जिंदगी की राहें

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Friday, January 14, 2011

जिम्मेवारियों तले दबता सपना....


















जवान हो रहा था बचपन
जब उसके आँखों में
खिलने लगे थे स्वप्न
वैसे तो जिंदगी में
थी खिलखिलाहट
मिला वो प्यार व दुलार
जिसका था वो हकदार
पर वो सपना
जो उसने आँखों
में था संजोया...
वो टिमटिमा रहा था
.
क्योंकि उस सपने को
जहाँ था देखा
मन के उस झक्क सफ़ेद
कैनवेस में भरने वाले
रंगों में थी
चमचमाहट की जरुरत
पर कुछ जिम्मेवारियों ने
उधेर दी थी रंगों की चमक
चहकता दमकता सपना
थोड़ा फीका होकर हुआ अपना....
.
सपनो की जगमग बगिया में
जैसे ही जिम्मेवारी की छाया
ने लिया बसेरा...
सतरंगी सपना
हुआ धूमिल
पर कोई नहीं.....
.
जो थी मृग-तृष्णा
हम में भी है 'दम'
कुछ जरुर कर पाएंगे हम
वास्तविकता के धरातल तले
जिम्मेवारी के बोझ तले
बस उस से थोड़े ही हैं कम....
आज कल कभी कभी
आँखे हो जाती है नम
जब बंद आँखों के सामने
थिरक जाती है...
वो पुराने सपने का जखम...
.
लेकिन फिर से चौंधियाने लगी है
वो नम आँखे
क्योंकि सुनहले सपने
फिर से लगे झिलमिलाने
बस बदल गए किरदार
पहले होता था स्वयं
अब होते हैं उसके पुत्र....
शायद कोई तो हो
सपनो का तारणहार..........
उसको कर सके
गुलजार...........
होगा न............???.

ऐसे ही .......... J कुछ भी J

Thursday, January 6, 2011

नारी या पुरुष??


चल रही थी बहस
नारी या पुरुष??
एक सुदर्शना नारी
जो थी बड़ी प्यारी
लरजते हुए बोली
सज्जनों!
माटी की बनी मैं
पर माटी  में ही सिमट कर रह गयी मैं

कभी बेटी का फर्ज निभाया
कभी बहन के रूप में घर को चहकाया
कभी अर्धांगिनी बन कर निभाया
या माँ की ममता का नेह बरसाया
कर दिया अपने को अर्पित
जीवन समर्पित
पर न बन पाई पहचान
क्यूंकि इन पुरुषो के आगे
बिखर गये हमारे अरमान!!!

तभी पीछे की पंक्ति से
आई एक कड़कती आवाज
हमारी भी सुनो
बेशक हम कहलाते हों जंवाज
हमने शिद्दत से छिपा रखा है दर्द
वो अब हो गयी है सर्द
ये दुनिया है बेदर्द
बहुत हो गयी पौरुष की बात
अब नही हो पाता दर्द आत्मसात

हे नारी!!  जब तुम थी बेटी!
पापा ने तुम्हें जिंदगी के पथ पर चलना सिखाया
जब तुम थी बहन
हर पल राखी के बंधन
की रक्षा, तेरे भाई के मन में रहा
जैसे ही तू बन के आयी अर्धांगिनी
ता-जिंदगी तुझे खुश रखने का
सातो वचन तेरे पति ने निभाया
फिर माँ की अनमोल ममता
और दूध के कर्ज में
जीवन-पर्यंत बेटे ने बिना कुछ कहे
अपना जीवन लुटाया!!!

सच तो ये है
जिंदगी है एक तराजू
जिसमे एक के साथ करो न्याय
तो दुसरे के साथ दिखता है अन्याय
और इस तराजू के दोनों पलडो
से कर सकते हो तुलना
नारी और पुरुष की.................!

अब बोलो
नारी या पुरुष?
नारी या पुरुष?
नारी या पुरुष ???????



