जिंदगी की राहें

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Thursday, May 7, 2026

अनायास की यात्रा : जिम कॉर्बेट की ओर


पिछले गुरुवार की साधारण-सी ऑफिस ड्यूटी फाइलों और रूटीन की लय में बहती हुई, करीबन गुजर चुकी थी, शुक्रवार की छुट्टी थी । लेकिन जैसे ही शाम तक पहुंची , समय ने अचानक छोटा-सा ट्विस्ट लिया। चूंकि सामने तीन दिनों की छुट्टियाँ थीं, तो मेरे मित्र सदृश्य 'सर' ने एक सुंदर ऑप्शन दिया बिना किसी खास प्लानिंग के, एकदम स्पॉन्टेनियस-सा प्लान : जिम कॉर्बेट जाने का।

सब कुछ इतना फास्ट-फॉरवर्ड में हुआ कि अंजू से डिस्कस तक नहीं कर पाया। सुबह होते-होते हम व अंजू, मेरे मित्र सदृश्य बॉस अपनी फैमिली के साथ, कॉर्बेट के लिए निकल पड़े। यह सफर अनप्लांड जरूर था, लेकिन हर मोड़ पर इतनी खूबसूरती से खुलता गया कि लगा जैसे सब कुछ परफेक्टली प्लान्ड हो।

ढाई सौ किलोमीटर से ज्यादा की दूरी, बढ़िया सड़क, कम्फर्टेबल ड्राइव, और साथ में बेहद वॉर्म कंपनी के साथ तीन दिन कट गए। ड्राइवर की सहजता और गाड़ी की गति ने सफर को एफर्टलेस बना दिया। रास्ते में लंच लेते हुए हम अपने डेस्टिनेशन की ओर बढ़ते रहे, और टस्कर रिसोर्ट पहुँचते ही वहां की खूबसूरती व सुविधाओं से जैसे सारी थकान पीछे छूट गई।

कुछ घंटों के रेस्ट के बाद, शाम ने एक नया आमंत्रण दिया। ड्राइवर ने कहा, चलिये, एक मंदिर घुमा लाते हैं। करीब 15 किलोमीटर दूर, कोसी नदी के बीचों-बीच, एक छोटी-सी पहाड़ी पर बसा गर्जिया मंदिर, अपनी सादगी में अनोखा था । निर्माण कार्य चल रहा था, फिर भी उस जगह की स्पिरिचुअल आभा जस की तस थी। मंदिर कुछ ऐसा जैसे जैसे जल और शिला के बीच संतुलन साधे खड़ा हो। नदी की पतली, ठंडी, कल-कल करती धार मन के भीतर तक उतरती चली गई। लौटते-लौटते रात हो गई, और डिनर के साथ दिन ने सुकून से खुद को समेट लिया।

अगली सुबह अपने साथ एक नई उम्मीद लेकर आई। सर ने पहले ही कहा था कि कैंची धाम भी चलेंगे, लेकिन दूरी और समय देखकर प्लान कैंसिल हो गया था। पर रात में ड्राइवर ने सहजता से कहा, अगर सुबह छह बजे निकलें, तो नैनीताल के साथ कैंची धाम भी कवर हो जाएगा। नेकी और पूछ जैसी बात थी !

सुबह साढ़े छह बजे हम तैयार थे। पहाड़ों के बीच घुमावदार रास्ते, बीच-बीच में चाय, परांठे और कुछ कैमरा क्लिक्स 🙂 ने समय बिता दिया । हर मोड़ पर प्रकृति अपना नया फ्रेम खोल रहा था। लेकिन भवाली पहुँचते ही एक परेशानी सामने था, आगे गाड़ी जाना अलाउड नहीं था। भीड़ इतनी कि शटल से ही जाना संभव था, और शटल मिलना इम्पॉसिबल लगा । अपनी इनोवा पार्किंग में लग गईं लेकिन कुछ मिल ही नहीं रहा था, दूरी करीबन ग्यारह किमी थी ।



