जिंदगी की राहें

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Tuesday, January 13, 2015

प्रेम का बुखार


जिंदगी इतनी आसान तो नहीं
जरुरी है ऑक्सीजन व भोजन
प्यास भी लगेगी ही
बिन साँसों के जी सकते हैं क्या?
वैसे ही कोर ऑफ़ द हार्ट में
संजोये तुम्हे जी रहें हैं न !
यानि जीने की बुनियादी जरुरत
मेरे लिए
भोजन, साँसे और
यादें, वो भी सुनहरी वाली !
याद है, होने पर बुखार
मैया सुलाए रखती दिन भर
नहीं मिलता था खाना तक
कहती पियो बार्ली या होर्लिक्स
फिर वो प्रेम का फीवर
कहाँ था इतना आसान
डिग्री फोरेनहाइट में तरंगित होता अहसास
जलते नंबर टेन सिगरेट का
फ़िल्टर रहित धुंआ
अन्दर तक जला देने वाली क्षमता
फिर एक अजीब सी शांति
श्वांस नली से फेफड़े फिर दिल तक!
उसकी याद और संजोया प्रेम
प्रेम के ताप से अब तक दहकता बदन
दो जोड़े होंठ
उसके बीच का विधुर्वी चुम्बकत्व
ऐसे जैसे कम्पास सुई को रखो कैसे भी
दिशा उत्तर दक्षिण ही दिखाएगी
है न सच!
वो उत्तर, मैं दक्षिण
बहुत दूर - बहुत पास !
अजब गजब प्रेम का बुखार !
~मुकेश~

Hamming bird on palm :)

Thursday, March 7, 2013

ऐ हसीना !!


आज महिला दिवस पर कुछ पंक्तियाँ अपने जिंदगी से जुड़ी सबसे खूबसूरत महिला को समर्पित करता हूँ, आखिर जिंदगी तो उसी से है .... कुछ साधारण से शब्द उसके लिए

ऐ हसीना !!
क्या तू बन पाएगी मेरी रचना
शब्द मे सज पाएगी कभी
क्या कभी चंचल शोख अदा
ढल पाएंगे, बन पाएंगे नज्म
बालों का झटकना
कैसे दिखाऊँ अपने हरफ़ों मे
गोरा सुर्ख चेहरा, छरहरा बदन
नारी की नजाकत
कैसे लाऊं शब्दो मे ??
.
चलो कोई नहीं
तुम्हारे से ही
हो जाएगी कविता सृजित
आखिर ये रचना तुम्हें ही तो
करनी थी अर्पित
अब तो मुस्कुरा दो........

कुछ ट्रोफिज में से एक सबसे अहम .....:):):

Friday, March 1, 2013

ऐ भास्कर !



10 फरवरी को विश्व पुस्तक मेला में लोकार्पित हुई 
मेरे सह सम्पादन मे साझा कविता संग्रह "पगडंडियाँ" से मेरी एक रचना आप सबके लिए...
ऐ भास्कर !
सुन रहे हो
आज मान लेना एक नारी का कहना 
आजकल हो जाती हूँ लेट
तो थोड़ा रुक कर डुबना !!
तुम सब ही तो कहते हो
नारियों आगे बढ़ो
घर से बाहर निकलो
निभाओ जिम्मेवारी
पर ये घूरती आंखे ??
डरा देती है यार
तो मान लेना मेरा कहना
थोड़ा रुक कर डुबना !!
क्या करूँ? क्या न करूँ?
समय जाता है बीत
फिर इस तिमिर में
आती है फब्तियों की आवाज
रखती हूँ साहस, पर
कंपकंपा ही जाती है हड्डियाँ
सुनो! मान लेना मेरा कहना
थोड़ा रुक कर डुबना !!
इस दौड़ते शहर मे
भागती जिंदगी मे
नहीं है समय किसी के पास
फिर भी दिखते ही अकेली नारी
सदाचारी, ब्रहमचारी या अत्याचारी
सबको मिल जाता है समय
इसलिए कहती हूँ प्यारे, सुन लेना
थोड़ा रुक का डुबना !!
ऐ रवि !!
इस रक्षा बंधन में
रख दूँगी रेशम का धागा तेरे लिए
अब तो तू भी बन गया भैया
करेगा रक्षा, मानेगा मेरा कहना
बस थोड़ा रुक कर डुबना !!
मेरे घर तक लौटने पर ही डुबना !!
मानेगा न कहना !!

अगर ये संग्रह आप खरीदना चाहें तो 150/- मूल्य की पुस्तक सिर्फ 120/- मे www.infibeam.com, ebay.in, bookadda.com etc. साइट से खरीद सकते हैं... 


Monday, December 31, 2012

शुभकामनायें.....



सुना था इक्कीस दिसम्बर को धरती होगी खत्म
पर पाँच दिन पहले ही दिखाया दरिंदों ने रूप क्रूरतम
छलक गई आँखें, लगा इंतेहा है ये सितम
फिर सोचा, चलो आया नया साल
जो बिता, भूलो, रहें खुशहाल
पर आ रही थी, अंतरात्मा की आवाज
उस ज़िंदादिल युवती की कसम
उसके दर्द और आहों की कसम
हर ऐसे जिल्लत से गुजरने वाली
नारी के आबरू की कसम
जीवांदायिनी माँ की कसम, बहन की कसम
दिल मे बसने वाली प्रेयसी की कसम
उसे रखना तब तक याद
जब तक उसके आँसू का मिले न हिसाब
जब तक हर नारी न हो जाए सक्षम
जब तक की हम स्त्री-पुरुष मे कोई न हो कम
हम में न रहे अहम,
मिल कर ऐसी सुंदर बगिया बनाएँगे हम !!!!
नए वर्ष मे नए सोच के साथ शुभकामनायें.....