वैसे तो बस कुछ शब्द बुने हैं मैंने, क्यूंकि मैंने बराबर पढा की हर नारी का पूरी जिंदगी शोषण हुआ है.....उसके  हर रूप के साथ! बेशक हम भारत वासी उससे देवी के रूप में पूजते हैं, लेकिन आज की जिंदगी में हम पुरुषों का भी तो शोषण होता है..हम किसे कहेँ.....हमारी पीड़ा को कौन समझेगा....................

पढ़े और बताएं....अगर त्रुटी बताएँगे तो जायदा ख़ुशी होगी...............:)



वैसे एक बात और आज मेरे छोटे सुपुत्र "ऋषभ कीर्ति सिन्हा (रिशु)" का जन्मदिन भी है.
आपकी शुभकानाएं मुझे ख़ुशी देगी और उसे जिंदगी में सफलता  ...:)

Monday, December 27, 2010

यही होता है स्पर्श!


जब बहुत देर से रोते शिशु को
मिल जाता है
ममत्वा भरा माँ का स्पर्श
वो बिना देखे खिलखिला कर
चहक उठता है ....
क्या यही होता है स्पर्श?

जब हारते हुए शख्स को
उसके मित्र  के हाथ का
हौशले से भरा स्पर्श
यह कहता हुआ मिलता है
"अबकी तू ही जीतेगा यार!"
भर देता है उसमे अदम्य साहस
और जिजीविषा
क्या यही होता है स्पर्श?

जब कष्ट प्रद दर्द से
कराहते मरीज को
मिलता है आश्वासन और
प्यार भरा स्पर्श
"तुम्हारी लम्बी जिंदगी है!"
दर्द में भी ला देती है मुस्कान!!
क्या यही होता है स्पर्श?

जब रूठे हुए प्रेमिका के ओंठो पर
माफ़ी के चाशनी से लिपटी
प्यार भरे प्रेमी के ओंठ का स्पर्श
पिघला  देती है..
उसके अभिमान का बरफ
क्या यही होता है स्पर्श?

जब शांत पत्नी के कानो के पोरों पर
होता है पति का कामुक स्पर्श
कर देता है उसको उद्वेलित
खिल उठता है उसका रोम रोम
खिल उठती है सम्पूर्ण नारी...
क्या यही होता है काफी जीने के लिए उसका स्पर्श
क्या यही होता है स्पर्श?
.
रोते हुए को सीने से लगाना
और फिर बेतहाशा आँशु बहाना
औए अंततः शुकून पा जाना
क्या यही होता है किसी अपने का स्पर्श
क्या यही होता है स्पर्श??
क्या यही होता है स्पर्श??
हाँ यही होता है स्पर्श - एक "छुअन"!!!

............................

अंत में ये कुछ पंक्तियाँ अपने ब्लोगेर्स बंधुओं के लिए:

जब  ब्लॉगर के इंद्रजाल के पन्ने पर
पाठक की होती है आँख
और थिरकती हुई उँगलियों का
की-बोर्ड पर होता है स्पर्श
चाहे जैसे भी हो विचार...
एक आंतरिक ख़ुशी से
अतिरेक ब्लॉगर की सोच
फिर से चलने लगती है............
क्या यही होता है स्पर्श??


Saturday, December 18, 2010

मेरी "मैया"



क्या दिन थे वो भी
जब होती थी धड़कन तेज़
और कांपने लगता  मैं
मेरे दर्द को अपने अन्दर भींच लेतीं
समां लेतीं मुझे खुद के भीतर
समेट लेती  मुझे
अपनी आंचल के साये में
मैं भी अपनी
छोटी छोटी उँगलियों को
उसके ढीले   
सलवटों से भरे पेट पर
प्यार से लगता फिराने
खो जाता उन उबड़ खाबड़ रास्तों में
और भूल जाता अपनी बढ़ी धड़कन
और बिखरी सांसो का कारण 
हो जाता शांत

वो बचपना
वो गाँव का मेरा
बिचला घर.....:)
जहाँ थी
पुरानी सी बड़ी सी पलंग
जिस पर था मेरा राज
क्योंकि मैं था दबंग
शान से मैं होता पलंग पे
और मेरे एक और बाबा
दूसरी और "वो"
और फिर एक दम सुरक्षित मैं

वो दिन अनमोल
जब मेरी हर चाहत को
का उसे था मोल
चाहे हो दूध की कटोरी
या मेरे स्कूल जाने की तैयारी 
मेरे हाल्फ पैंट  का बटन
या बुखार से तपता मेरा बदन
हर वक़्त उसने दी
प्यार और ममता की फुहारी!!