हमने रिटर्न का मन बना लिया था, तभी जैसे बाबा की अनदेखी कृपा ने साथ दिया, एक शटल अचानक सामने आकर रुक गई, और उसमें हमारे लिए जगह भी मिल गई। आगे बढ़े तो एक किलोमीटर पहले ही जाम। इस बार हमने पैदल चलने का निर्णय लिया। पहाड़ों की ढलानों से उतरते हुए, हल्की थकान और गहरी उत्सुकता के साथ हम कैंची धाम पहुँचे।

कैंची धाम, जहाँ नीम करोली बाबा की उपस्थिति आज भी महसूस होती है। 1964 में स्थापित यह स्थान, अपनी शांति और नैचुरल ब्यूटी के लिए जाना जाता है। कहते हैं कि Steve Jobs और Mark Zuckerberg भी यहाँ आ चुके हैं। हमने शांत मन से दर्शन किए और लौटते समय भीतर एक अजीब-सी फीलिंग्स महसूस हुई।

अब नैनीताल जाना था पर नई दिक्कत, भीड़ के कारण रास्ता बंद था । मूड थोड़ा ऑफ हुआ। लेकिन शायद यह यात्रा सिर्फ प्लान्स की नहीं, कृपा की भी थी। उसी रास्ते से हनुमान गढ़ी जाने की अनुमति मिल गई, शर्त बस इतनी कि दर्शन करके लौटेंगे, सिर्फ तीन किमी दूर मॉल रोड नहीं जाना है।

हमने हनुमान गढ़ी में दर्शन किए, और फिर जैसे कोई अदृश्य परमिशन मिल गई, हम मॉल रोड पहुँच गए। वहाँ की हलचल, झील की चमक, बोटिंग की धीमी लय, सब कुछ उस पल को जीवंत बना रहा था। लंच, थोड़ी घुमाई, और झील में बोटिंग, दिन अपने शिखर पर था। हल्की बूंदाबाँदी शुरू हो चुकी थी। लौट कर सोने की प्लानिंग शुरू हो गईं।

उधर हमारे ड्राइवर साब ने अगले दिन की जंगल सफारी भी बुक कर दी थी। जिसका कन्फर्मेशन आ गया था।



अगले दिन, सुबह साढ़े पाँच बजे पहुंचना, ठंडी हवा, रात की बारिश का असर, और ओपन जीप में बैठने की चुनौती 🙂 साथ आई । जंगल की खामोशी में हमारी जीप तेजी से आगे बढ़ रही थी। ठंड जैसे हड्डियों तक उतर रही थी, लेकिन आँखें शेर, बाघ या हाथी की तलाश में दूर तक टिकी थीं। हमारे साथ छोटा हीरो बायनोकुलर लेकर हर झाड़ी में कुछ ढूँढ़ रहा था।

पर उस दिन जंगल अपने रहस्यों को समेटे रहा, एक चूहा तक न दिखा। फिर भी, उस नैचुरल जंगल ने जो ताज़ी हवा हमारे भीतर भरी, वह किसी भी साइटिंग से कम नहीं थी। करीब दस बजे हम लौटे, रिसोर्ट का नाश्ता इंतज़ार कर रहा था।

दोपहर साढ़े बारह बजे चेकआउट, और फिर वही रास्ते लेकिन इस बार मन में यादों का एक पूरा एल्बम था। रात आठ बजे हम अपने-अपने घरों में थे, बेशक थके हुए, लेकिन भीतर से भरे हुए।



यह यात्रा सिखा गई कि हर प्लान का परफेक्ट होना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी अनप्लांड मोमेंट्स ही जिंदगी के सबसे खूबसूरत चैप्टर्स बन जाते हैं, जहाँ इटिनरेरी से ज्यादा, एहसास मायने रखते हैं… और जहाँ रास्ते खुद तय करते हैं कि हमें कहाँ पहुँचना है। 🥰

- मुकेश कुमार सिन्हा

Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दिनों में उम्मीद

बेशक

मिसाइलों की आवाज़

सिर्फ खबर नहीं,

नींद के बीच

काँपते हुआ एक डर है

मानवता के नाम पर...


