जिंदगी की राहें

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Friday, October 5, 2012

मेहँदी का पेड़
























पता है ?
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़,
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली
.
घर के पिछले दरवाजे की किवाड़... 
जिससे नजर आता है अब भी, वो मेंहदी का पेड़
उखड रहा है चौखट से..
पीछे जो खेत है,
उसकी जमीन भी हो
गयी है उसर...
होते ही नहीं अंकुरित
लगे हुए मटर...
तुमने जो नीला कोट दिया था
वो अभी भी बक्से  में पड़ा है
आई ही नहीं इत्ती सर्दी..
घनेरे छाये मेघ भी 
बस... गड गडा कर उड़ जाते हैं
शायद उन्हें भी  लगता है-
क्यूं बरसे जिंदगी भर ?......
.
"मेरे शब्द"... उनको तो, क्या हो गया,
कैसे बताऊँ ?
हर बार रह जाते हैं, थरथरा कर
बोल ही नहीं पाते कुछ
सब कुछ तो बदल गया
.
पर पता नही क्यूं
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली...
आज भी...!!

Tuesday, September 25, 2012

~: कुछ हाइकु :~



हाइकु - ये जापानी काव्य प्रकार है । हाइकु अकसर कुदरत वर्णन के लिए लिखे गए हैं । जिसे कीगो " कहते हैं । जापानी हाइकु , एक पंक्ति में लिखा जाता है और 19 वीं शताब्दी पूर्व इसेहिक्को कहा जाता था । 
हाइकु , कविता में 3 पंक्तियाँ होतीं हैं । जिनका अनुपात है, प्रथम पंक्ति में 5 अक्षर , दूसरी में 7 अक्षर और फ़िर तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर हों -- अकसर संधि अक्षर भी एक अक्षर ही गिना जाता है ।
(लोगो को जो पढ़ कर जाना, ये बता रहा हूँ.. और अब कुछ अपने और से प्रस्तुत करना चाहता हूँ ....)


(1)
हमसफ़र
फिर काहे का डर
चल जिधर
(2)
महानगर
मानवीय जंगल
अकेला चल
(3)
देहरी पार
वो चली ससुराल
रो जार जार
(4)
टेबुल कुर्सी
कर मिजाज पुर्सी
है लाटशाही
(5)
राजनीतिज्ञ 
काश होते मर्मज्ञ 
देश कृतज्ञ
(6)

बिटिया रानी 
है बड़ी सायानी
नेह बरसी
(7)
माँ की महता
नहीं बता सकता
भाग्य विधाता
(8)
समप्रभुता
सबका है सम्मान
राज धर्मिता
(9)
कमप्यूटर 
है आभासी दुनिया 
लाती खुशियाँ 
(10)
गरीबी रेखा
नहीं करना पार
पालनहार
(11)
गुलमोहर
है लाल लाल फर
ग्रीष्म बेअसर
(12) 
यश-रिषभ
दोनों छुएंगे नभ
विनती रब !!
(यश रिषभ मेरे बेटों का नाम है)  


(जानकारी के आभाव में मैंने पहले गलत हाइकु पोस्ट की थी, अब सुधार दी है...)

Saturday, September 15, 2012

कोलेज डे'स

आज सुना इंजीनियर्स डे है...
हम इंजिनियर तो नहीं , पर इस से मिलता जुलता गणित हमारा विषय था
तो कोलेज दिन को याद कर लिया...


कालेज के दिन
हम स्नातक विज्ञान के छात्र
वो भी गणित में प्रतिष्ठा 
ये कैलकुलस 
स्टेटिक्स डायनामिक्स
अलजेब्रा, अस्ट्रोनोमी या मेट्रिक्स 
2 -डी, 3-डी फिगर 
कब तक कॉपी में भरती 
त्रिकोणमिति की रेखाएं 
हमसे आँख मिला कर कहती 
बच्चे कर इंतज़ार 
कभी तो आएगी प्रीत या प्रीति
हर क्लास में होता 
तकरार का विषय
हम हैं कितने दब्बू
नहीं है यहाँ कोई चार्म
कितना बोरिंग है गणित
क्यूँ करें मेहनत
कोई तो नहीं
जो दे सके प्रेरणा
नहीं थी एक भी अबला
जो होती हमारे लिए सबला
नहीं थी कोई "नारी"
जो बोरिंग लेक्चर में दिख जाती तो
रहता इंतज़ार, रहती बेकरारी...
.
बस हम गणित के छात्र
करते इंतज़ार
राष्ट्रभाषा हिंदी के क्लास का 
वो हर तीन दिन बाद आता
कालेज के सबसे बड़े हाल में
मिल जाते सारे विज्ञानं के  छात्र
और बहुत सी खुबसूरत
तरुणी छात्राएं दिख जाते 
तभी तो हम सर की गूंजती आवाज में
लैला मजनू को तौलते 
आखिर हम छात्रो का जीवन 
हो रखा था नीरस
गलती से कभी मिलती
खूबसूरती और काव्य में प्रेम रस
तभी तो खुद में मजनू दिखता
लैला के फ्रेम में हर बार
नयी नयी बालाओं का चेहरा मचलता
पचास मिनट में दिल रम जाता
रहती हमारी चेहरे पर मुस्कान
क्योंकि जो भी गलती से मुस्काती
हमें उसमे लैला होने का हो जाता गुमान
हम छात्रों में होता तकरार
क्यूं न हो आखिर
हर हसीनो के लिए सारे रहते जो बेक़रार
.
ऐसे ही लड़ते झगड़ते 
आहें भरते
कब बीते दिन, बीते रैना
वो तीसरे दिन का इंतज़ार
खो गया सब कब और कहाँ
इस खोने पाने में हमने 
ढूंढा नया जहाँ 
क्यूंकि ज्ञान के मंच से
कर्म के  क्षेत्र का सफ़र
है जुदा, सबसे जुदा....



