जिंदगी की राहें

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Saturday, April 14, 2018

मेरा दो कमरे का घर


प्रकाशित 

हुआ कुछ ऐसा कि
शहरी जंगल में बसा मेरा दो कमरे का घर
घर की छोटी सी  छत
वहीँ कोने में कुछ गमले
थोड़ी सी हरियाली
थोड़ी रंगीन पंखुरियां
खिलते फूलों व अधखिली कलियों की खुश्बू
एक दिन, अनायास गलती से, गुलाब के गमले में
छितर गईं थीं कुछ पंखुरियां,
फिजां भी महकती
वाह! क्या अहसास और कैसी थी ताजगी !!

साथ ही, कुछ और भी हुआ ऐसा कि
एक प्यारी सतरंगी तितली
जिसका लार्वा बेशक पनपा था
गाँवों के गलियारे में
पर, भटक कर, छमक कर,
धुएं के दावानल में बहकर
पहुंचा
शहर की पथरीली नदियों सी सड़क पर
बैठ न पाया कहीं, इस तपती धरती पर
न, ही कर पाया फूलों के निषेचन में
कोई भी सहयोग !!
निराश फूलों के पराग सूखते गए, उम्मीदों के साथ !!

वही चमकीली इंद्रधनुषी तितली
आज नामालूम
कैसे फड़फड़ा रही थी
 गमले की गुलाबी पंखुड़ियों पर
बैठी थी एकाकीपन के साथ
पर थी रंगत ऐसी
जैसे अन्दर से खिलखिलाहट उमड़ रही हो !

बेचारी तितली ने पता नहीं
कैसे क्यों कब, कितने किलोमीटर का काटा सफ़र
अब जा कर उस पंखुड़ी पर
सुस्ताते हुए जी रही थी
पंखों पर लिपट रहे थे
उन्मुक्त पराग कण
जिससे, कुछ उसके पंखो का बदला हुआ था वर्ण
मेरे मोबाइल के कैमरे की क्लिक
कर रही थी अब बयान
- इस शहरी जंगले में
खिले फूल की सार्थकता !!

लगा कुछ ऐसा, जैसे कहा हो तितली ने
- थैंक यू !!

ऐसे ही हर, छत पर खिलाओ न गुलाब ! प्लीज !!
जिंदगी सतरंगी उम्मीदों भरी हो
बस इत्ती सी चाहत :-)


Thursday, May 5, 2016

मैं और मेरा शहर



बैद्यनाथ धाम मंदिर, देवघर

पूर्वा एक्सप्रेस से उतरा ही था
पत्नी बच्चों के साथ ,
अपने छोटे से शहर के बड़े से रेलवे स्टेशन पर ....... !!

लम्बे समयांतराल के बाद,
ट्रेन से उतरते ही लगा जैसे
एकदम से टकराई सौंधी हवा और बोली .. !!

मिले, खिल उठे, दिल और दिमाग
पहुँच गए टावर चौक
बैठ गए, एक छोटी सी चाय की दुकान पर
मैं और मेरा शहर
मेरे शहर का था आर्डर - दो बड़े कुल्ल्हड़ में चाय !!

बात निकली तो दूर तक चली
चमकीली सड़कें व
सरकारी योजनाओं के बखान करते होर्डिंग्स
कुछ थम्स अप / स्प्राईट की गर्मी बढाते होर्डिग्स
दमकते हुए छमक रहे थे !!
इतने तक तो कुछ नहीं
रूपा की अंडर गारमेंट्स के होर्डिग भी स्वागत कर रहे थे
बाबा भोले के नगरी में आने का !!

यातायात के साधनों की बाढ़ थी यहाँ भी
बता रहे थे जैसे पैसे, जेबों से बह रहे हों,
बेशक सड़कों की चौडीकरण की बलि चढ़ चुकी थी
वाहनों के बढती संख्या और अतिक्रमण पर !!
वैसे आज भी सड़कों के किनारे,  नालियों से निकले और फेके गए
गंदगियों के ढेर से छोटे पर्वत, होते हैं निश्चित दूरी पर
शहर की चाल हो चुकी थी चुस्त से सुस्त
हाँ, ट्रेफिक पुलिस की कड़क वर्दियां हो गयी थी चुस्त !!

मोबाइल के टावरों की संख्या व
लेड लाइटों के पिलर्स की भी
संख्या में हो गयी थी बढ़ोतरी
पर, वो बात थी अलग कि उर्जा संरक्षण की बातें भी चलती थी
क्योंकि बिजली अभी भी जाती थी बदस्तूर ... !

रूप रंग बदलता बाजार
टावर चौक से मंदिर तक का मार्ग और उसकी चहल पहल
ठीक जैसे, अब मैं भी पहनने लगा हूँ, जींस की पेंट
वैसे ही मेरे शहर ने भी बदली थी ड्रेस... !!
ज्योतिर्लिग मंदिर की आभा अभी भी वैसी की वैसी, कुछ प्रशासन का जोड़, कुछ पंडो का,
पंक्तिबद्ध हो गए भक्तगण .....
वैसे ही महादेव की गूँज, चहुँ ओर !!

