जिंदगी की राहें

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Tuesday, June 3, 2014

टिकोज़ी



जब भी “मैया”
खोलती लोहे का
काला भारी बक्सा
तो, आदत से मजबूर
आस पास मँडराता 
पता नहीं, क्या रहती उम्मीद?
अच्छा सा लगता था बस
मैया के पल्लू को पकड़े रह,
निहारना उसको और उसके सामानों को
बड़े जतन से रखती
सोने के निब वाला कोई पुराना पेन
अलग-अलग समय के चांदी के खनकते सिक्के
उनके ब्याह की पुरानी बनारसी सिल्क साड़ी
बाबा का काला गरम सूट
बेशक अंतिम बार कब पहना गया
था नहीं मुझे याद !
कपड़ों के बीच ही
थी, एक अजीब सी तिकोनी वस्तु
सफ़ेद गरम मोटे कपड़े से बनी
मैया कहती ये है “टिकोजी”
हर बार, मैया बिना पुछे बताती
टिकोजी
बाबा के लिए बनाई चाय को
गरम रखने के लिए
चीनी मिट्टी के केतली व कप को
ढकने के लिए होता था !
जब थे,
बाबा शिलोंग/दार्जिलिंग में पोस्टेड
खौला कर हरी चाय की पत्तियां
ढक देती थी केतली को
टिकोज़ी से ! मैया !!
आखिर नहीं था चलन, थर्मस का !
चाय गरम रह पाती या नहीं
टिकोजी का उपयोग
सार्थक था या नहीं
ये तो जानती थी सिर्फ मैया
या फिर बाबा !
टिकोजी को देखते हुए
देख पाता था मैं
मैया बाबा को
दार्जिलिंग चाय के सिप के साथ
प्रेमसिक्त अहसास भरे
कांच के पारदर्शी कप को पकड़े हुए
पर हाँ, देखी थी मैंने
मैया के आंखो की चमक
व टिकोजी के अंदर
रखकर खुद का हाथ
महसूस किया था
स्नेहिल गरमाहट भी
तभी तो
आज के समय में समझ पा रहा
मैया-बाबा के प्रेम का
असीम समर्पण !!
____________________________
प्रेम दर्शाने के लिए, कोई भी बिम्ब सक्षम होता है न ?? 
~मुकेश~


Monday, April 7, 2014

मेरा घर



की रे छौरा !! अब अयलिंह ??”

(क्या रे, अब आए तुम?)

मेरे घर की बूढ़ी आवाज कौंधी

जैसे ही दाखिल हुआ, पुराने घर में

गाँव की सौंधी मिट्टी, उड़ती धूल

बड़ा सा कमरा, पुराने किवाड़

ठीक बीच में, बड़ा सा पुराना पलंग

सब शायद कर रहे थे इंतज़ार

लगा, सब एक साथ ठठा कर हंस पड़े, भींगी आंखो से

मुककु !! आए न तुम ! इंतज़ार था तुम्हारा !!

खुशियों से आंखे छलकती ही है

अंगना, बीच में बड़ा सा तुलसी चौरा (पिंडा)

जो देती थी, बचने का मौका, मैया के मार से
 
वो भी मुसकायी

भंसा घर (किचन) में, चूल्हे के धुएँ से

काली पड़ चुकी दीवारें

जिसने देखा था मुझे व दूध रोटी की कटोरी

छमक कर हो गई सतरंगी

कमरे के सामने का ओसरा, वहाँ लगी चौकी

यहाँ तक की घर के पीछे की बाड़ी

बारी में झाड व लहराती तरकारी

अमरूद, नींबू, नीम, खजूर के वो सारे पेड़

चहकते हुए खिलखिलाए

लगा, जैसे, वैसे ही चिल्लाये

जैसे खेलते थे बुढ़िया कबड्डी

और होता था मासूम कोलाहल !!


आखिर एक आम व्यक्ति भी

होता है खास, जब होता है घर में

खुद-ब-खुद कर रहा था अनुभव

नम हो रही थी आँखें, खिल रही थी स्मृतियाँ

मैंने भी मंद मंद मुसकाते हुए

इन बहुत अपने निर्जीव/सजीव से कहा

कईसन हो ?? :) 


Friday, March 14, 2014

होली


होली का पर्व है अलबेला

है मस्ती भरा!!


जब भी आती है ये मनभावन होली

आता है याद

गाँव का कीचड़, साथ में गोबर, मिट्टी राख़ भी ...