Thursday, September 6, 2012

चढ़ता उतरता प्यार



































वो मिली
चढ़ती सीढियों पर
मिल ही गयी
पहले थोड़ी
नाखून भर
फिर
पूरी की पूरी..
ओंठ भर
और फिर
प्यार की सीढियों
पर
चढ़ते चले गए....

वो फिर
मिली
उन्ही सीढियों पर,
पर इस बार
सीढियाँ नीचे जाती हुई
आँखे नम थी
नीचे दरवाजे तक
एक दुसरे के आँखे टकराई
फिर दूरियां
सिर्फ दूरियां ............!!

Tuesday, August 28, 2012

एक सफ़र



                       अपने अजीज मित्रों के द्वारा दिए गए शुभकामनायें, उनकी प्रेरणा से मेरे अन्दर जागने वाला जज्बा या कुछ करने की की कोशिश और साथ में कुछ अच्छा चल रहा समय ..... इन सबको जब आप मिलकर मेरे पॉकेट में जबरदस्ती डाल देंगे तो पिछले 22 अगुस्त का "कस्तूरी" साझा काव्य संग्रह का शानदार विमोचन और 27 अगस्त को लखनऊ में मुझे मिले "वर्ष 2011 के लिए मिला सर्वश्रेष्ठ युवा कवि का पुरुस्कार" और इनके साथ मेरा चमकता चेहरा (बेशक खुबसूरत नहीं है) दिखेगा....:)


जानता हूँ
अपने को
समझता हूँ
खुद को
नहीं हूँ नगीना
पर तुम सबका प्यार
व आशीर्वाद
कर चूका चमत्कार
हूँ अचंभित
फिर भी हूँ खुश
बरसाना ये प्यार बार बार:)



                      श्रीमती रश्मि प्रभा (दी) के हौसला अफजाई के कारण 2008 में तुकबंदी से शुरू की गयी की कोशिश और उसकी परिणति मुझे लखनऊ में दिखी जब अन्तराष्ट्रीय ब्लागेर सम्मलेन में मेरे जैसे नौसिखिये के लिए तालियाँ बज रही थी .



                     सबसे पहले तो "कस्तूरी" के संपादन के लिए श्री शैलेश भारतवासी (हिंद-युग्म) द्वारा मेरे में विश्वास जगना की आप ये कर सकते हैं, फिर श्रीमती अंजू चौधरी का कहना की मुकेश आप आगे बढ़ो हमारा साथ आपके साथ है मेरे मुख में अमृत की तरह था.  और फिर सब कुछ पल दर पल बेहतर होता चला गया.  ब्लाग जगत के कुछ नामचीन चेहरों ने अपनी रचना मुझे बिना कोई हिल-हुज्जत के हवाले कर दी . विश्वास नहीं करेंगे, मैंने श्रीमती रश्मि प्रभा "दी" से रचनाएँ बिना कस्तूरी में प्रकाशन के बारे में बताये ले ली.  "दी" क्षमा करना, ये गलत था .  इस पुस्तक के लिए सबको शामिल करते समय बस मैं सबकी रचनाएँ खुद से तुलना करता था, और हर बार मुझे बाकि 23 प्रतिभागी कवि/कवियत्री बेहतरीन लगे.. और यही सबसे खास वजह है इन सबका मेरे साथ होने की. इस पुस्तक के संपादन के लिए श्रीमती अंजू चौधरी ने जितनी मेहनत की, अगर मैं उसका 10% भी खुद करता तो बात अलग होती लेकिन इसकी जरुरत ही नहीं पड़ी, मेरे बिना मेहनत के सभी प्रतिभागी रचनाकारों, मेरे अभिन्न मित्रों और प्रकाशक श्री शैलेश जी ने इस पुस्तक को सके नजर का प्यारा बना दिया . ऐसा मुझे लगता है .