ड्रोन की भनभनाहट

जैसे सिरहाने मंडराती बेचैनी,

और फाइटर प्लेन

दिल की धड़कनों पर

तेज़ उड़ान भरते हुए।

क्रेश करती प्रतीत होती है 


रात जो 

चीखों की रिपीट टेलीकास्ट है,

तभी तो अंततः 

टीवी बंद करना होता है 

पर दृश्य

अंदर कहीं चलते रहते हैं।


मन पूछता है

क्या सच में हम इतने बेबस हैं?

शायद, हमारे भीतर का मनुष्य

धीरे-धीरे म्यूट हो रहा है,


पर फिर,

एक छोटी-सी, 

शर्मिंदगी से भीगी उम्मीद

कहती है 

कि स्ट्रैट ऑफ़ होरमुज़ से

हमारे हिस्से के 

तेल-गैस के जहाज़

सही-सलामत आ जाएँ…


जैसे

ज़िंदगी अब बस

सप्लाई चेन पर टिकी हो।



Tuesday, January 6, 2026

Happy Birthday Rishabh ...

 


बुढ़ाते जीवन की थाती में

सबसे अमूल्य वही है,
पापा के रूप में
जिया गया
बेटे का बचपन।

वो छोटे-छोटे कथन
जो ऑफिस से लौटते हुए
सुनने पड़ते थे,
अब समझ आता है,
वही थे
सबसे खास, सबसे अहम्।

“पापा, पता है
आज मैम ने पूरे क्लास पर
नज़र रखने को कहा।”

“पापा, आज तो गज़ब ही हो गया—
मैडम ने सिर्फ मुझे कहा
Good Boy।”

“देखो पापा,
स्टार मार्क -
सिर्फ मुझे!”

“साइंस में सबसे ज़्यादा नंबर,
जूनियर सेक्शन का
Best Student प्राइज,
और पापा,
Astronomy Olympiad में Gold,
Maths में Silver!”

“पापा,
अंग्रेज़ी में Poem भी लिख ली है मैंने ।”

हर दिन
ऐसे ही, खुश होने लायक
ख़बरों के कतरन लेकर
साहबज़ादा करता रहा इंतज़ार,
और हमारा चेहरा
उसी की चमक से
दमकता रहा।

इनके बचपन को
हमने यूँ ही सहेजा।

वो दिन भी देखे
जब हम पापा-मम्मी
ऑफिस में होते,
और साहबज़ादा
दिन भर
टीवी से चिपका रहता।

पर मूड और ज़रूरत पड़े तो
छोटी उम्र से ही
देर रात क्या,
पूरी रात
किताबों में
फोड़ देता था कपार

ऐसे ही रहे ये हर समय।
अब हो गए हैं बड़े
पापा के साथ
रहती है गम्भीर-सी दूरी,
पर हाँ
बेतक़ल्लुफ़ बॉन्डिंग
अब भी है अम्मा के साथ

समय के साथ
साहब फोकस्ड हुए,
रही इनकी बस एक चाहत
हमने भी मन में सहेज रखी थी
कि IIT की
एडमिशन लिस्ट में
नाम हो इनका।

पूरी-पूरी रात
इनका पढ़ना
भी झेला है हमने ।
ख़ैर, भागते वक्त के साथ
IIT Engineer,
अब नौकरी में हैं।

इंतज़ार रहता है
इनके आने का,
पर समय और
Engagement का
बहाना
आ ही जाता है अक्सर

फिर भी
एक Parent के रूप में
हम हर समय
ख़ुश ही रहे हैं।

एक वक़्त था
जब मन कहता
कुछ भी कर लूँ
इनकी उम्मीदें
पूरी कर पाऊँ।
अब बस
इतनी-सी रह गई है
हमारी उम्मीद।
कि इनकी उम्मीद पर हम
बन पायें best ... !

बदलती उम्मीदों की नाव में
बहते जा रहे हैं हम
इसलिए
ख़ुशियों की दस्तक का
इंतज़ार बना रहता है।

वो दिन थे
जब हमारे आने से
पापा मुस्कुराते थे,
अब हम
उस इंतज़ार में रहते हैं

बच्चों के होने से ही
घर की खिड़कियाँ
खुलती हैं।

और जब
ख़ुशियों से भरी स्मृतियाँ
पंक्तिबद्ध हो जाती हैं,
तो बन जाती है
एक अनमोल कविता।

Happy Birthday, ऋषभ!


