जिंदगी की राहें

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Friday, June 27, 2025

रजनीगंधा या रेन लिली




आज टैरेस पर टहलते हुए

रजनीगंधा की भीनी ख़ुशबू
और रेन लिली की गुलाबी चमक
छा गई कहीं भीतर तलक...
बारिश भी आई
बस तुम्हारी ख़ुशबुओं की तरह...
तुम मुस्काई,
जैसे लटों पर
छतरी से फिसली कोई बूँद
झिलमिलाई हो चुपचाप...
अपने प्रिज्मीय अपवर्तन के साथ
तुम्हारे शब्द भी
उस पल हँस पड़े थे —
काश!
तुम होती रजनीगंधा
और तुम्हारी फ्रॉक पर
टँकी होती गुलाबी लिली...
और मैं, हाँ मैं
माली सा जुड़ा रहता
तुम्हारी देखभाल में
चुपचाप, मगर मगन...
काश! तुम होती
मेरे गमलों की कोई खिलती कविता...!
रचते रहता दिन रात 🥰

Tuesday, July 16, 2024

लव एंड लस्ट


वर्षों की पहचान, अंतरंगता और 

स्नेहिल सम्पर्क की सीढियों पर थम कर 

आया एक प्रश्न।

ये लव है या है लस्ट।

प्रेम व वासना के महीन अंतर में 

कहीं तैरने लगा एक जरुरी प्रश्न

पर क्या ही कहूँ कि अगर 

है दोनों जरूरी, है अन्योन्याश्रय


क्योंकि वर्षों की अंतरंगता के

बाद स्वीकारा तो है तुमने कि

कहीं हुआ तो नहीं प्रेम?

शायद ये एहसास है 

या वासना का ही उद्गार था

जो प्रश्न बन कर कौंध गया।


प्रश्न तो कभी कभी

बस होते हैं जरूरी

क्योंकि प्रेमिल संवाद को देते हैं ठौर।

ठीक कुछ ऐसा जैसे 

मेरे सपनीली अँधेरी शाम में

तुम हुई थी करीब

खोती हुई चेतना को मेरे कांधे पर रख कर

और मैं महसूस रहा था

उन गर्म सांसों से भरी आहों को

जो कॉलर के पास बनियान को भिगोती रही

और भीगता मेरा मन

कह ही उठा - ये वासना ही तो है

जो जी रहा हूँ इस खास पल को

तभी सपने ने टूट कर पूछा 

लव या लस्ट?


इस अजीब से प्लेटोनिक पल में

बेशक़ जी रही थी वासना

पर ढूंढ रही थी प्रेम को।

तभी तो तुम्हारे कांपते लबो ने कहा

मुझे वासना नहीं,

तुम्हारा प्रेम चाहिए।

और, और...मिला था एक बोसा।

शायद गर्माहट भरी साँसों ने

मेरे होंठों को काट लिया था।


सपनों को कहाँ पता होता है

किसी भी भावों का

वो तो गर्म चाय के केतली की

वो वाष्प है, जिसमें स्वाद नहीं होता

पर कह ही उठते हैं

आह, इस चाय पर मर जाऊं


पता है नहीं मिलेगा कभी

वो ख़ास आगोश

कि खुद से पूछूं -

जी रहा हूँ 'लव या लस्ट'

पर, पर सांसों की तरंगदैर्ध्य

हर उस पल में रही उच्चतम बिंदु पर

जब जब तुम थी कहीं 

मन के बेहद करीब।

हां, प्रेम को चाहिए गर्माहट 

है मन को जरूरत

तुम्हारी बांहों का आगोश 

हथेलियों ने हर बार 

खुद ही एकदूसरे को रगड़ कर

पैदा की है चिंगारी

चादर की सिलवटों ने भी 

उसी क्षण पूछा था

- क्या बॉस, लव या लस्ट।


अंततः बस कहना ही पड़ा

कितनी खूबसूरत हो तुम

ये तो कहलायेगा -  सिर्फ प्रेम।

एक यादगार तस्वीर 





Friday, March 29, 2024

चमकते रहना !!

