रखना मठाधीशों
संवेदनाओं के लिए
भारीभरकम शब्दों से भरपूर पंक्तियाँ जरुरी नहीं होती
जरुरी होती है
छीछालेदर और वैमनस्यता से इतर कुछ बूंदें लवण युक्त
जो पलकों के कोर से टपकती है
कभी कभी रो लिया करो
इतना ही कहूँगा .....
कुंठाएं पिघल जायेंगी !
~मुकेश~


इंद्रप्रस्थ भारती में प्रकाशित 

Wednesday, June 1, 2016

'मृत्यु'


'मृत्यु'
मैं लिखूंगा एक नज्म तुम पर भी,
और
अगर न लिख पाया तो न सही
कोशिश तो होगी ही
तुम्हारे आगमन से
जीवन के अवसान में
शब्दों के पहचान की!!
तेज गति से चलता रुधिर
जब एकाएक होने लगे शिथिल
नब्जों में पसरने लगे
शान्ति का नवदीप
जैसे एक भभकता दीया
भक्क से बुझने से पहले
चुंधिया कर फैला दे
दुधिया प्रकाश !!
जर्द से चेहरे पर
एक दम से
दिखे, सुनहली लालिमा !
मौसम और समय के पहर से इतर
दूर से जैसे आती हो आवाज
एक मरियल से कुत्ते के कूकने की !!
समझ लेना विदा का वक्त
बस आ ही चुका है !
बेशक न कहें - गुडबाय!
पर नजरों में तो पढ़ ही सकते हो
- मृत्यु का एक प्रेम गीत !!
इतना तो कहोगे न -
"अब तक की बेहतरीन कविता" !!
अनुप्रिया व प्रिय दर्शन जी

Thursday, October 1, 2015

आवाज का जादू


विंड चाइम की घंटियों सी
किचन से आती
तुम्हारी खनकती आवाज का जादू
साथ ही, तुम्हारा बनाया
ज्यादा दूध और
कम चाय पत्ती वाली चाय का
बेवजह का शुरुर !!

सर चढ़ कर जब बोलता है !
तो बंद आँखों में तैरने लगते हैं
कविताओं के खिलखिलाते शव्द
बेशक लिख न पाऊं कविता !!
----------------
कल काफी बनाना :-)

दैनिक जागरण में प्रकाशित समीक्षा 

Monday, February 10, 2014

प्यार !



प्यार जो है ढाई आखर शब्द

प्यार मौन का

प्यार नजरों का

प्यार अहसासों का

प्यार साँसो का

प्यार दिलों का

प्यार स्पर्श का

प्यार दूरी का

प्यार धड़कन का

प्यार गंध का

प्यार सुगंध का

प्यार शब्दो का

प्यार लिखावट का

प्यार चिन्ह का

प्यार प्यार का

प्यार उसकी इबादत का

प्यार उसकी हसरतों का

प्यार उसकी अहमियत का

प्यार जिंदगी का

प्यार ज़िंदगानी का

प्यार उसका

प्यार मेरा

प्यार हम दोनों का

प्यार ही है न :)



Wednesday, January 29, 2014

शब्द


है अजीब दुनिया शब्दों की
कभी दर्द से कराहते हैं शब्द
तो कभी खुशियों से से खिलखिलाते शब्द
जिंदगी में संबल भरते शब्द
मिठास उढ़ेलते, गरम एहसास जगाते शब्द !

हथियारों जैसे संहार करते शब्द
तो अंकुरित सृजन करते सुंदर शब्द
कभी प्रार्थना व दुआ देते शब्द
तो बद-दुआओं से भरे कठिन शब्द
चोट पहुँचते खतरनाक शब्द
तो दवा-दारू जैसे मरहम करते शब्द
केंद्र होते हुए परिधि को संचालित करते शब्द
परिधि से केंद्र पर आश्रित होते
आभारी शब्द
परस्पर अन्योनाश्रित
जीवनशक्ति होते शब्द
जिंदा, ज़िंदादिल, जिंदाबाद शब्द
मर-मर कर तड़पते मुर्दाबाद शब्द !

उफ! आह! से आहा ! तक की
दूरी तय करते शब्द !
तो कभी चमत्कृत करते शब्द !!   
इंसान को मुखर बनाते शब्द
कभी मौन हो इंसान बनाते शब्द !!


Saturday, September 7, 2013

सिर्फ तुम !




पल पल
हर क्षण
जर्रे जर्रे में
तुम
सिर्फ तुम !

मेरे सपने
मेरी हसरतें
मेरी शर्तें
मेरी जरूरतें
मेरी शरारतें
मेरी रातें
मेरे फलसफे
मेरी डायरी
मेरे शब्द
मेरा दिल
मेरी धड़कन
मेरी जान
मेरी तन-मन-धन !

हर जगह तो
बसने लगी हो
तुम
सिर्फ तुम

पर
इनमें
मैं कहाँ हूँ ?
कैसे ढूँढूँ ?
कब-कब ?
कहाँ-कहाँ ?
किधर ?
उफ़्फ़!!
मैं हूँ भी ??
या नहीं ??