Thursday, September 25, 2025

बेटे के जन्मदिन पर



समय कितनी जल्दी सरक जाता है
कल तक नन्हें कदमों संग चलना था,
आज वही कदम
नई दिशाओं की ओर बढ़ चले हैं।

बेशक यादगार ज़िंदगी न दे पाए,
पर यादों में दर्ज है
गुस्से और मुस्कुराहटों का गुलदस्ता,
जो हमने तुम दोनों पर लुटाया था।

याद है मुझे
दिल्ली की गलियों में
तुम्हारे सहमे हाथों ने हमें थामा था,
हवाओं के थपेड़ों में
तुम हमारी पीठ से चिपके रहते थे।
बाइक पर मम्मी-पापा को कसकर पकड़े,
साहस जुटाते हुए,
हवाओं के झोंके सहेजते रहे
वही दृश्य आज भी आँखों में ताज़ा हैं।

अब जब तुम उड़ान भरो
सुदूर दक्षिण की ओर,
तो मन गर्व से भर उठता है,
हाँ, यही तो चाहते थे हम,
कि बेटा अपने सपनों का आकाश छू सके।

याद आया कि कैसे
दिन बीते, महीने और बरस गुज़रे,
तुम मुस्कुराते हुए दूर कॉलेज गए,
हम सोचते रहे—कैसे रहेंगे हम अकेले?
फिर समय बदला, लगा,
अब तो साथ का सान्निध्य बरसेगा।
पर तुम्हें और आगे जाना है,
क्योंकि तुम्हारे सपने बड़े हैं,
तुम्हारी ऊँची हैं उम्मीदें

ख़ैर…
अब स्नेह की तारें
मोबाइल और इंटरनेट से जुड़ेंगी।
पर क्या दूरियाँ
कभी मुस्कुराने की वजह बन सकती हैं?
फिर भी एक कोना भीग जाता है
सोचकर कि मुस्कुराहटें
अब स्क्रीन पर चमकेंगी,
गले की ऊष्मा
सिर्फ नेटवर्क की लकीरों में ढल जाएगी।

जाओ बेटा,
दुनिया जीतने की हसरतें समेटो।
बेशक कम पैसे कमाना,
पर ढेर सारा प्रेम लुटाना,
अथाह स्नेह बटोरना।
याद रखना कि
दुनिया का सबसे बड़ा खजाना
प्यार बाँटना है,
दिलों को जीतना है।

भाषा से परे भी
प्रेम समझा जाता है,
यहाँ तक कि ब्रेल लिपि में भी
दिल की रौशनी सुनहरी हो उठती है।

तुम्हारा सफ़र मंगलमय हो,
हर कदम पर ऊपरवाले का हाथ हो,
और हर मोड़ पर
अम्मा-पापा की दुआएँ
तुम्हारा आसमान बनकर
साया करती रहें।

जन्मदिन मुबारक हो, बेटे! 🎂💐



Friday, June 27, 2025

रजनीगंधा या रेन लिली




आज टैरेस पर टहलते हुए

रजनीगंधा की भीनी ख़ुशबू
और रेन लिली की गुलाबी चमक
छा गई कहीं भीतर तलक...
बारिश भी आई
बस तुम्हारी ख़ुशबुओं की तरह...
तुम मुस्काई,
जैसे लटों पर
छतरी से फिसली कोई बूँद
झिलमिलाई हो चुपचाप...
अपने प्रिज्मीय अपवर्तन के साथ
तुम्हारे शब्द भी
उस पल हँस पड़े थे —
काश!
तुम होती रजनीगंधा
और तुम्हारी फ्रॉक पर
टँकी होती गुलाबी लिली...
और मैं, हाँ मैं
माली सा जुड़ा रहता
तुम्हारी देखभाल में
चुपचाप, मगर मगन...
काश! तुम होती
मेरे गमलों की कोई खिलती कविता...!
रचते रहता दिन रात 🥰

Monday, May 5, 2025

चिट्ठियाँ

 

1.