जब भी आती है ये स्वादिष्ट होली

आता है मुंह में पानी

क्योंकि बनते ये घर घर में

मालपूआ, दहीबड़ा, गुजिया और बहुत से पकवान


जब भी आती है ये रोमांचक होली

मन के आंखो से दिख जाती है

माँ के उम्र की भौजियाँ

उनका रंगा हुआ गाल और खुद का छोटा सा

रंगो भरा हाथ


जब भी आती है ये यादगार होली

स्मृतियों मे होती है

मैया-बाबा को मेरा चरण-स्पर्श

अबीर-गुलाल के साथ

व माथे पर, मैया का प्रेम से अतिरेक चुम्मा


जब भी आती है रंग बिरंगी होली

दिख जाता है खुद का

झक्क सफ़ेद कुर्ता व पैजामा

और फिर उसके रंग जाने के कारण

मेरे बचपन की खीज और गुस्सा


जब भी आती है मस्त मस्त होली

तो आती है आवाज़

ढ़ोल मजीरे और भांग के साथ

मस्ती में गाते होली के गीत

खुशियाँ और संगीत


और अब जब भी आती है ये नशीली होली

होता है अपना

दो कमरे का घर

सिर्फ बीबी व बच्चो का साथ

थोड़ा अकेलापन, थोड़ा अनमनापन !! 


Sunday, November 18, 2012

लेंड-क्रूजर का पहिया




एक महानगर से सटे
एक छोटे से गाँव में
थी चहल पहल
चमक रहा था
कैमरे की लैंस 
न्यूजरूम के स्टीकर वाले
चौकुठे काले माइक्रोफोन पर
बोल रही थी
रोती कलपती 
मनसुख की मैया -
हमरा एक ही बेटा रहा
ऊ भी जवान
हाँ पीता था दारू
बीडी की लत तो रहबे करी 
पर था, हमरा जिगर का टुकड़ा 
हमरे बुढ़ापे का लाठी रहा
अब कैसे जियेंगे 
ई  फ़ट्ट्ल  साड़ी 
औ सुख्खल रोटी
तो मिल जात रही 
अब तक, ओकरा वजह से....
.
दूर पड़ी थी 
सफ़ेद कपडे में ढकी लाश 
पर मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज
मैं नहीं थी, मनसुख की मैया
या उसका  इंटरव्यू ...
टी.आर.पी. कहाँ बनती है ..
भूखी बेसहारा माँ से 
इसलिए टी.वी. स्क्रीन पर
चिल्ला रहे थे..
न्यूज रीडर...
लेंडक्रूजर के नीचे
सी.पी. के व्यस्त चौराहे पर
गया मेहनतकश नौजवान
और बार बार सिर्फ ...
दिख रहा था स्क्रीन पर
चमकता लेंड-क्रूजर
व उसका
निर्दयी पहिया...


Saturday, August 11, 2012

मैया

























मैया !! मैं बड़ा हो गया हूँ.
इसलिए बता रहा हूँ
क्यूंकि तू तो बस
हर समय फिक्रमंद ही रहेगी....
.
याद है तुझे
मैं देगची में
तीन पाव दूध लेकर आया था
चमरू यादव के घर से
..... पर मैंने बताया नहीं था
कितना छलका था
लेकिन तेरी आँखे छलक गयी थी
तुमने बलिहारी ली थी
मेरे बड़े होने का...
.
एक और बात बताऊँ
जब तुमने कहा था
सत्यनारायण कथा है
..राजो महतो के दुकान से
गुड लाना आधा सेर...
लाने पर तुमने बलाएँ ली थी
बताया था पत्थर के भगवान को भी
गुड "मुक्कू" लाया है !!
पर तुम्हें कहाँ पता
मैं बहुत सारा गुड
खा चूका था रस्ते में
पर बड़ा तो हो गया हूँ न....!
मैया याद है ...
मेरी पहली सफारी सूट
बनाने के लिए तुमने
किया था झगडा, बाबा से
पुरे घर में सिर्फ
मैंने पहना था नया कपडा
उस शादी में...
पर मुझे तो तब भी बाबा ही बुरे लगे थे
उस दिन भी
आखिर बड़े होने पर फुल पेंट जरुरी है न...
.
मैया मैं जब भी
रोता, हँसता, जागता, उठता
खेलता पढता
तेरे गोद में सर रख देता
और तू गुस्से से कहती
कब बड़ा होगा रे.....
अब तू नहीं है !!!
पर मैं सच्ची में बड़ा हो गया...
मेरा मन कहता है
एक बार तू मेरे
गोद में सर रख के देख
एक बार मेरी बच्ची बन कर देख
मेरी बलिहारी वाली आँखों में झांक
कर तो देख..
देखेगी.............??????
(मैया बाबा... मेरे माँ-पापा नहीं मेरे दादा-दादी थे, और मुक्कू ..मैं !!!)
 