               इस पुस्तक का क्या नाम हो, इसके लिए भी मैंने बहुतों से सलाह ली, और उनमे से ही मेरी एक और दीदी श्रीमती अंजना सिन्हा( ये ब्लागेर नहीं हैं, पर एक बेहतरीन रचनाकार हैं ) द्वारा सुझाया नाम "कस्तूरी" मन में बैठ गया . दिल बाग-बाग हो गया जब श्री नामवर सिंह जी ने कहा - जिसने भी ये नाम सुझाया, बहुत बेहतरीन है .


             विमोचन के मुख्य आतिथ्य के लिए श्री नामवर सिंह, जो एक महान आलोचक हैं, ने श्रीमती अंजू से किये हुए वादे के अनुसार मेरे सामने सहमती दी थी, आने की. फिर भी दिल कह रहा था क्या वो आयेंगे ? वो सच में हिंदी भवन के सभागार में आये और साथ में श्री श्याम सखा श्याम, अध्यक्ष, हरियाणा साहित्य अकादमी, श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, निदेशक, आकाशवाणी और श्री मदन सहनी जी का भी सान्निध्य मिला, जो की एक अनाम से साझा काव्य संग्रह को अपने आप नाम दे रहा था . सभी २४ प्रतिभागी रचनाकार जो इस विमोचन में आये या जो किसी करणवश नहीं आ पाए, दिल से इसके बेहतरी के लिए जुड़े थे . फिर भी नागपुर से श्री अजय देव्गिरे और बस्ती से श्री अमित आनंद पाण्डेय का विमोचन में आ पाना, सुखकर था . एक महान आलोचक व दयास पर बैठे जाने-पहचाने लोगो के सामने प्रतिभागी कवियों ने ज ओ काव्य पाठ किया, जिसको सबने मुक्त-कंठ से सराहा . करीबन 130 लोगो से भरा दर्शक दीर्घा बता रहा था इस विमोचन का आयोजन सफल था. विमोचन के दिन ही श्रीमती रंजू भाटिया और श्रीमती वाणी शर्मा (प्रतिभागी रचनाकार) ने अपने ब्लाग पर कस्तूरी की समीक्षात्मक रिपोर्ट भी पेश कर दी.. जो ये मुझे दिलासा दे रहा था की मैं खुशनसीब हूँ . ये पुस्तक फ्लिप्कार्ट पर 10% और इनफी बीम पर 20% के डिस्काउंट के साथ उपलब्ध है . फ्लिप्कार्ट पर 70 से जायदा प्रति की बिक्री भी हमें दिलासा दे रही है की ...

"हम होंगे कामयाब एक दिन................"



       एक मन माफिक विमोचन समारोह के सिर्फ चार दिन बाद अपने को अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन (परिकल्पना व तस्लीम के तत्वाधान में आयोजित), लखनऊ में खुद को सम्मानित होता देख अन्दर से एक मुस्कराहट भरी आवाज कह रही थी ...
"मुकेश! खुश रहना सीख!"


           श्री रविन्द्र प्रभात जी एवं श्री जाकिर रजनीश के अगुआई में आयोजित इस सम्मलेन में मुझे बहुत से बड़े व जाने पहचाने ब्लागर से मिलना नसीब हुआ. मैं इतना खुश था की इस आयोजन में अपनी धर्म पत्नी अंजू और बेटे यश-रिषभ के साथ पहुंचा . पूर्णिमा वर्मन जी, रवि रतलामी जी , पाबला जी, अर्चना चावजी "दी", निवेदिता श्रीवास्तव "दी", अमित श्रीवास्तव जी, सुमित प्रताप सिंह जी, अरविन्द मिश्र जी, रंजू भाटिया जी, सुनीता शानू "दी", रागिनी मिश्रा, शिखा वार्ष्णेय, शिवम् मिश्रा, जी.पी.तिवारी जी, वंदना अवस्थी दुबे जी, आशीष राय जी, इस्मत जैदी जी, चांदी दत्त शुक्ल जी, निधि टंडन जी, निरुपमा सिंह जी, रूपचंद मयंक शास्त्री जी, संजय भास्कर, नीरज जाट, रंधीर सिंह सुमन जी, अलका सैनी जी, डॉ. राम द्विवेदी जी, आकांक्षा यादव जी, के.के यादव जी, पाखी, अविनाश वाचस्पति जी, यशवंत माथुर, शीलेश भारतवासी, डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव, सतोष त्रिवेदी जी, कुंवर कुश्मेश जी, दर्शन लाल बवेजा जी, सिंघेश्वर सिंह जी, धीरेन्द्र सिंह भदोरिया जी, डॉ. सुभाष राय जी, जैसे ब्लाग जगत के चमकते सितारों से मिलना एक दिवा स्वप्न जैसा था .