Saturday, December 29, 2012

वो जीना चाहती थी


वो जीना चाहती थी 

वो खुशहाल जिंदगी चाहती थी 
अम्मा-बाबा के सपने को पूरा करना चाहती थी ...........

अम्मा-बाबा ने साथ भी दिया 
एक छोटे से शहर से डर-डर कर ही सही 
पर भेजा था उसे इस मानव जंगल में 
वो भी उनके अरमानो को पंख लगाने हेतु 
फिजियोथेरपी की पढाई में अव्वल 
आ करा आगे बढ़ना चाहती थी 
वो जीना चाहती थी ......

वो जीते हुए पढना और बढ़ना चाहती थी 
वो नभ को छूना चाहती थी 
वो सिनेमा हाल से ही तो आयी थी उस समय 
जब उसने परदे से मन में उतारा था सतरंगी सपना ....
वो खुश थी उस रात, 
जब घर पहुँचने की जल्दी में चढ़ गए थी 
सफ़ेद सुर्ख पब्लिक बस पर 
वो तो बस जीना चाहती थी ....

उस सुर्ख सफ़ेद बस के अन्दर 
एक जीने की चाह रखने वाली तरूणी के साथ 
छह दरिंदो ने दिखाई हैवानियत 
उसने झेला दरिंदगी का क्रूरतम तांडव 
इंसानियत हुई शर्मसार 
फिर भी, हर दर्द को सहते हुए पहुंची वो अस्पताल 
तो उसने माँ को सिर्फ  इतना कहा 
माँ मैं जीना चाहती हूँ .........

तेरह दिन हो चुके थे 
उस क्रूरतम दर्द के स्याह रात के बीते हुए 
पर उसकी बोलती आँखे ....
जिसमे कभी माँ-बाबा-भाई का सपना बसता था 
दर्द से कराहते हुए भी 
उसने जीने का जज्बा नहीं छोड़ा 
तीन-तीन ओपरेशन सहा,फिर भी 
अस्पताल के आईसीयू से हर समय आवाज आती 
वो जीना चाहती थी ...

अंततः ऊपर वाले ने ही दगा दे दिया 
उस नवयुवती ने आखिर 
अंतिम सांस लेकर विदा कर ही दिया ....
आखिर जिंदगी को हारना पड़ा 
पर हमें याद रखना होगा 
"वो जीना चाहती थी"
वो बेशक चली गयी पर,
अब भारत के हर आम नारी में उसको जीना होगा 
हर भारतीय नारी को याद रखना होगा 
वो जीना चाहती थी 
वो तुम में जिन्दा है ...
__________________
आज सोलह दिसंबर है........!!


Thursday, January 6, 2011

नारी या पुरुष??


चल रही थी बहस
नारी या पुरुष??
एक सुदर्शना नारी
जो थी बड़ी प्यारी
लरजते हुए बोली
सज्जनों!
माटी की बनी मैं
पर माटी  में ही सिमट कर रह गयी मैं

कभी बेटी का फर्ज निभाया
कभी बहन के रूप में घर को चहकाया
कभी अर्धांगिनी बन कर निभाया
या माँ की ममता का नेह बरसाया
कर दिया अपने को अर्पित
जीवन समर्पित
पर न बन पाई पहचान
क्यूंकि इन पुरुषो के आगे
बिखर गये हमारे अरमान!!!

तभी पीछे की पंक्ति से
आई एक कड़कती आवाज
हमारी भी सुनो
बेशक हम कहलाते हों जंवाज
हमने शिद्दत से छिपा रखा है दर्द
वो अब हो गयी है सर्द
ये दुनिया है बेदर्द
बहुत हो गयी पौरुष की बात
अब नही हो पाता दर्द आत्मसात

हे नारी!!  जब तुम थी बेटी!
पापा ने तुम्हें जिंदगी के पथ पर चलना सिखाया
जब तुम थी बहन
हर पल राखी के बंधन
की रक्षा, तेरे भाई के मन में रहा
जैसे ही तू बन के आयी अर्धांगिनी
ता-जिंदगी तुझे खुश रखने का
सातो वचन तेरे पति ने निभाया
फिर माँ की अनमोल ममता
और दूध के कर्ज में
जीवन-पर्यंत बेटे ने बिना कुछ कहे
अपना जीवन लुटाया!!!

सच तो ये है
जिंदगी है एक तराजू
जिसमे एक के साथ करो न्याय
तो दुसरे के साथ दिखता है अन्याय
और इस तराजू के दोनों पलडो
से कर सकते हो तुलना
नारी और पुरुष की.................!

अब बोलो
नारी या पुरुष?
नारी या पुरुष?
नारी या पुरुष ???????



वैसे तो बस कुछ शब्द बुने हैं मैंने, क्यूंकि मैंने बराबर पढा की हर नारी का पूरी जिंदगी शोषण हुआ है.....उसके  हर रूप के साथ! बेशक हम भारत वासी उससे देवी के रूप में पूजते हैं, लेकिन आज की जिंदगी में हम पुरुषों का भी तो शोषण होता है..हम किसे कहेँ.....हमारी पीड़ा को कौन समझेगा....................

पढ़े और बताएं....अगर त्रुटी बताएँगे तो जायदा ख़ुशी होगी...............:)



वैसे एक बात और आज मेरे छोटे सुपुत्र "ऋषभ कीर्ति सिन्हा (रिशु)" का जन्मदिन भी है.
आपकी शुभकानाएं मुझे ख़ुशी देगी और उसे जिंदगी में सफलता  ...:)