आज टैरेस पर टहलते हुए
Friday, June 27, 2025
रजनीगंधा या रेन लिली
Tuesday, July 16, 2024
लव एंड लस्ट
वर्षों की पहचान, अंतरंगता और
स्नेहिल सम्पर्क की सीढियों पर थम कर
आया एक प्रश्न।
ये लव है या है लस्ट।
प्रेम व वासना के महीन अंतर में
कहीं तैरने लगा एक जरुरी प्रश्न
पर क्या ही कहूँ कि अगर
है दोनों जरूरी, है अन्योन्याश्रय
क्योंकि वर्षों की अंतरंगता के
बाद स्वीकारा तो है तुमने कि
कहीं हुआ तो नहीं प्रेम?
शायद ये एहसास है
या वासना का ही उद्गार था
जो प्रश्न बन कर कौंध गया।
प्रश्न तो कभी कभी
बस होते हैं जरूरी
क्योंकि प्रेमिल संवाद को देते हैं ठौर।
ठीक कुछ ऐसा जैसे
मेरे सपनीली अँधेरी शाम में
तुम हुई थी करीब
खोती हुई चेतना को मेरे कांधे पर रख कर
और मैं महसूस रहा था
उन गर्म सांसों से भरी आहों को
जो कॉलर के पास बनियान को भिगोती रही
और भीगता मेरा मन
कह ही उठा - ये वासना ही तो है
जो जी रहा हूँ इस खास पल को
तभी सपने ने टूट कर पूछा
लव या लस्ट?
इस अजीब से प्लेटोनिक पल में
बेशक़ जी रही थी वासना
पर ढूंढ रही थी प्रेम को।
तभी तो तुम्हारे कांपते लबो ने कहा
मुझे वासना नहीं,
तुम्हारा प्रेम चाहिए।
और, और...मिला था एक बोसा।
शायद गर्माहट भरी साँसों ने
मेरे होंठों को काट लिया था।
सपनों को कहाँ पता होता है
किसी भी भावों का
वो तो गर्म चाय के केतली की
वो वाष्प है, जिसमें स्वाद नहीं होता
पर कह ही उठते हैं
आह, इस चाय पर मर जाऊं
पता है नहीं मिलेगा कभी
वो ख़ास आगोश
कि खुद से पूछूं -
जी रहा हूँ 'लव या लस्ट'
पर, पर सांसों की तरंगदैर्ध्य
हर उस पल में रही उच्चतम बिंदु पर
जब जब तुम थी कहीं
मन के बेहद करीब।
हां, प्रेम को चाहिए गर्माहट
है मन को जरूरत
तुम्हारी बांहों का आगोश
हथेलियों ने हर बार
खुद ही एकदूसरे को रगड़ कर
पैदा की है चिंगारी
चादर की सिलवटों ने भी
उसी क्षण पूछा था
- क्या बॉस, लव या लस्ट।
अंततः बस कहना ही पड़ा
कितनी खूबसूरत हो तुम
ये तो कहलायेगा - सिर्फ प्रेम।
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| एक यादगार तस्वीर |
Friday, March 29, 2024
चमकते रहना !!
Tuesday, January 24, 2023
Friday, August 26, 2022
ज़ख़्म
सहेजा हुआ है, मैंने ज़ख़्म अपना छिले हुए टखने और कोहनी बता रही मेरी गुस्ताखियाँ दिखते हैं उस पर रक्त के धब्बे जैसे गुलाब की सुर्ख़ पंखुड़ियां देह मेरी जैसे मिट्टी-उर्वरक अंकुरित होती रही उस पर कुछ मासूम यादें, हमने उसके माथे पर लगा दिया है काजल का टीका ओस के निर्मल अहसास सी, बलबलाई खून की एक बूँद मेरे ही सूखे घाव पर ओह, सुवासित हो गयी पीड़ा भी अपने दर्द में अपनी गरम फूंक से दे रहा सांत्वना कि वो याद करती होगी न पक्का-पक्का क्यारियों में बेशक न खिल पाये गुलाब आखिर कौन सींचे हर दिन, हर पल पर, तुम्हारा दिया ज़ख़्म तो स्मृतियों में रिसता रहेगा ताउम्र वैसे भी, कुरेदे हुए घाव दिख जाते हैं सुर्ख लाल किसी ने कहा भी, कैक्टस के फूल खिलखिलाते हैं रेगिस्तान में आखिर कुछ टीस जिगर में ख़ुश्बू जो भरती है जिंदगी तुम बस दर्द देती रहना बेइंतहा ! माय लॉर्ड दर्द, जिन्दा रहना और जख्म को सहेजे रखना, जिन्दादिली का सबूत है न ! ~मुकेश~
Sunday, February 27, 2022
बारूद और प्रेम
Thursday, February 3, 2022
मन्नत का धागा
Wednesday, October 6, 2021
लखनवी प्रेम
Monday, June 21, 2021
सुनहरी बूंद
Thursday, April 15, 2021
सफर
















