जिंदगी की राहें

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Tuesday, September 23, 2014

यश का जन्मदिन


पिछले कुछ दिनों से 
मेरा बेटा 'यश'
कभी कभी 
पहन कर चल देता है 
मेरा चप्पल !!
बढ़ रहा है उसका पैर !!

कभी कभी 
जब खड़ा होता है 
यश मेरे साथ
मेरी ही नजर रहती है
उसकी लम्बाई पर
सोचता हूँ, कब करेगा मुझे पार !!

जब भी उसके प्लेट्स में
रोटियां होती है कम
कह ही उठता हूँ
बढ़ रहे हो,
खाया करो, मेरे से ज्यादा !!

उसके स्कूल्स की कोपियाँ
जहाँ करने होते हैं
पेरेंट्स के हस्ताक्षर
हर बार उसके नाम
"यश कीर्ति सिन्हा" में
'कीर्ति' शब्द पर ठहर जाती है नजर !!

हर बाप की तरह
मेरी भी इच्छा, मुझे भी है इंतज़ार
मेरा बेटा करे नाम
फैले उसका और उसके कारण मेरा यश
चारो तरह हो उसकी कीर्ति !!
सुन रहे हो न रहबर !!
____________________
खूब सारी आशीष !!
(आज मेरे बेटे यश का जन्मदिन है,, जरुरत है आप सबके शुभकामनाओं का )

Thursday, September 18, 2014

प्रेम कविता ....



मोटी, मत खाया करो भाव
मांसल भरे देह के साथ
हो गयी उम्र तुम्हारी
थोड़ी खुबसूरत  ही तो हो
तो, तो क्या हुआ
मुझे तो अभी भी
तुमसे आती है भीनी सी खुशबू
सुरमई रातों वाली
कविता जैसी !!

जब देखो छिटक देती हो
मेरा हाथ
कह देती हो एक पल में
बेशर्म ! परेशान करता है
शरम नहीं आती
पर क्यों नहीं देख पाती
अपनी कजरारी आँखों से
मेरी मदहोश आँखों में
उस ध्रुव तारा से आने वाले
ठंडे प्रकाश जैसा नेह
कुछ प्यारी सी बहती हुई गजल जैसी !

हुंह, जाओ !
समझ गया, नहीं है तुम्हे प्यार व्यार
थोड़ी बालपन सी ठुनकन
क्यों न दिखाऊं
आखिर
भींगते आकाशों का सुख
और ठंडी गुनगुनी धुप
दोनों तो रचा बसा है तुममे
गद्य और पद्य दोनों विधाओं का
प्रेम से भरा तुम में
पढने दो न ये किताब मुझे
उफ़ कुछ तो कहो
मान जाया करो न
ए प्रेयसी!
___________________
क्या इसको प्रेम कविता कहेंगे ?

(मेरी कवितायेँ, ऐसी ही हलके फुल्के शब्दों से जुड़ते हुए बनती है ..............ऐसी ही, बहुत सारी आम लोगो से जुडी कविता के लिए आर्डर करें हमिंग बर्ड :)


Monday, September 8, 2014

हमिंग बर्ड : कभर पेज



मैंने नहीं देखी है ....... 
"हम्मिंग बर्ड" ! अब तक !!
तो, क्या हुआ ?
मैंने तो प्यार व दर्द भी नहीं देखा 
पर, फिर भी, लिखने की कोशिश कर चूका उन पर भी .....
______________________
मेरे अन्दर के छपने की उत्कंठा ने आखिर रंग दिखा ही दिया ... 
आखिर मेरा आने वाला पहले कविता संग्रह "हमिंग बर्ड" का कभर पेज तैयार है !!
आज अनंत चतुर्दशी के दिन, जो हिंदी रीति से मेरा जन्मदिन भी है, को इस कभर-पेज को आप सबके साथ शेयर करता हुआ "टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड" फील कर रहा हूँ !! 
काश ये संग्रह कुछ लोगो के टेबल तक पहुँचने में सफल रहे 
इन्ही उम्मीदों के साथ ......... आप सबके स्नेह का आकांक्षी !!