पर, जो भी हो, जितनी भी हो गंदगी या प्रदूषण
हमें तो लगा, जैसे अब भी यहाँ की आबोहवा है ताजा
जैसे बरसों पहले अपने बालों से लहरा कर गिराई थीं मेरे चेहरे पर कुछ ताज़ा बूँदें

कॉलेज नए रंग रोगन में लग रहा था अजूबा सा
तिस पर चारदीवारी भी बन चुकी थी
वो कॉलेज के क्लास से बैठे बैठे
दूर तक देखने की स्वतन्त्रता छिन चुकी थी.....!!

खुद के विकास का तो कोई अता पता नहीं पर
खरगोश की तरह उछल कर हम बेशक पहुँच गए थे महानगर
लेकिन धीरे धीरे ही सही, कछुए की चाल में विकास को प्राप्त कर
मेरा शहर, झपकियों के साथ, सो रहा था ..ऊँघ रहा था ताज़ी ठंडी हवा का मौन साक्षी हो कर !!
--------
मैं और मेरा शहर चाय के कुल्हड़ के साथ !!

छोटकू से बच्चे के  हाथों  छुटकी  सी चिड़िया

Friday, July 3, 2015

शहर बैद्यनाथ का .


एक सोता-ऊंघता शहर, जिसका शहरी नाम है देवघर !
संथाल परगना, झारखंड के सुरमई इलाके में

बम-बम बम-बम, बोलो बम, जय महादेव, देवाधिदेव
जैसे करतल ध्वनि के साथ, गुंजायमान है शहर !
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक,
बाबा बैद्यनाथ के इर्द-गिर्द बसा ये शहर !

बस, नहीं है इसको कोई फिकर
तभी तो
सैकड़ों गलियों और तालाबों के किनारे बसा
धार्मिक कोलाहल से परिपूर्ण
एक शांत व उदासीन शहर !

भक्ति, आराधना, आरती, बाबा तुझको अर्पण
पवित्र जल की धारा, ज्योतिर्लिंग पर

सावन-भादो का महिना, सुदूर 108 किलोमीटर दूर
सुल्तानगंज के गंगा के पावन तट से
कठिनाई से परिपूर्ण पर्वतों को पारकर
जल भर कर लाते , कांवड़िया कांवड़ पर

लाखो का जत्था, प्रेम व भक्ति से हो सराबोर
दर्द व दुःख भूलकर
आ जाते हैं, बाबा के द्वार, उनके चरणों पर

अजीब सा शहर, ठहरता, भागता, है छोटा सा
टावर चौक से मंदिर, मंदिर से शिवगंगा
रास्ते में पेडा गली, अनगिनत धर्मशालाएं
पुजारी, पंडो का घर ........
पेड़े रसगुल्ले, चाय के भाड़ व
कचौरी-जलेबी के साथ सोता जागता शहर

मंदिर का सिंहद्वार, पहुचने से बहुत पहले ही
बस एक ही प्रश्न से होते हैं दो-चार
कि "बाबा? कौन पंडा? कौन जिला?"
फिर रुकते ही खुल जाते हैं, बही खाते
निकल आता है वंश व कुल
सहेजा हुआ हिन्दू-रीत, आ जाता है तत्क्षण बाहर

बाबा महादेव व माँ पार्वती के मंदिर की गुम्बदें
बंधा है जिनका सिरा, ढेरों लम्बे लाल फीते से
बस जताता है, दिलाता है याद,
बंधे रहना ही होगा,
अनंत काल तक, जीवन भर !

गजब का ये शहर, कहते हैं,
रावण ने खुद गुस्से में रखी थी, इस शिवलिंग को
और, एक ही रात में बन गया था
विश्वकर्मा द्वारा
एक पत्थर से भव्य मंदिर परिसर

हिन्दू-हिंदी से रचा बसा, पर यहाँ की कोलानियाँ
कहलातें हैं टाउन, जैसे बिलासी, बमपास,
विलियम्स या कास्टर
यहाँ रखे थे पांव विवेकानंद ने, है रामकृष्ण मिशन
तो कभी रहा करते थे शरतचंद्र
यहीं की धरती ने दिया जन्म
कुछ 1857 के योद्धाओं को, तो
है यहाँ सती का ह्रदय पीठ
है यहाँ धर्मगुरु अनुकूल ठाकुर का सत्संग नगर भी

रमणीय पर्यटक स्थल, और भी है यहाँ
जैसे त्रिकुटी, नौलखा व नंदन पर्वत
या फिर तप करने के लिए है न तपोवन
साथ ही बासुकीनाथ का मंदिर।

नदियों पहाड़ों जंगलों के बीच
जहां आदिम आदिवासियों वनवासियों का है निवास
है एक प्यारा शहर, है मेरा देवघर
सोता ऊंघता पर अंदर से खिलखिलाता शहर !
____________________
देवघर, झारखण्ड की सांस्कृतिक राजधानी, जहाँ वर्षों बिताया हमने !!

