जिंदगी की राहें

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Thursday, March 26, 2026

युद्ध के दिनों में उम्मीद

बेशक

मिसाइलों की आवाज़

सिर्फ खबर नहीं,

नींद के बीच

काँपते हुआ एक डर है

मानवता के नाम पर...


ड्रोन की भनभनाहट

जैसे सिरहाने मंडराती बेचैनी,

और फाइटर प्लेन

दिल की धड़कनों पर

तेज़ उड़ान भरते हुए।

क्रेश करती प्रतीत होती है 


रात जो 

चीखों की रिपीट टेलीकास्ट है,

तभी तो अंततः 

टीवी बंद करना होता है 

पर दृश्य

अंदर कहीं चलते रहते हैं।


मन पूछता है

क्या सच में हम इतने बेबस हैं?

शायद, हमारे भीतर का मनुष्य

धीरे-धीरे म्यूट हो रहा है,


पर फिर,

एक छोटी-सी, 

शर्मिंदगी से भीगी उम्मीद

कहती है 

कि स्ट्रैट ऑफ़ होरमुज़ से

हमारे हिस्से के 

तेल-गैस के जहाज़

सही-सलामत आ जाएँ…


जैसे

ज़िंदगी अब बस

सप्लाई चेन पर टिकी हो।



1 comment:

M VERMA said...

त्रासद है मनुष्य का म्यूटेशन
Supply chain आज नहीं तो कल खुल ही जाएगा
विचारणीय