 


दूर तक पसरा है कुहासा
शायद है असर प्रदूषण का
पर फिर भी
छमकती दिख रही हो तुम ही
कहीं ऐसा तो नहीं
कुहासे के मध्य
जैसे फ़ैल गया हो
सूर्यप्रकाश का उजास
पुरनम के चांद सा खिला सूरज
दिन निकल आया है
पर क्यों मन कहता है
दिन सिमटा रहे
हां, तुम्हारे होने का अहसास भर से
गरमाया हुआ है कमरा
कह रहा मन, कि हो कुछ ऐसा
जैसे कुहासे के बदरियों के बीच
यदाकदा आ रही हो
कुछ मोटर कारें कुछ ट्रकें कुछ बाइक्स भी
कर्तव्य-पथ पर दूर से नजदीक
और उनके लाइट्स की चकमक ऐसी
जो बता रही हर पल
तुम चमकती हो मेरे अन्दर
बेशक लोधी रोड से गुजरते हुए
लगा ऐसे जैसे, कुहासा हो चुका परिवर्तित
कोहरे में
पर घने होते नम बूंदों पर भी
होती है किरणें अपवर्तित या परावर्तित
फिर तुम्हारी चमक तो है मेरे अन्दर तक
समाहित
क्या करूँ, इतना ही कहूँगा
कुहासा हो या अँधेरा
चमकते रहना
आखिर तुम्हारे प्रिज्मीय गुणों में
तुमने कुछ चुम्बकत्व के गुणों को भी
सहेजा है
तभी तो अपने उतर-दक्षिण दिशा से इतर
आकर्षित होता रहा हूँ हर पल
चकमक प्रकाश हो मेरी तुम
उर्वर ही रहेंगी मेरी कल्पना
फिर से बोलूं ?
चमकते रहना !!
~ मुकेश



Tuesday, January 24, 2023

प्रेम केमेस्ट्री

 



न्यूटन ने सिर्फ तीन नियम दिए थे
उन दिनों, हम बच्चों के लिए
वही थी आधी फिजिक्स
और एक तुम हो
कितनी तो बात मानता हूँ तुम्हारी
पर, हमारी केमेस्ट्री ठीक ही नहीं होती
जबकि भगवान ने भी तो
मेरी बायोलॉजी में बहने वाली नर्वस सिस्टम को
तुम्हारे अलिंद-निलय से जोड़ा है
हाय मैं क्या करूँ मर जाऊं 😊
~ मुकेश




Friday, August 26, 2022

ज़ख़्म


सहेजा हुआ है, मैंने ज़ख़्म अपना छिले हुए टखने और कोहनी बता रही मेरी गुस्ताखियाँ दिखते हैं उस पर रक्त के धब्बे जैसे गुलाब की सुर्ख़ पंखुड़ियां देह मेरी जैसे मिट्टी-उर्वरक अंकुरित होती रही उस पर कुछ मासूम यादें, हमने उसके माथे पर लगा दिया है काजल का टीका ओस के निर्मल अहसास सी, बलबलाई खून की एक बूँद मेरे ही सूखे घाव पर ओह, सुवासित हो गयी पीड़ा भी अपने दर्द में अपनी गरम फूंक से दे रहा सांत्वना कि वो याद करती होगी न पक्का-पक्का क्यारियों में बेशक न खिल पाये गुलाब आखिर कौन सींचे हर दिन, हर पल पर, तुम्हारा दिया ज़ख़्म तो स्मृतियों में रिसता रहेगा ताउम्र वैसे भी, कुरेदे हुए घाव दिख जाते हैं सुर्ख लाल किसी ने कहा भी, कैक्टस के फूल खिलखिलाते हैं रेगिस्तान में आखिर कुछ टीस जिगर में ख़ुश्बू जो भरती है जिंदगी तुम बस दर्द देती रहना बेइंतहा ! माय लॉर्ड दर्द, जिन्दा रहना और जख्म को सहेजे रखना, जिन्दादिली का सबूत है न ! ~मुकेश~



Sunday, February 27, 2022

बारूद और प्रेम


जब हवाओं में
हो बारूद की गमक
उस समय सबसे जरूरी होती हैं
कि लिखी या पढ़ी जाएं
प्रेम कविताएँ।

ताकि 
बारूद के प्रयोग की आशंका
हो सके निर्मूल
प्रेमिल एहसासों से पगे
प्रेम पत्र बदल जाएं
संधियों के दस्तावेज़ में ।

प्रेम भी बेशक युद्ध ही है
पर इन गुलाबी युद्धों में
सेनापतियों पर बरसती हैं
गुलाबी पंखुड़ियां । 
ऐसे में बाणों को 
इश्क़ के इत्र से डुबो कर
छोड़ी जाती हैं बिन कहे,
गर लगे तो प्रेम सफल।

और न हुए सफल तो भी
मुस्कुराहटों के बादल ही संघनित होंगे।
...है न!