~मुकेश~


Thursday, April 3, 2014

छोटका पप्पा

(मेरे छोटे पापा, छोटी माँ और मेरे बेटे और भाई के बेटी के साथ)

छोटका पप्पा !

है न प्यारा सा सम्बोधन,

दिल से बहुत करीब,

बचपन की यादों से जुड़ा

एक महत्वपूर्ण हिस्सा !!


पापा से ज्यादा डर था,

पर प्यार भी पाते थे पापा से ज्यादा,

साइकिल के डंडे पर बैठकर,

पूरे शहर के सफर में हम होते थे  हमसफर,

उफ! कितना समझते-समझाते हमें,

लगता, कितना उपदेश देते !

खूब पढ़ो! खूब खेलो ! खूब खाओ !!

और हम,

हूँ – हाँ ! के साथ उनकी बातों को उड़ाते रहते

पढ़ाई के लिए डांट का होता अजीब सा डर,

तभी तो, सामने रख कर विज्ञान/गणित की किताब

“हवा हूँ, हवा मैं, बसंती हवा हूँ” ....

जैसी बावली सी कविता चिल्लाने लगते और

उनके ओझल होते ही खिलखिला उठते,

दूर आटा गूँथती छोटी माँ नहीं रह पाती चुप,

मुस्कुरा ही देती ...


था मुझे दिल से संबन्धित रोग

घर में खुसफुसाहट बराबर चलती

चक्कर लगता मेरा डाक्टर के क्लीनिक पर,

मैं साइकिल के डंडे पर सवार और

“ छोटका पप्पा” थे न मेरे साथ

बहुतों बार देखी थी मैंने उनके माथे पर चमकती पसीने की बूंद पर,

धीरज रखो सब ठीक, होगा

यही, आवाज सुनी थी उनसे !



मेहनत और चाहत

ये दो शब्द कैसे होते हैं

अब समझा हूँ उनसे

बेशक पारिवारिक उलझन व दूरियाँ

है वो वजह जो हैं हम दूर

पर “छोटका पप्पा दिल के बहुत अंदर बसते हो तुम” !!



Friday, February 14, 2014

मेरा शहर





कल गहरी नींद में था सोया
तो मेरे ‘शहर’ ने मुझे जगाया
कुनमुनाते हुए मैंने ज्यों ही
अधमुँदी आंखो से देखा
मेरा शहर ज़ोर से चिल्लाया

मरदूद! कितने गिरे इंसान हो
इंसान हो भी या पाषाण हो
........इसी शहर में रहते हो ?
फिर भी, इसी को बदनाम करते हो ?
उफ! मेरे आदरणीय ‘शहर’
अब बोल भी दो, क्यों चिल्लाते हो
क्यों इस फटेहाल को सताते हो

बद्तमीज़! तुझे याद भी है ?
जब कॉलोनी के गोल चक्कर से
तू अपने खटारे बजाज से गुजर रहा था
तो कोने वाले दरवाजे से
किसी अपने के एक्सीडेंट में गुजर जाने का दर्द
तेज विलाप में नजर आ रहा था

पर तू ! तू तो सिर्फ रुका, ठिठका
और फिर चुपचाप खिसका 
कुछ दिन पहले भी मैंने तुझे देखा था
भूख से बिलखता, एक नौ साल का बच्चा
माँ-बाप से बिछड़, तेरे पास से गुजरा था
पर तूने देखकर भी अनदेखा किया था
और, और! उस दिन तो तूने अति कर दी थी
जब सड़क पर एक मनचले ने, तेरे सामने ही

मासूम सी लड़की का दुपट्टा खींचा था
तब भी कुछ कहने से तू झिझका था
एक बार तुम्हारे सामने चलते बस में जेब कतरे ने
एक उम्रदराज की पर्स उडाई थी
पर फिर भी तुझे क्या,
अनदेखा कर सीट पर आँख झपकाई थी

ए पाषाण! तेरे जैसे के कारण ही
मैं बिलखता हूँ, रोता-चिल्लाता हूँ
पर तुम्हारे जैसे की जिंदगी ढोता हूँ
काश! तुझे देश-शहर निकाला जैसा
कोई गंभीर सजा दे दिया जाता !!

देख आज भी सिर्फ तेरी नींद खड़कायी है
तुम्हारी अंतरात्मा ही तो जगाई है
अब बस! मेरा इतना सा कहना मानना
नींद से जागते ही, अपने अंदर के इंसान को जगाना
बस इतना सा कहना मान ही लेना

मानेगा ?
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मेरा शहर हर पल परेशान करता है, क्या करूँ  खुद को बदलूँ या शहर को 

 इजराइली कलाकार मोशेल कैसेल की पेंटिंग हलेलुजाह