चिट्ठियाँ,
जो कभी प्रेम की संवाहक थीं,
लौटती डाक में आकर
प्रेम की मज़ार बन गईं।

कभी कभी उन्हें पढ़ कर ही
चमकती आंखों का दीया दिखाता हूँ

चिट्ठियां लिखी जानी चाहिए।

2.
गलत पते पर भेजी गयी थी
जो तुम्हें चिट्ठियां
लौट कर बताती रहीं अहमियत
दो-दो बार

भेजने से ज़्यादा,
तब खुद से हो गया था प्यार।
जब वापस लौटी लिफाफे में से
खुद के लिखे गुलाबी शब्दों को
महसूस कर, खुद ही हुआ गुलाबी।

3.
ढलती उम्र में भी
सहेज रखा है मैंने —
तुम्हारी चिढ़, जलन,
वो चिट्ठियाँ और कलम भी।
सूखी गुलाबी पंखुडियां संग
स्नेह व अथाह प्यार भी

सब है धरोहर
कुछ पर्स में
कुछ बक्से में
कुछ दिल के गलियारे में !

4.
पुराने
प्रेम पत्रों को पढ़ते हुए
जी रहा था
हर्फ़-हर्फ़ प्रेम को
कुछ पन्ने गुलाबी हुए
कुछ ने रोष जताया
पर हर पन्ने ने व्हिस्पर कर
लगाई गुहार

- बचाये रखना प्रेम को ।

5.
मोबाइल चोरी हुई
नम्बर भी गया तुम्हारा
संदेशें जो कागज पर थे
बस वही रह गए
इतना बताने को कि

बस इतना बताने को था —
लिखा करो अब भी चिट्ठियाँ,
चाहे बेनाम, बेतिकाना ही सही।

...ठीक है न!

~मुकेश~



Wednesday, October 9, 2024

खिड़की




खिड़की के पल्ले को पकड़े
कोने से
जहाँ से दिख रहा था
मेरा वर्गाकार आकाश
मेरे वाला धूप
मेरा ही सूरज व चन्दा भी
मेरी वाली उड़ती चिड़िया भी...

दूर तक नजर दौड़ाए
छमकते-छमकाते पलकों के साथ
आसमान की ओर नजरें थमी
तो जेहन खन-खन बजता रहा
घनघनाती रही बेसुरी सांसे
पर लफ्ज नहीं बुदबुदाते
मोड़कर पलकें
जमीं की ओर
लौटती रही आंखें

ऐसे में, बस
इंतजार अंतहीन हुआ करता है

- मुकेश



Monday, September 9, 2024

~ प्रणय निवेदन, ऐसी भी ~

 


बेशक कभी जाहिर न कर पाया
कि करता हूँ प्रेम
या है कोई अलग सा आकर्षण
हां, कभी कहा भी तो वो लगा
ऐसे जैसे
दिया गया हो मित्रवत एप्लिकेशन

पर चाहतों का गुब्बारा उड़ता रहा
चाहते न चाहते
अटकते रहे, स्क्रॉल करते हुए
बातों मे आदरसूचक शब्दों के साथ भी
ढूंढते रहे, गुलाबी चमक
उम्र के ढलान पर
जीते रहे जिंदगी की आभासी शरारतों को

हाँ, मन के अंदर से हर वक्त आई
हल्की सी व्हिसपर करती हुई आवाज कि
किसी शाम बैठेंगे तुम्हारे साथ
चाय की चुस्कियों संग
और फिर कहेंगे धीमे से
कल भी आना, आओगी न...

और ये शाम बराबर आए,
बस इतनी सी रहेगी उम्मीद
ठीक न !

- मुकेश कुमार सिन्हा



Tuesday, July 16, 2024

लव एंड लस्ट


वर्षों की पहचान, अंतरंगता और 

स्नेहिल सम्पर्क की सीढियों पर थम कर 

आया एक प्रश्न।

ये लव है या है लस्ट।

प्रेम व वासना के महीन अंतर में 

कहीं तैरने लगा एक जरुरी प्रश्न

पर क्या ही कहूँ कि अगर 

है दोनों जरूरी, है अन्योन्याश्रय


क्योंकि वर्षों की अंतरंगता के

बाद स्वीकारा तो है तुमने कि

कहीं हुआ तो नहीं प्रेम?