Thursday, July 12, 2012

प्यारी फुद्कियाँ


याद है गाँव के घर का 
वो अंगना
कुछ साल ही तो गुजरे होंगे
यादों के झरोखे में 
सब चकमक करने लगता है 
चढ़ती उतरती निक्कर
धुल-धक्कर पसीने से भींगा बदन
दूध-भात का कटोरा
मैया का डाँट भरा प्यार
और, और भी तो है
यादों के बल्व में दिखता है
छोटी छोटी फुदकती गोरैया
च्वीं च्वीं च्वीं .......
मैया ने जैसे ही 
आँगन में फैलाया गेहूं


छोटे छोटे सोन-चिडाई
पहुँच आते थे फुदकते हुए..
फिर वही 
च्वीं च्वीं च्वीं .....
आज भी यादों के जेहन
में दिखता है वो प्यारा
खुद का चेहरा
चढ़ते उतरते निक्कर के साथ
कैसे रहता था एक दम शांत
ताकि वो छोटी प्यारी फुद्कियाँ 
न उड़ जाएँ 
बेशक होते रहे बरबाद 
फैलाये हुए चावल या गेहूं 
वो सुकून वो च्वीं च्वीं ...........
फिर दिन बदला, बदला असमान
हरियाली, खेत, कीचड
कुछ भी तो नहीं दिखते
कहाँ फंस के रह गए
इस मानव जंगल में 
एक दम निरीह अकेले....
नहीं दिखती अब वो 
छोटी छोटी गोरैया 
तो कहाँ दिखेगी उनकी झुण्ड...!
अब तो वो काला कौवा 
भी नहीं उड़ता आस्मां में 
जिस से दूर भागते थे हम..
.
अब तो ये आसमां और धरती
सब ऐसे बदल रही 
जो भी थे बचपन के हमारे अपने
सब हो रहे विलुप्त
चाहे हो कौवा या 
हो गोरैया
या हो प्यारी मैया 
सब बदल गया न.....!!!


Saturday, December 18, 2010

मेरी "मैया"



क्या दिन थे वो भी
जब होती थी धड़कन तेज़
और कांपने लगता  मैं
मेरे दर्द को अपने अन्दर भींच लेतीं
समां लेतीं मुझे खुद के भीतर
समेट लेती  मुझे
अपनी आंचल के साये में
मैं भी अपनी
छोटी छोटी उँगलियों को
उसके ढीले   
सलवटों से भरे पेट पर
प्यार से लगता फिराने
खो जाता उन उबड़ खाबड़ रास्तों में
और भूल जाता अपनी बढ़ी धड़कन
और बिखरी सांसो का कारण 
हो जाता शांत

वो बचपना
वो गाँव का मेरा
बिचला घर.....:)
जहाँ थी
पुरानी सी बड़ी सी पलंग
जिस पर था मेरा राज
क्योंकि मैं था दबंग
शान से मैं होता पलंग पे
और मेरे एक और बाबा
दूसरी और "वो"
और फिर एक दम सुरक्षित मैं

वो दिन अनमोल
जब मेरी हर चाहत को
का उसे था मोल
चाहे हो दूध की कटोरी
या मेरे स्कूल जाने की तैयारी 
मेरे हाल्फ पैंट  का बटन
या बुखार से तपता मेरा बदन
हर वक़्त उसने दी
प्यार और ममता की फुहारी!!

आज भी जब होता है 
कभी असहनीय दर्द
तो खुद निकलता है एक स्वर
ए मैया...........!!
पर पाता नहीं क्यूं 
लगता है किसी ने मुझे खुद
में समेटा.........
और फिर दर्द रफ्फूचक्कर ....:)
जानता हूँ
है ये मृग-तृष्णा .... 
.
वो थी मेरे पापा की माँ
मेरे सारे भाई-बहनों की मामा (दादी)
लेकिन मैंने तो पहले दिन से ही 
देख लिया था उसमे
पहचान लिया था उसको
वो और कोई नहीं 
सिर्फ और सिर्फ थी
मेरी "मैया"
मैया!!!!!!!!!!!!!

थी तो वो एक औरत ही
दिखने में  साधारण
लोगों को लगती हो शायद
किसी हद तक बदसूरत
लेकिन मेरे लिए, मेरे लिए....
सबसे अधिक खुबसूरत
क्योंकि थी वो ममता की मूरत!!!
मेरी "मैया"
मैया!!!!!!!!!!!!!  


(मेरी प्यारी मैया मेरी दादी) 
मेरे बचपन के सबसे अनमोल दिन मैंने अपने मैया के आँचल के छावं में गुजारे....खूब मजे किये, खूब मैया से प्यार पाया, बीमार पड़ा तो तीमारदारी भी करवाई....कभी कभी पिटा भी....लेकिन अब उसकी कमी शायद समझ में आती है...