~मुकेश~



Thursday, February 3, 2022

मन्नत का धागा



कभी निहारना
मेरे घर से तुम्हारे घर तक
पहुंचने वाले रास्ते को
रास्ते में है एक पेड़
पेड़ पर बंधा मिलेगा
मन्नत का धागा
धागे का ललछौं रोली सा रंग
है रंग मेरे प्रेम का
बेशक जिंदगियां जी रही हैं
कठिनतम दौर में
विषाणु तैर रहे हवाओं में
फिर भी, लॉकडाउन के गलियारे में
जब भी चाहो मेरी उपस्थिति
बांध लेना उसी मौली को
कह देना धीमे से
"लव यू" - संस्कृत में
शायद प्रेम में बहती ये आवाज
शिवाले से आती
ॐ की प्रतिध्वनि सी हो
जो प्रस्फुटित हो
धतूरे के खिलने से
या आक के फूल के
बैगनी रंग में लिपटे अहसास तले
जिस कारण
शायद शिवलिंग से
छिटके एक बेलपत्र
जिस के तीन पत्तों में से
एक पर हो मेरा नाम
बाकी दो है न सिर्फ तुम्हारे खातिर
आखिर
तभी तो महसूस पाता हूँ कि
तुम चंदा सी छमकती हो
जटाओं के बाएं उपरले सिरे पर
मेरे चंदा
कल फिर उसी रास्ते से जाते हुए
तुम्हारे घर की सांकल को
हल्के तीन आवाज से बता दूंगा
कि हूँ तुम्हारे इर्द गिर्द
बेशक दूर-दूर पास-पास
के इस खेल में
समझते रहना
तुम प्रेम में हो, और मैं
मैं तो प्रेम समझता ही नहीं।
समझी न ! बकलोल !!
~मुकेश~


Wednesday, October 6, 2021

लखनवी प्रेम



मेरा प्रेम
था अलिंद के बाएं कोने पर
ऐसा रिक्त स्थान
जहाँ हमने सहेजी
सिर्फ व सिर्फ तुम्हारी मुस्कान
परत दर परत
चिहुंकती चौंकती खिलखिलाती
तो कभी मौन स्मित मुस्कान

ओ मेरे प्रेम
हो अगर इजाजत तो
बस, बहक कर कह दूं
क्यों लगती हो इतनी सुंदर
क्यों डिम्पल बनते गालों पर
छितरा जाती हैं लटें
जैसे गोमती ने बदला हो बहने का रास्ता
क्यों खो जाता हूँ
इन मुस्कानों के भूलभुलैया में,
इमामबाड़े सी हो गयी हो तुम
और मैं एक बेवकूफ पर्यटक
बिना गाइड के, खोया हुआ
तसल्लीबख़्स घूम रहा
हाँ पहुंच ही जाऊंगा अंततः
क्यों होना परेशान

जुल्फों का झटकना ऐसे
जैसे हो उसमें भी
नफासत से भरा लखनवी अंदाज
चिकन के कुर्ते सा
झक्क चमकता हुआ चेहरा
जिस पर थीं कुछ लकीरे
महीन कारीगरी थी बनानेवाले की।
सच में
कहूँ या न कहूँ
तुम्हारी मुस्कुराहटें मेरी हैरानियाँ,
तुम्हारी नादानियाँ मेरी गुस्ताखियाँ,
बिना इजाजत करती रहती है अठखेलियाँ
कहीं नबाबों वाली नबाबी तो नहीं?
~मुकेश~


Monday, June 21, 2021

सुनहरी बूंद


अलसुबह
मॉर्निंग मैसेज के प्रत्युतर में
पता नहीं कैसे तो
मोबाइल स्क्रीन पर
भीगा सा एक प्रदीप्त चेहरा मुस्काया
कुछ बूंदें छलमलाई
तीखे नयन नक्शों के ऊपर
छिटकते हुए
बूंदों ने टकरा कर सोचा पर वे कह नहीं पाए
हाय ये कैसा विघटन जल के संयोजन का
ऑक्सीजन की लहराती दरिया
छितरा गयी गालों पर
जबकि डिम्पल पर लटकते हुए हैड्रोजन मुस्काया
देवी तुमने हमें आजाद करवाया !