शायद ये एहसास है 

या वासना का ही उद्गार था

जो प्रश्न बन कर कौंध गया।


प्रश्न तो कभी कभी

बस होते हैं जरूरी

क्योंकि प्रेमिल संवाद को देते हैं ठौर।

ठीक कुछ ऐसा जैसे 

मेरे सपनीली अँधेरी शाम में

तुम हुई थी करीब

खोती हुई चेतना को मेरे कांधे पर रख कर

और मैं महसूस रहा था

उन गर्म सांसों से भरी आहों को

जो कॉलर के पास बनियान को भिगोती रही

और भीगता मेरा मन

कह ही उठा - ये वासना ही तो है

जो जी रहा हूँ इस खास पल को

तभी सपने ने टूट कर पूछा 

लव या लस्ट?


इस अजीब से प्लेटोनिक पल में

बेशक़ जी रही थी वासना

पर ढूंढ रही थी प्रेम को।

तभी तो तुम्हारे कांपते लबो ने कहा

मुझे वासना नहीं,

तुम्हारा प्रेम चाहिए।

और, और...मिला था एक बोसा।

शायद गर्माहट भरी साँसों ने

मेरे होंठों को काट लिया था।


सपनों को कहाँ पता होता है

किसी भी भावों का

वो तो गर्म चाय के केतली की

वो वाष्प है, जिसमें स्वाद नहीं होता

पर कह ही उठते हैं

आह, इस चाय पर मर जाऊं


पता है नहीं मिलेगा कभी

वो ख़ास आगोश

कि खुद से पूछूं -

जी रहा हूँ 'लव या लस्ट'

पर, पर सांसों की तरंगदैर्ध्य

हर उस पल में रही उच्चतम बिंदु पर

जब जब तुम थी कहीं 

मन के बेहद करीब।

हां, प्रेम को चाहिए गर्माहट 

है मन को जरूरत

तुम्हारी बांहों का आगोश 

हथेलियों ने हर बार 

खुद ही एकदूसरे को रगड़ कर

पैदा की है चिंगारी

चादर की सिलवटों ने भी 

उसी क्षण पूछा था

- क्या बॉस, लव या लस्ट।


अंततः बस कहना ही पड़ा

कितनी खूबसूरत हो तुम

ये तो कहलायेगा -  सिर्फ प्रेम।

एक यादगार तस्वीर 





Friday, March 29, 2024

चमकते रहना !!

 


दूर तक पसरा है कुहासा
शायद है असर प्रदूषण का
पर फिर भी
छमकती दिख रही हो तुम ही
कहीं ऐसा तो नहीं
कुहासे के मध्य
जैसे फ़ैल गया हो
सूर्यप्रकाश का उजास
पुरनम के चांद सा खिला सूरज
दिन निकल आया है
पर क्यों मन कहता है
दिन सिमटा रहे
हां, तुम्हारे होने का अहसास भर से
गरमाया हुआ है कमरा
कह रहा मन, कि हो कुछ ऐसा
जैसे कुहासे के बदरियों के बीच
यदाकदा आ रही हो
कुछ मोटर कारें कुछ ट्रकें कुछ बाइक्स भी
कर्तव्य-पथ पर दूर से नजदीक
और उनके लाइट्स की चकमक ऐसी
जो बता रही हर पल
तुम चमकती हो मेरे अन्दर
बेशक लोधी रोड से गुजरते हुए
लगा ऐसे जैसे, कुहासा हो चुका परिवर्तित
कोहरे में
पर घने होते नम बूंदों पर भी
होती है किरणें अपवर्तित या परावर्तित
फिर तुम्हारी चमक तो है मेरे अन्दर तक
समाहित
क्या करूँ, इतना ही कहूँगा
कुहासा हो या अँधेरा
चमकते रहना
आखिर तुम्हारे प्रिज्मीय गुणों में
तुमने कुछ चुम्बकत्व के गुणों को भी
सहेजा है
तभी तो अपने उतर-दक्षिण दिशा से इतर
आकर्षित होता रहा हूँ हर पल
चकमक प्रकाश हो मेरी तुम
उर्वर ही रहेंगी मेरी कल्पना
फिर से बोलूं ?
चमकते रहना !!
~ मुकेश