आज भी जब होता है 
कभी असहनीय दर्द
तो खुद निकलता है एक स्वर
ए मैया...........!!
पर पाता नहीं क्यूं 
लगता है किसी ने मुझे खुद
में समेटा.........
और फिर दर्द रफ्फूचक्कर ....:)
जानता हूँ
है ये मृग-तृष्णा .... 
.
वो थी मेरे पापा की माँ
मेरे सारे भाई-बहनों की मामा (दादी)
लेकिन मैंने तो पहले दिन से ही 
देख लिया था उसमे
पहचान लिया था उसको
वो और कोई नहीं 
सिर्फ और सिर्फ थी
मेरी "मैया"
मैया!!!!!!!!!!!!!

थी तो वो एक औरत ही
दिखने में  साधारण
लोगों को लगती हो शायद
किसी हद तक बदसूरत
लेकिन मेरे लिए, मेरे लिए....
सबसे अधिक खुबसूरत
क्योंकि थी वो ममता की मूरत!!!
मेरी "मैया"
मैया!!!!!!!!!!!!!  


(मेरी प्यारी मैया मेरी दादी) 
मेरे बचपन के सबसे अनमोल दिन मैंने अपने मैया के आँचल के छावं में गुजारे....खूब मजे किये, खूब मैया से प्यार पाया, बीमार पड़ा तो तीमारदारी भी करवाई....कभी कभी पिटा भी....लेकिन अब उसकी कमी शायद समझ में आती है...

Monday, November 29, 2010

~ : उदगार : ~


३० नवम्बर को मेरी  विवाह वर्षगांठ है, पता नहीं कब और कैसे दस वर्ष बीत गए...पुरे दस वर्ष........!! अपने हमसफ़र के लिए कुछ पंक्तिया जोड़ी है, आपलोगों के समक्ष रखना चाहता हूँ............. )



एक दिन वो आएगी
चुपके चुपके
इतने चुपके से
कि न तो होगा रूह को महसूस
न जिस्म महसूस पायेगी कोई आहट
और हो जायेगा प्यार.....
पर हुआ नहीं ऐसा..

वो आयी जरुर
एक पारंपरिक पारिवारिक अनुमति से
मुहं-दिखाई में
माँ-पापा ने किया पसंद
और फिर मिलने का अवसर मिला
पर क्या यार...........!!
पहले नजर में न हो पाया प्यार

कहाँ गयी वो सिहरन और कहाँ गए वो ख्वाब
मेरे खबाबो में थी कोई अनदेखी अनजानी हूर
तभी मिला एक अपने का अपनापन
और उसकी सरल सलाह
सोच को बदलो
वास्तविकता के धरातल पे उतरो
फिर देखना, महसूसना 

सोच न बदली इतनी जल्दी
और न ही बदल सका मैं
किया उसी ने कुछ किया ऐसा
उड़ गए होश
हुआ मदहोश
मदमस्त हो गाया मैं
हो गया मैं उसका
अग्नि के सात फेरों के साथ

याद नहीं फेरों के समय लिए गए वादे
पर फिर भी हूँ में उसका
बीते दिन और बीते बहुत सारे बरस
कभी हुए घमासान झगडे
पर कही 'था' प्यार इन सब के बीच
दिल के किसी कोने को  था पता
'था' नहीं वो प्यार  'है'
तब भी था और अब भी है
तभी तो गुजरे इतने बड़े लम्हे
लगते हैं दिन चार

बहुत बार गुस्से में निकला -
क्यूँ आयी तुम मेरे जीवन
पर अंतर्मन?
सोच नहीं पाता
रह नहीं सकता उसके बिन
नहीं जानता क्या होता है प्यार
पता नहीं मुझे है भी उससे प्यार
या सिर्फ दिखाता भर हूँ
बारम्बार...