  तिस पर श्रीमती रश्मिप्रभा "दी" को मिलने वाला दशक का सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का सम्मान व शमशेर जन्मशती काव्य सम्मान को प्राप्त करने के लिए उनके अनुपस्थिति में ग्रहण करना और मंच पर उनको प्राप्त होने वाली शील्ड व प्रमाणपत्र के साथ फोटो खिंचवाना अविस्मरनीय था . क्या कहूँ, वक्त कैसे ख़ुशी देता है, ये मैं समझ सकता हूँ .



अब सब कुछ बीत चूका है, मैं धरातल पर आ चूका हूँ, फिर भी एक इल्तजा -----

                              "मेरे हिस्से का प्यार, थोड़ा जायदा बरसते रहना......"

Saturday, August 11, 2012

मैया

























मैया !! मैं बड़ा हो गया हूँ.
इसलिए बता रहा हूँ
क्यूंकि तू तो बस
हर समय फिक्रमंद ही रहेगी....
.
याद है तुझे
मैं देगची में
तीन पाव दूध लेकर आया था
चमरू यादव के घर से
..... पर मैंने बताया नहीं था
कितना छलका था
लेकिन तेरी आँखे छलक गयी थी
तुमने बलिहारी ली थी
मेरे बड़े होने का...
.
एक और बात बताऊँ
जब तुमने कहा था
सत्यनारायण कथा है
..राजो महतो के दुकान से
गुड लाना आधा सेर...
लाने पर तुमने बलाएँ ली थी
बताया था पत्थर के भगवान को भी
गुड "मुक्कू" लाया है !!
पर तुम्हें कहाँ पता
मैं बहुत सारा गुड
खा चूका था रस्ते में
पर बड़ा तो हो गया हूँ न....!
मैया याद है ...
मेरी पहली सफारी सूट
बनाने के लिए तुमने
किया था झगडा, बाबा से
पुरे घर में सिर्फ
मैंने पहना था नया कपडा
उस शादी में...
पर मुझे तो तब भी बाबा ही बुरे लगे थे
उस दिन भी
आखिर बड़े होने पर फुल पेंट जरुरी है न...
.
मैया मैं जब भी
रोता, हँसता, जागता, उठता
खेलता पढता
तेरे गोद में सर रख देता
और तू गुस्से से कहती
कब बड़ा होगा रे.....
अब तू नहीं है !!!
पर मैं सच्ची में बड़ा हो गया...
मेरा मन कहता है
एक बार तू मेरे
गोद में सर रख के देख
एक बार मेरी बच्ची बन कर देख
मेरी बलिहारी वाली आँखों में झांक
कर तो देख..
देखेगी.............??????
(मैया बाबा... मेरे माँ-पापा नहीं मेरे दादा-दादी थे, और मुक्कू ..मैं !!!)
 



Saturday, August 4, 2012

अख़बार

ब्लॉग्गिंग के शुरुआत के समय की ये रचना..... पिछले पोस्टस देख रहा था, तो एक दम से अच्छा लगा... बेशक तुकबंदी है ... पर मुझे खुद को अच्छी लगी... तो शेयर कर रहा हूँ....!!!
















दिन था रविवार,
सुबह की अलसाई नींद
ऊपर से श्रीमती जी की चीत्कार...
देर से ही सही, नींद का किया बहिष्कार
फिर, चाय की चुस्की, साथ में अख़बार
आंखे जम गई दो शीर्षक पर
"दिल्ली की दौड़ती सड़क पर, कार में बलात्कार"
"सचिन! तेरा बैट कब तक दिखायेगा चमत्कार"


सचिन के बल्ले के चौके-छक्के की फुहार
हुआ खुशियों का मंद इजहार
दिल चिहुंका! हुआ बाग-बाग! चिल्लाया॥
सचिन! तू दिखाते रह ऐसा ही चमत्कार
कर बार-बार! हजारो बार......

तदपुरांत, धीरे धीरे पलटने लगा अखबार
पर, तुरंत ही आँखें और उँगलियों ने किया मजबूर
आँखे फिर से उसी शीर्षक पर जा कर हो गयी स्थिर
एक दृश्य बिना किसी टेक-रिटेक के गयी सामने से गुजर 
सोच भी गयी थम!
आँखे हो गयी नम!!


उसी दिल से, वहीँ से, उसी समय
एक और बिना सोचे, समझे, हुआ हुन्कार
क्या
क्या ये भी होगा बार-बार!! हजारो बार..
क्या ऐसे ही महिलाओं की इज्जत होगी तार-तार.....
आखिर कब तक.....................!!!!!!!!!!!!!!!