Wednesday, December 6, 2023

स्त्री : पुरुष

 


पंखे के नीचे

बिस्तर पर लेटा था पुरुष
पर सपने में तितलियों सी तैरती रही स्त्री
स्कूटर के धुएं से जब
प्रकृति को नष्ट करता रहा पुरुष
तो कमर पकड़े सहचर सी, पीछे बैठी थी स्त्री
यहां तक कि कॉलेज नोट्स से
ज्ञान बटोरने की कोशिश कर रहा था पुरुष
तो किताब के पन्ने से टपकी तस्वीर, मुस्काई स्त्री
कामाग्नि में अंधा
स्त्री-देह जलाता, अपराध करता पुरुष
पर चाहते, न चाहते फिर भी, सहचर बन गई स्त्री
जब बंजर जमीन पर, बुझे मन से
प्रेम तलाश रहा था पुरुष
तब भी दूर हरियाई धरती सी ताक रही थी स्त्री
पुरुष हरसमय ढूंढता रहा स्त्री।
स्त्री मान बढ़ाती कहती रही, तुम सर्वश्रेष्ठ हो पुरूष !
... है न!
- मुकेश





Monday, September 4, 2023

!! चाँद !!

1.
कुछ खूबसूरत चाँद की आँखों में
होती है पनियाई उम्मीदें
जो लहरों को भी
बुला ही लेती है
बेहद पास।...
2.
हर रात का चाँद हु-ब-हु है
तुम्हारे जैसा
वही हुश्न वही गरूर..
और वही दूरी भी ।
3.
थक कर बेचारा चाँद भी
आया मेरे कश्ती में
कह रहा तुम चलाओ चप्पू
मैं खो जाऊं तुम्हारे बस्ती में ...... !!
~मुकेश~



Wednesday, February 22, 2023

ऑफिस टेबल और प्रेम

 


जिंदगी
टेबल पर रखे चश्मे
फोन के उलझे तारों
और सैनिटाइजर भी
साथ ही, डेस्कटॉप के स्क्रीन
पंच, स्टेपलर और
फंसी रह गयी चाभियों में
भागी जा रही।
सोचा था चश्मे से दिखोगी करीब
पर हो चुकी हो बेहद दूर
सुनना चाहता हूँ आवाज
पर उलझते तारों व संचार कनेक्शन ने
वो भी किया दूर
फिर भी चाहतें ऐसी कि
ग्लू स्टिक से चिपका रखा तुम्हारे तस्वीर को
मन के अंधियारे में
ताकि रखूं बेहद पास।
चाभियाँ याद दिला रही
प्रॉब्लम है इग्निशन का
कैसे लौटोगे, ओर आते हुए
दिखी थी लहराती हरियाली भी
जो दिलाती है याद
तुम्हारे अनदेखे चमक का
चलो पी कर बिसलरी जूस या पानी ही
करता हूँ फिर से याद !
पर,
अब भी बार-बार आ रही हिचकी
याद आने का सूचक तो नहीं !
खैर
अपनी किताबों के अंदर की कुछ पंक्तियाँ
आज करके समर्पित
बस इतना ही कहूंगा कि
हाँ, याद आती ही रही हो
बराबर।
(टेबल के वस्तुओं की लिस्ट भी कविता हो सकती है न !)
~मुकेश~



Tuesday, January 24, 2023

प्रेम केमेस्ट्री

 



न्यूटन ने सिर्फ तीन नियम दिए थे
उन दिनों, हम बच्चों के लिए
वही थी आधी फिजिक्स
और एक तुम हो
कितनी तो बात मानता हूँ तुम्हारी
पर, हमारी केमेस्ट्री ठीक ही नहीं होती
जबकि भगवान ने भी तो
मेरी बायोलॉजी में बहने वाली नर्वस सिस्टम को
तुम्हारे अलिंद-निलय से जोड़ा है
हाय मैं क्या करूँ मर जाऊं 😊
~ मुकेश