पर जो भी है
वो हर पल .
मेरे संसार
मेरी खुशियाँ
मेरे दर्द
मेरे बच्चो
मेरे अस्तित्व
मैं दिख जाती है
बार बार
हर बार
मेरी हमसफ़र
मेरी दुनिया

XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX


भावनाओं की अभिव्यक्ति पर
दिमाग का पहरा है
यकीन करो मेरा प्यार
आज भी उतना ही गहरा है.
दस वर्ष बीत गए
यूँ देखते -देखते
रास्ते तय हुए
गिरते सँभालते .
तुमने जिस दिन खुद को
सपनो को , भावनाओं को ,
उम्मीदों को, आस्थाओं को ,
मुझे सौंप दिया था ..
उसी पल मैं ''कुछ ''से
''बहुत कुछ ''...हुआ था .
तुम साथ रहना..
मैं सब संभाल लूँगा ..
आज फिर वादा है ..
कोई सपना टूटने ना दूँगा..
तुम्हारा विश्वास आज तक
रंग ले आया है,
ज़िंदगी ने चाहे हमें
जितना आजमाया है ...
तुमने हर हाल मैं साथ निभाया है ..
"अंजू ..."
आज फिर तुमपर
ढेरों प्यार आया है...!!!!
ढेरों प्यार आया है...!!!!


Thursday, November 18, 2010

प्रेम का स्वरुप


जिंदगी बदली
बदली सोच
बदला सम्बन्ध और उसका मूल्य
तभी तो
मन के अन्दर
झंकृत करने वाला
बदला वीणा का राग
पर क्या बदल सकता है
प्रेम या प्यार?
बदल सकता है
उससे जुडी
खुशियाँ अपार?


लेकिन कहना होगा
वो भी बदला...
बदल गयी
प्रेम के लिए
जीने मरने की कसमें
बदला प्रेम से प्रस्फुटित होता
त्याग, प्रतीक्षा, वायदा !!
यथार्थ की धरातल
पर आ पहुंचा प्यार
सपनो की दुनिया बदलकर
दिखने लगी
स्वभिव्कता
दिखने लगा
प्यार के पार की जिंदगी..

अब दैहिक सौंदर्य
और बिताये गए
अन्तरंग क्षण
बदल देते हैं
रूप प्रियतमा का
इसलिए लगता है
बदल गया है
प्रेम का स्वरुप !!

पहले बनते थे
प्यार में ताजमहल
पर बदल गए
वो प्रेम समीकरण..
पहले की तरह
नहीं होता कोई मजनू या राँझा
अब तो कहते हैं
लैला या हीर नहीं तो
कोई और ही आजा...

यहाँ तक की
सांसे भी महसूस करने लगी
सच्चाई
की कोई नहीं
वो नहीं तो कोई और सही..
सच में कितना बदल गया है
प्यार!!
प्यार ही है न.......!!

Wednesday, October 27, 2010

महीने की पहली तारिख


एक आम नौकरी पेशा

व्यक्ति के आँखों की चमक

है लहराती

जब आ जाती

महीने की पहली तारिख

होता है

हाथो में पूरा वेतन

परन्तु फिर भी

होती है

एक चुनौती

क्योंकि बीत चुके

फाके के दिन

और

अनदेखे भविष्य का सामना

हर महीने

का हर पहला दिन

दिखता है एक साथ

रहती है उम्मीद

बदलेगा दिन

बदलेगा समय

दोपहर की धुप हो पायेगी नरम

ठंडी गुनगुनाती हो पायेगी शाम

सुबह का सूरज

निकलेगा एक अलग अहसास के साथ

पर,

पता नहीं क्यूं

हर महीने

हर उस दिन

हर बार

कुछ नहीं बदलता

नहीं बदलती है

मुश्किलें

नहीं बदलती है

कमियां

बदलती है

तो जरूरतें

बदलती है

तो फरमाइश

बदलती है

तो एक और

नए महीने की

पहली तारिख

एक और तारिख.............!