जिंदगी की राहें

जिंदगी की राहें

Followers

Showing posts with label ज़िम्मेदारी. Show all posts
Showing posts with label ज़िम्मेदारी. Show all posts

Wednesday, August 20, 2014

चालीस के बाद, पचास के पहले


चालीस के बाद, पचास के पहले 
है एक अलग सा उम्र डगर 
जब तय कर रहा होता है पुरुष मन !
होती है जिंदगी के राहों में 
उच्छ्रिन्खल व उदास मध्यांतर !!

शारीर तय कर रहा होता है सफ़र 
निश्चिन्त शिथिलता के साथ 
ढुलमुल पगडंडीयों पर !!

मन कभी कभी कहता है
जवान होते बेटे की
लिवाइस जींस व टी शर्ट को
करूँ एक आध बार ट्राय
लोटटो के स्पोर्ट्स शूज के साथ पहन कर !!

पर, ये बात है दिगर
वही मन, उसी समय समझाता है
छोडो ये सब, चलों चले
कुछ फॉर्मल या लम्बा कुर्ता पहन कर!!

इसी उम्र में, होती है अजीब सी चेष्टा
युवती को सामने देख
करते हैं कोशिश, हो जाए सांस अन्दर
ताकि दिख न पाए ये उदर !!

कानों के ऊपर, सफ़ेद होते बालों की चमक
हर नए दिन में कह ही देती है
लानी ही पड़ेगी, गार्नियर हेयर कलर !!

बातों व तकरारों में हर समय होता है विषय भोजन
ब्लडप्रेशर व शुगर के रीडिंग पर पैनी रहती है नजर
कभी सोया या सूरजमुखी आयल की प्रीफेरेंसेस
तो कभी करते हैं मना, मत दिया करो आलू व बटर!!

पर फिर भी नहीं रख पाते ध्यान
बढ़ रहा होता है बेल्ट व पेंट का नंबर
चश्मे के पावर की वृद्धि के समानुपाती
होती है, अन्दर घट रहा शारीर का पावर !!

उम्र का ये अंतराल, है एक रेगिस्तानी पडाव
जब होता है अनुभव, होता है वो सब
जो हासिल करने की, की थी कोशिश हरसंभव
जो भरता है आत्मविश्वास, रहती है मृगतृष्णा
पर फिर भी, दरकती है उम्मीदें
काश!! और भी कुछ! बहुत कुछ !!
चाहिए था होना, कोसते हैं खुद को
काश कुछ और कोशिशें कामयाब हो जाती !
चलो अगले जन्म में,
पक्का पक्का, ऐसा ही कुछ करना !!
सुन रहे हो न रहबर !! !!




Friday, January 14, 2011

जिम्मेवारियों तले दबता सपना....


















जवान हो रहा था बचपन
जब उसके आँखों में
खिलने लगे थे स्वप्न
वैसे तो जिंदगी में
थी खिलखिलाहट
मिला वो प्यार व दुलार
जिसका था वो हकदार
पर वो सपना
जो उसने आँखों
में था संजोया...
वो टिमटिमा रहा था
.
क्योंकि उस सपने को
जहाँ था देखा
मन के उस झक्क सफ़ेद
कैनवेस में भरने वाले
रंगों में थी
चमचमाहट की जरुरत
पर कुछ जिम्मेवारियों ने
उधेर दी थी रंगों की चमक
चहकता दमकता सपना
थोड़ा फीका होकर हुआ अपना....
.
सपनो की जगमग बगिया में
जैसे ही जिम्मेवारी की छाया
ने लिया बसेरा...
सतरंगी सपना
हुआ धूमिल
पर कोई नहीं.....
.
जो थी मृग-तृष्णा
हम में भी है 'दम'
कुछ जरुर कर पाएंगे हम
वास्तविकता के धरातल तले
जिम्मेवारी के बोझ तले
बस उस से थोड़े ही हैं कम....
आज कल कभी कभी
आँखे हो जाती है नम
जब बंद आँखों के सामने
थिरक जाती है...
वो पुराने सपने का जखम...
.
लेकिन फिर से चौंधियाने लगी है
वो नम आँखे
क्योंकि सुनहले सपने
फिर से लगे झिलमिलाने
बस बदल गए किरदार
पहले होता था स्वयं
अब होते हैं उसके पुत्र....
शायद कोई तो हो
सपनो का तारणहार..........
उसको कर सके
गुलजार...........
होगा न............???.

ऐसे ही .......... J कुछ भी J