Friday, August 29, 2014

प्रेम

( दिल्ली एअरपोर्ट से ली गयी फोटो )
ये प्रेम भी न 
ऐसे लगता है जैसे 
मेट्रो का दरवाजा 
सामने खुलने वाला हो 
या मेट्रो क्यों 
नए वाले लाल डीटीसी का दरवाजा ही 
दरवाजा के खुलते ही 
सामने खड़े पथिक के सामने 
हलकी से मनचली ए.सी. की हवा 
खूब सारी गर्मी के बाद झुमा देती है जैसे !!

ये प्रेम भी न
अजीब है कुछ
ऐसे सोचो जैसे
खूब सारी प्यास लगी हो, और
मुंह में लिया हो
वो सबसे सस्ती वाली लोली पॉप
या फिर उल्टा ही सोच लो, क्या जाता है
पेट में गैस
और जस्ट पिया हो
'इनो' का एक ग्लास !!

ये प्रेम ही तो है
जब चौबीस घंटे का व्रत
और फिर एक ग्लास शरबत
खूब सारी चीनी वाली .........
शायद मिल जाता है प्रेम
प्रेम ही है न ....... !!
__________________
प्रेम ही होगा ........... 


(विनोद कुमार शुक्ल, कैलाश वाजपेयी, केदारनाथ सिंह ....के साथ) 

(भारतीय ज्ञानपीठ के आयोजन कविता समय (05.08.2014) इंडिया हेबिनेट सेंटर से ....... जिसमें केदारनाथ सिंह, कैलाश वाजपेयी, अशोक वाजपेयी, विनोदकुमार शुक्ल, राजेश जोशी, ऋतुराज, विजय कुमार, मदन कश्यप, नीलेश रघुवंशी और सुमन केशरी ने कविता पाठ किया !! )

Wednesday, August 20, 2014

चालीस के बाद, पचास के पहले


चालीस के बाद, पचास के पहले 
है एक अलग सा उम्र डगर 
जब तय कर रहा होता है पुरुष मन !
होती है जिंदगी के राहों में 
उच्छ्रिन्खल व उदास मध्यांतर !!

शारीर तय कर रहा होता है सफ़र 
निश्चिन्त शिथिलता के साथ 
ढुलमुल पगडंडीयों पर !!

मन कभी कभी कहता है
जवान होते बेटे की
लिवाइस जींस व टी शर्ट को
करूँ एक आध बार ट्राय
लोटटो के स्पोर्ट्स शूज के साथ पहन कर !!

पर, ये बात है दिगर
वही मन, उसी समय समझाता है
छोडो ये सब, चलों चले
कुछ फॉर्मल या लम्बा कुर्ता पहन कर!!

इसी उम्र में, होती है अजीब सी चेष्टा
युवती को सामने देख
करते हैं कोशिश, हो जाए सांस अन्दर
ताकि दिख न पाए ये उदर !!

कानों के ऊपर, सफ़ेद होते बालों की चमक
हर नए दिन में कह ही देती है
लानी ही पड़ेगी, गार्नियर हेयर कलर !!

बातों व तकरारों में हर समय होता है विषय भोजन
ब्लडप्रेशर व शुगर के रीडिंग पर पैनी रहती है नजर
कभी सोया या सूरजमुखी आयल की प्रीफेरेंसेस
तो कभी करते हैं मना, मत दिया करो आलू व बटर!!

पर फिर भी नहीं रख पाते ध्यान
बढ़ रहा होता है बेल्ट व पेंट का नंबर
चश्मे के पावर की वृद्धि के समानुपाती
होती है, अन्दर घट रहा शारीर का पावर !!