Thursday, July 18, 2013

शब्द सृजन




हर बार ऐसा क्यों होता है
अँधेरी सुकून भरी रात में
नरम बिछौने पर
नींद आने के बस
कुछ पल पहले
मन के अन्दर से
अहसासों के तरकश से
शब्दों के प्यारे बाण
लगते हैं चलने...
मन ही मन
कभी-कभी वास्तविक घटनाओं पर
तो कभी काल्पनिकता
की दुनिया में
हो जाते हैं गुम ... और
बस फटाक से
रच जाती है कविता
.
पर ओह!
सुबह का ये नीला आकाश
दिखते ही ...
दूध-सब्जी लाने में
बच्चो को स्कुल भेजने में
न्यूज पेपर के व्यूज में
आफिस की तैयारी में
सो जाते हैं सारे सहेजे शब्द
गडमगड हो जाते हैं एहसास ....
सारा रचना संसार
खो जाता है
सारे शब्द भाव उड़ जाते हैं
शब्द सृजन की हो जाती है
ऐसी की तैसी
दूसरी रात आने तक ...
और फिर अंदर चलता रहता है
उथल-पुथल ....
ये क्यों होता है
हर दिन ???
कैसे रच पाएगी कविता :) :)

___________________________________________
अगर हर रात का शब्द सृजन कागजों पर उतर जाये तो हम भी बड्डे वाले कवि होते !!
 


(एक क्लिक मेरे कैमरे से) 

Monday, January 21, 2013

ऐसा क्यों होता है


हर बार ऐसा क्यों होता है 
अँधेरी सुकून भरी रात में 
नरम बिछौने पर 
नींद आने के बस 
कुछ पल पहले 
मन के अन्दर से 
अहसासों के तरकश से 
शब्दों के प्यारे बाण  
लगते हैं चलने....
मन ही मन 
कभी-कभी वास्तविक घटनाओं पर 
तो कभी काल्पनिकता 
की दुनिया में
हो जाते हैं गुम ... और
बस फटाक से 
कविता रच जाती है ...
.
पर ओह!
सुबह का ये नीला आकाश 
दिखते  ही ...
दूध-सब्जी लाने में 
बच्चो को स्कुल भेजने में 
न्यूज पेपर के व्यूज में 
आफिस की तैयारी में 
सारे सहेजे शब्द सो जाते हैं 
गडमगड हो जाते हैं एहसास ....

सारा रचना संसार 
खो जाता है 
सरे शब्द भाव उड़ जाते हैं 
शब्द सृजन की हो जाती है
ऐसी की तैसी
दूसरी रात आने तक ...
और फिर अंदर चलता रहता है
उथल-पुथल ....
ये क्यों होता है 
हर दिन ???  

Friday, October 5, 2012

मेहँदी का पेड़
























पता है ?
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़,
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली
.
घर के पिछले दरवाजे की किवाड़... 
जिससे नजर आता है अब भी, वो मेंहदी का पेड़
उखड रहा है चौखट से..
पीछे जो खेत है,
उसकी जमीन भी हो
गयी है उसर...
होते ही नहीं अंकुरित
लगे हुए मटर...
तुमने जो नीला कोट दिया था
वो अभी भी बक्से  में पड़ा है
आई ही नहीं इत्ती सर्दी..
घनेरे छाये मेघ भी 
बस... गड गडा कर उड़ जाते हैं
शायद उन्हें भी  लगता है-
क्यूं बरसे जिंदगी भर ?......
.
"मेरे शब्द"... उनको तो, क्या हो गया,
कैसे बताऊँ ?
हर बार रह जाते हैं, थरथरा कर
बोल ही नहीं पाते कुछ
सब कुछ तो बदल गया
.
पर पता नही क्यूं
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली...
आज भी...!!

Tuesday, May 10, 2011

हे भ्रष्टाचारी !!




हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही तुम्हें क्यूँ लोग
इतने विशेषणों से करते हैं संबोधित
इतने अलंकारो, उपमाओं से करते हैं सुसज्जित
असम्मानीय शब्दों से करते हैं विभूषित.!!

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही लोग क्यूं
कहते हैं...
भ्रष्टाचार हमारे देश को घुन की
तरह खा गया
और फिर कहतेहैं
"
भ्रष्टाचार को भागना होगा.
देश को बचाना होगा.........."

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही लोग क्यूं
क्यूं पिछले दिनों
अन्ना के बूढ़े कंधो का सहारा लेकर
बाब रामदेव की ओट से कहते हैं..
भ्रष्टाचारी को दे दो फांसी ....
उड़ा दो इन सबको  को ....

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही तू इस कलियुग में
कब तक लेता रहेगा अवतार
कभी तेलगी तो कभी बंगारू
कभी राजा तो कभी कलमाड़ी
तो कभी कोड़ा .....
हर दिन एक नए रूप में
होते रहेंगे दर्शन बारम्बार...

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ एक आम भारतवासी क्यूँ
अपने बारे में सिधान्तवादी
होने की पाल रखी है 
ग़लतफ़हमी...

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही क्यूं इतना कोसने पे भी
तुम बिन बेमानी हो गया है जीवन
जैसे ऑक्सीजन बिन लेना साँस.
हमारे खून में प्रवाहित हो गया है तू
ऐसा लगने लगा है.....

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही तेरे विरूद्ध झंडा उठा कर
तेरा कर रहे हैं महिमा मंडन
अगर तुम्हें भागना है
जड़ से उखाड़ना है
तो हमें अपने अन्दर झांकना होगा
तू जो हम में बैठा है.
उसे भागना होगा...
उसे भागना होगा...

हे भ्रष्टाचारी !!
ऐवेंइ ही....................