Friday, August 26, 2022

ज़ख़्म


सहेजा हुआ है, मैंने ज़ख़्म अपना छिले हुए टखने और कोहनी बता रही मेरी गुस्ताखियाँ दिखते हैं उस पर रक्त के धब्बे जैसे गुलाब की सुर्ख़ पंखुड़ियां देह मेरी जैसे मिट्टी-उर्वरक अंकुरित होती रही उस पर कुछ मासूम यादें, हमने उसके माथे पर लगा दिया है काजल का टीका ओस के निर्मल अहसास सी, बलबलाई खून की एक बूँद मेरे ही सूखे घाव पर ओह, सुवासित हो गयी पीड़ा भी अपने दर्द में अपनी गरम फूंक से दे रहा सांत्वना कि वो याद करती होगी न पक्का-पक्का क्यारियों में बेशक न खिल पाये गुलाब आखिर कौन सींचे हर दिन, हर पल पर, तुम्हारा दिया ज़ख़्म तो स्मृतियों में रिसता रहेगा ताउम्र वैसे भी, कुरेदे हुए घाव दिख जाते हैं सुर्ख लाल किसी ने कहा भी, कैक्टस के फूल खिलखिलाते हैं रेगिस्तान में आखिर कुछ टीस जिगर में ख़ुश्बू जो भरती है जिंदगी तुम बस दर्द देती रहना बेइंतहा ! माय लॉर्ड दर्द, जिन्दा रहना और जख्म को सहेजे रखना, जिन्दादिली का सबूत है न ! ~मुकेश~



Thursday, August 18, 2022

लिपस्टिक


 

------------
आलमीरा में चिपके आईने पर
चिपकती हुई युवती
या यूं कहूँ कि अर्द्ध चंद्राकार मुड़कर
नशीले नजरों से निहारते हुए
चला रही थी उँगलियाँ
और बस गुलाबीपन
पसरता जा रहा था होंठो पर
जो गुलाबी होंठ को कर रहा था
सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों सा
थी शायद कुछ ऐसी जल्दी
जैसे एक व्यक्ति ने कुछ
लगातार पोस्ट डेटेड चेक पर करते हुए हस्ताक्षर
ली हो जम्हाई
और फिर से उंगली घुमाई
बेशक फलो गड़बड़ाया
पर फिर भी सिग्नेचर उग आई चेक के पत्ती पर
हाँ होंठ के बाएँ कोने से ज्यादा ही छितरी लग रही थी
पर कोई ना, होता है
एक्वेरियम में
फडफड़ाती लाल मच्छलियों सी
दर्द के बावजूद चमकती छमकती सी
दृढ़ निश्चय की लाली सहेजे
हर गुजरने वाले को
करती है आकर्षित
उद्दाम आकर्षण
और रंग का प्रतिफल
जा चुकी स्त्री के द्वारा छोड़ा हुआ ग्लास
कुछ बची रह जाती है कॉफी
और ग्लास के कोने पर रह जाते हैं
मासूम गुलाबी एहसास
जैसे सिल्ड वसीयत पर लगा हो सरकारी ठप्पा
वो आई ही थी ' का कन्फ़र्मशन
एनिवे
जिंदगी का गुलाबी होना जरूरी है न
तो, गुलों से कह दो फूल खिलखिला रहे ।
~मुकेश~



Wednesday, April 6, 2022

हुकूमत



रात
नींद
सपने
बिस्तर
देह
और आराम
फिर
इन सबका घाल मेल
और इनके बीच
घुसपैठ करती तुम
ऐसे कोई कहता है क्या कि
मुझ पर कविता लिखना
हर जगह तो दिखाती हो हुकूमत
रात की चंदा
नींद के सपने
सपने की नायिका
बिस्तर की सिलवटें
देह की सिहरन
और, और आराम की खूबसूरत खलल बनकर
क्यों पहुंचती हो इस हद तक
कि कविता पहुंचें
हदों के पार
खैर, मानोगी थोड़ी
नींद के साथ, नींद से पहले भी
आया ही करोगी तुम
वजह बेवजह।
आती रहना !
... है न!
~मुकेश~