उम्र का ये अंतराल, है एक रेगिस्तानी पडाव
जब होता है अनुभव, होता है वो सब
जो हासिल करने की, की थी कोशिश हरसंभव
जो भरता है आत्मविश्वास, रहती है मृगतृष्णा
पर फिर भी, दरकती है उम्मीदें
काश!! और भी कुछ! बहुत कुछ !!
चाहिए था होना, कोसते हैं खुद को
काश कुछ और कोशिशें कामयाब हो जाती !
चलो अगले जन्म में,
पक्का पक्का, ऐसा ही कुछ करना !!
सुन रहे हो न रहबर !! !!




Sunday, August 3, 2014

प्रेम कविता

एक तरुणी ने
अपने प्रेमी के कानों में
की सरगोशी ....
क्या तुम सचमुच मेरे प्रेम में हो ?
अगर हाँ, तो 
क्या मेरे लिए लिख पाओगे कविता ?

अरे ये कौन सी बड़ी बात
प्रेमी ने सोचा-समझा
युवती के आँखों में झाँका
कलम से रंगे कुछ पन्ने
जो फाड़ कर फेके गए
फिर, अंत में उसने चूमा
प्रेयसी का हाथ
लिख दिया उसके हथेली पर ही
मेरे अंतस से आ रही आवाज
मैं तुमसे करता हूँ प्यार !
खुद से ज्यादा !!

प्रेमिका की डबडबाई आँखे 

बोझिल मुंदी पलकों के साथ
समेटा खुद को, उसके बांहों में
बाँधी मुट्ठी अपने हथेली की
चिपका कर उसे सीने से
बोल उठी लरजते हुए
अंग्रेजी के तीन लफ्ज़
लव यू टू !!

उफ़! क्या प्रेम का सम्प्रेषण व
बहते दिल के उद्गार से
बेहतरीन, हो भी सकती है
कोई प्रेम कविता??

प्रेम सिक्त चार आँखें
और, चार हाथ
बस हो साथ साथ
खुद-ब-खुद रच जाती है
प्रेम कविता !!!!
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क्या बन पायी प्रेम कविता ?



Wednesday, July 30, 2014

एक सच्चाई ऐसी भी .......


एक सुन्दर नवयुवती
थी, स्विमिंग सूट में 
(अधोवस्त्र भी कह सकते हैं )
पूल में छप छप छपाक 
के आवाज के साथ, कूद पड़ी 
अब कर रही थी अठखेलियाँ, तैरते हुए 
उड़ती तितलियों या मछलियों सी 
दूर खड़ा इंस्ट्रक्टर, निहार रहा था 
सुरक्षा की दृष्टि से !! है न जरुरी !!

एक स्त्री रोग विशेषज्ञ
पुरुष डाक्टर के क्लिनिक में
अनुभवों की गहराती रेखाएं लिए
एक चालीस-वर्षीय महिला
बेझिझक थी लेटी
थी तनावग्रस्त बेशक
डाक्टर टटोल रहा था वक्ष
मेमोग्राफी का पहला टेस्ट था शायद
जिंदगी का भरोसा दे रहा था डॉक्टर !!

एक पूर्ण ढकी हुई स्त्री
सुन्दर सौम्य भारतीय परिधान में
गुजर रही थी मार्केट से
था कमर के पास, थोड़ा उघड़ा हुआ देह
रह गया था बचा
पल्लू के ढकने से शायद !
बींध रही थी, पता नहीं कितनी सारी
कामुक पुरुष नजरें !!
स्त्री महसूस रही थी खुद को
असहाय, नग्न और बेबस !!

किसी ने कहा
ब्यूटी लाइज ओन बीहोल्डर’स आईज
सुन्दरता तो देखने वाले के नजर में होती है
वैसे ही शायद
नग्नता भी शायद कुदृष्टि का कमाल है
मानसिक दिवालियेपन का
है न सच !!
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एक सच्चाई ऐसी भी !!