जिंदगी की राहें

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Thursday, April 15, 2021

सफर

 


याद आ रहा आज वो पहला सफर
जब वो एलएमएल वेस्पा के पीछे बैठ कर
कर रही थी नाखून से कलाकारी
और थी उम्मीद कि समझ पाऊँ
उन हिज्जे को कि शब्द क्या बोल रहे !

सफर के दरमियान आगे से आ रहा था
ट्रक, पर खोया था
गुलाबी अहसासों के दबाव को
बिना बनियान के पहने बुशर्ट पर,
हॉर्न की तीव्रता बता रही थी मेरी गलती
पर स्पर्श की रूमानियत
मौत को धप्पा कहते हुए ट्रक के सामने से
कुलांचे भरते हुए मुड़ी और फिर
टाटा बाय बाय कह कर ट्रक को,
फिर से खो जाना चाह रही थी
उस चित्रकार के तूलिका के स्पर्श को
जो मेरे बुशर्ट को समझ बैठी थी
गुलाबी कैनवास!

सफर और शर्ट बदलते रहे
कभी कभी बदल गए वाहन भी
पर नहीं बदली सड़क
न ही बदल पायी वो चित्रकार
और उसकी तूलिका ने हर बार
एक ही चित्र बनाई पीठ पर
हर बार सफर पर होने का अर्थ
हमने यही समझा कि
आज फिर से मोनालिसा
मुस्कुराएगी
आज फिर से पीठ पर
लिखा जाएगा प्रेम गीत

और क्या बताऊँ
कभी तो बिना वाहन के भी
उसने कहा चिट्ठियों के लिए है महफूज
ये पीठ
और कलम के निब के नोक जैसे
उसके नाखून करते रहे
संवाद या बताते रहे
गुस्से की बेवजह वाली वजह
कई बार सीखा बैलेंस बनाना
क्योंकि रीढ़ की हड्डियों को
रखना पढ़ता था स्थिर
ताकि नोट पैड पर निब के दबाव को समझूँ
और कहूँ धीरे से
आई अंडरस्टूड, ध्यान रखूँगा न, आगे से !

उसी ने समझाया था कभी
प्रेम में अंधा हो जाना चाहिए
ताकि संवाद की लिपि बदले
खैर, कुछ सेंस ऐसे ही जागृत हुए थे
फिर, जिंदगी बीतती चली गई पर आज भी
उस खास ब्रेल लिपि की सिहरन
महसूस लेता हूँ कभी कभी !

~मुकेश~