तब तक कुछ और बूंदों ने
जो इतवार के बहाने से
कुछ ज्यादा ही देर तक सोते रहे थे
कुछ देर से जग कर
चकमक चेहरे वाली बाला
जो जस्ट चेहरे को धो कर निहार रही थी आइना
उसके ही
लहराते लटों से ठुमकते हुए छिटके
कह उठे अलसाए आवाज में
झाँक ही लो मुझमें
मेरे प्रिज्मीय अपवर्तन और परावर्तन के वजह से
तुम कह सकते हो
है ये बाला - चंचल चितवन, स्नेहिल और खूबसूरत !

जिंदगी बहती है और बहते हुए ही जाना है
भरे हुए आँखों वाली के
पलकों से ठिठक कर एक सुनहरी बूंद ने कहा
नहीं जान देना है मुझे
प्लीज एक बार पलकों को हौले से समेटो
ताकि
जैसे हो तुम आगोश में
और मैं यानी बूँद समा जाऊं तुम्हारे ही नजरों में

खोना पाना भी तो शायद प्रेम ही है न !
क्या ऐसा सम्भव नहीं है क्या।

~मुकेश~


Thursday, April 15, 2021

सफर

 


याद आ रहा आज वो पहला सफर
जब वो एलएमएल वेस्पा के पीछे बैठ कर
कर रही थी नाखून से कलाकारी
और थी उम्मीद कि समझ पाऊँ
उन हिज्जे को कि शब्द क्या बोल रहे !

सफर के दरमियान आगे से आ रहा था
ट्रक, पर खोया था
गुलाबी अहसासों के दबाव को
बिना बनियान के पहने बुशर्ट पर,
हॉर्न की तीव्रता बता रही थी मेरी गलती
पर स्पर्श की रूमानियत
मौत को धप्पा कहते हुए ट्रक के सामने से
कुलांचे भरते हुए मुड़ी और फिर
टाटा बाय बाय कह कर ट्रक को,
फिर से खो जाना चाह रही थी
उस चित्रकार के तूलिका के स्पर्श को
जो मेरे बुशर्ट को समझ बैठी थी
गुलाबी कैनवास!

सफर और शर्ट बदलते रहे
कभी कभी बदल गए वाहन भी
पर नहीं बदली सड़क
न ही बदल पायी वो चित्रकार
और उसकी तूलिका ने हर बार
एक ही चित्र बनाई पीठ पर
हर बार सफर पर होने का अर्थ
हमने यही समझा कि
आज फिर से मोनालिसा
मुस्कुराएगी
आज फिर से पीठ पर
लिखा जाएगा प्रेम गीत

और क्या बताऊँ
कभी तो बिना वाहन के भी
उसने कहा चिट्ठियों के लिए है महफूज
ये पीठ
और कलम के निब के नोक जैसे
उसके नाखून करते रहे
संवाद या बताते रहे
गुस्से की बेवजह वाली वजह
कई बार सीखा बैलेंस बनाना
क्योंकि रीढ़ की हड्डियों को
रखना पढ़ता था स्थिर
ताकि नोट पैड पर निब के दबाव को समझूँ
और कहूँ धीरे से
आई अंडरस्टूड, ध्यान रखूँगा न, आगे से !

उसी ने समझाया था कभी
प्रेम में अंधा हो जाना चाहिए
ताकि संवाद की लिपि बदले
खैर, कुछ सेंस ऐसे ही जागृत हुए थे
फिर, जिंदगी बीतती चली गई पर आज भी
उस खास ब्रेल लिपि की सिहरन
महसूस लेता हूँ कभी कभी !

~मुकेश~