Friday, January 29, 2021
प्रेम
Wednesday, October 21, 2020
प्रेम कविता लिखने की शर्त
प्रेम कविता लिखने की शर्त लगी थी
इस तंज के साथ कि
आज तक मुझ पर नहीं रच पाया कोई
प्रेम कविता !
बिन कहे कुछ
सोचा कि
लिखूं तो क्या लिखूं
होंठ लिखूं या लिखूं गुलाब की गुलाबी पंखुडियां
जो कभी हुआ करते थे प्रेम पत्र के साथ
रुमानियत भरने के लिए
हुआ करता था जो जरूरी
या फिर लिखने से पहले
ताकूं सुरमई आँखों में
हाँ, नजरों में अटकना ही तो है शायद
प्रेम के पहले पग पर ठिठकना
अगर अटका तो खोया
फिसला तो, हमें पता है
कह ही दोगी
ओये लड़के उतनी दूर तक नहीं !
खैर, रहने दी कविता
कर ली अपनी आँखे बंद
और फील करने लगा मुस्कराहट
तभी तो फैले बाहों से इंद्रधनुषी आसमान के साथ
महसूसने लगा तुम्हारी आहट
थे मेरे हाथो में तुम्हारे हाथ
थी स्पर्श की उष्णता
शायद कहीं प्रेम कविता की मांग में था
छिपा हुआ विस्मयकारी प्रेम भी तो
सोचा लिखूं तुम्हारे भरे हुए कंधे
और लिखूं तुम्हारी आवाज सुरीली
तभी आवाज सोचते ही फना होने लगी रूह
धधकने लगा अलिंद और निलय के बीच
बहने वाला रुधिर
टूटती नींद के साथ खिलखिलाते सपने भी तो
तकिये के अगल बगल से चिढाते हुए कह उठे
कवि तुम प्रेम में तो नहीं हो उसके
कब आ चुकी थी निद्रा
कब नींद में भी बहकने लगा था मन
पता चला तब,
जब तकिये में दबाये चेहरे को
करने लगा देह की यात्रा
देह से देह तक
कमनीयता से नज़ाक़त तक
मन से मन तक पहुँचने से पहले
पर, कुछ अजब गजब सोच भी
होती है प्रेम में निहित
किसी ने बताया था कभी
फिर जैसे चुप्पी होती है वाचाल
वैसे ही सोया हुआ जिस्म दौड़ता है अत्यधिक
चलो हो चुकी है अब भोर
फिर कभी लिखूंगा तुम पर
प्रेम और प्रेम कविता
आज तो बस जान लो
कवि के मन की बात कि
खिलखिलाते हुए लोग होते हैं खूबसूरत !
हाँ फिर से कह रहा हूँ
मुझे प्रेम कविता लिखते रहनी हैं
हर नए दिन में नए नए
झंकार था टंकार के साथ !
समझी ना !
~मुकेश~
Tuesday, April 24, 2012
मेरे अंदर का बच्चा
मेरे अंदर का बच्चा
क्यूँ करता है तंग
अंदर ही अंदर करता है हुड़दंग ।
जब मैं था
खूबसूरत सा गोलमटोल बच्चा
तो मेरे अंदर का बच्चा
बना हुआ था पूरे घर का प्यारा।
दादा-दादी का दुलारा |
जब मैं हो गया था जवान
थी उम्र कुछ कर दिखाने की
थी उम्र प्यार की, रोमांस की
पर, वक़्त की जरूरत
व कमियों मे खोने लगा मैं
लेकिन वो अंदर का बच्चा
भर देता एक अदम्य ताकत मुझमें
लड़कर थके हुए जीवन
के शुरुआत मे भी
सँजो कर रखता था
हर एक नए दिन मे
मेरे अंदर का वो साहसी बच्चा
प्यार से कहता
"आज तू जरूर जीत पाएगा"
पर वो बात थी अलग
सुबह की जीत
बन जाती
शाम की हार |
फिर भी वो बच्चा
हर दर्द व विषाद के बाद भी
मुझमे भर देता खुशी
कुछ क्षणिक मुस्कुराहट
"कल जीतेंगे न" |
मेरे अंदर का बच्चा
क्यूं हर बार दिल से बनाये अपने को
क्यों दिखाता है गुस्सा
क्यों सँजो कर रखता है प्यार ।
आज़ भी वो बच्चा
कभी कूकता है कान मे
तो कभी खींचता है बाल
इस कठोर से जीवन मे भी
कभी तो लाता है मासूमियत
तो कभी कभी
मचलता है उसका दिल
भर देता है छिछोरी हरकत
मेरे अंदर का ये कमजोर बच्चा
पर छोटे से दुख मे भी कराहता है
छटपटता है ..।
ढूँढता है .। किसी को
पर किसको ? पता नहीं ?
मेरे अंदर का बच्चा
क्यूँ करता है तंग
अंदर ही अंदर करता है हुड़दंग ।





