जिंदगी की राहें

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Saturday, May 4, 2013

A report on press clippings of पगडंडियाँ



पिछले दस फ़रवरी को विश्व पुस्तक मेले के दौरान पगडंडियाँ (साझा कविता संग्रह) जिसका सह संपादन मैंने अंजू चौधरी और रंजू भाटिया के साथ मिल कर किया था, का लोकार्पण वरिष्ठ कथाकार श्रीमति चित्रा मुदगल, श्री विजय किशोर मानव, कवि व पूर्व संपादक "कादंबनी", श्री बलराम, कथाकार व संपादक, "लोकायत", श्री विजय राय, कवि व प्रधान संपादक, "लमही" एवं श्री ओम निश्चल, कवि-आलोचक ने किया। 

जहाँ हिंदी के कविताओं का जायदा बड़ा बाजार नहीं है फिर भी इस पुस्तक को लोगो ने ऑनलाइन खूब ख़रीदा और "इंडिया टुडे" तक ने कहा की ये पुस्तक बेस्ट सेलर बनने के और अग्रसर है। 


और फिर "इंडिया टुडे" ने अपने २४ अप्रैल के अंक में पगडंडियाँ की समीक्षा भी प्रकाशित की, जो हमारी कविता संग्रह के प्रकाशन को सराह रहा था, हम सब इस समीक्षा को पढ़ कर अभिभूत थे



इस पुस्तक के लोकार्पण की खबर को लोकायत पत्रिका (जो मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में बिकने वाली बेहतरीन पत्रिका है) ने एक पुरे पेज पर दिया



इसके आलावा "मेरी दिल्ली" और "दैनिक प्रभात चक्र", "दिशाएं", "बी पी इन टाइम्स" जैसे समाचार पत्र ने इस समाचार को  प्रमुखता से जगह दी, जो हम जैसे नौसिखिये रचनाकारों के लिए प्रसन्नता का विषय था।


यह पुस्तक सारी प्रमुख ऑनलाइन बिज़नस साइट्स पर २० % डिस्काउंट के बाद १२०/- रूपये में उबलब्ध है .



अब कुछ अपनी बात, पिछले दिनों 17.04.2013 को शोभना वेलफेयर सोसाइटी (जिसके संयोजक सुमित प्रताप सिंह हैं) के तत्वाधान में गांधी पीस फ़ाउंडेशन, नई दिल्ली में आयोजित "शोभना सम्मान 2012" में "शोभना काव्य सृजन सम्मान 2012" का पुरस्कार मुझे भी प्राप्त हुआ !!



उस से पहले होली के पूर्व संध्या पर एक शाम कवियों के नाम (टीवी चैनल वन) पर 26.03.2013 को रात 8 से 9 बीच मैंने भी कविता पाठ किया . 








एक पत्रिका "ट्रू मीडिया" में मेरी एक रचना "लाइफ इन मेट्रो" को भी स्थान मिला 

इतना सब कुछ आप सबको बता कर मैं खुश हो रहा हूँ ....
आप सबकी शुभकामनायें मेरे साथ रहेंगी, बस यही उम्मीद है ........ 

Thursday, April 25, 2013

मैं शर्मिंदा हूँ !














हाँ मैं शर्मिंदा हूँ !
क्योंकि मैं पुरुष हूँ, क्योंकि मैं भारतीय हूँ
हाँ मैं शर्मिंदा हूँ !
क्योंकि मैं निवासी हूँ उस शहर का
जहां महफूज नहीं है, "मासूम बच्ची" भी  
हाँ मैं शर्मिंदा हूँ !
क्योंकि पहले मैं शान से अपने
बिहारी होने पर करता था गर्व
क्योंकि ये भूमि
सीता-बुद्ध-महावीर-गुरु गोविंद की भूमि थी
बेशक लचर शासन व्यवस्था/ साक्षरता ने
हमारे बिहार को बना दिया सबसे गरीब
पर हम बिहारी कभी दिल से गरीब नहीं रहे  
पर, आज ये भूमि
खूंखार बलात्कारियों
की जन्मभूमि कहला रही है
हाँ मैं शर्मिंदा हूँ !

(ये बात दिल को लगती है, और बुरी भी है... जो बिहार आज भी सबसे ज्यादा प्रशासनिक अधिकारी भारत को देता है, जो देवो की भूमि रही है, वहाँ से पैशाचिक बलात्कारी पकड़े जा रहे हैं।)

Sunday, April 21, 2013

मजदूर दिवस


आज एक सोच मन मे आई
क्यूँ न समर्पित करूँ एक कविता
एक "मजदूर" को ...
पर उसके लिए
कविता/गीत/छंद/साहित्य
का होगा क्या महत्व ?
फिर सोचा
मेहनतकश जिंदगी पर लिख डालूँ कुछ
पर रहने दिया वो भी
क्योंकि तब लिखनी पड़ेगी "जरूरतें"
और जरूरत से ज्यादा
भूखप्यासदर्दपसीना
पर भी तो लिखना पड़ेगा ...

और हाँअहम जरूरतेंइन पर क्या लिखूँ
गेहूंचावल - दाल
मसाला व तेल भी
कहाँ से ला पाऊँगा उनके लिए
कुछ क्षण सुकून के
ठंडे हवा का झोंका भी तो
नहीं बंध पाएगा शब्द विन्यास में

छोड़ो यार! रहने देते हैं !
मना लेते हैं "मजदूर दिवस"
आने वाला है "एक मई" ...........

Thursday, April 11, 2013

ये वाइल्ड फेंटेसिस (Wild Fantasies)



ये वाइल्ड फेंटेसिस
और उसमे सिर्फ तुम
सच में, ढाती है कहर !

अस्पताल का
बेड न. 26, वार्ड न. 3
उसके जिस्म से जुड़ा मशीन
दिखा रहा था
सारे ग्राफ मौत के करीब ..
उसके बदन से जुड़े थे ढेरों पाइप
जिसमें से जा रहा था ब्लड,
फूड पाइप भी थी जुड़ी 
आंखो के सामने धुंधला दृश्य
पावर शायद होगा +15 या +16
पर डाक्टर का आश्वासन
जिंदगी अभी बाकी है ....

पर वो वाइल्ड फेंटेसिस
जिसमे थी सिर्फ तुम ! तुम !
एक कातिल मुस्कुराहट के साथ!
और फिर
10-12 दिन से एडमिट रोगी ..
जिस्म हो गया उसका
ठंडा-निस्तेज-निर्विकार !

उफ़्फ़ !! ओ कातिल हसीना......




Thursday, March 28, 2013

मैं व मेरी परछाई





10 वाट के बल्व की हलकी रौशनी
हाथो में काली चाय से भरा
बड़ा सा मग
बढ़ी हुई दाढ़ी
खुरदरी सोच व
मेरी, मेरे से बड़ी परछाई !

है न आर्ट फिल्म
के किसी स्टूडियो का सेट
एवं मैं !
ओह मैं नहीं ओमपुरी
जैसा खुरदरा नायक !

परछाई से मुखातिब
हो कर -
तू कब छोड़ेगा मुझे
'उसने'
'उसकी मुस्कराहट ने'
और 'उसके साथ की मेरी ख़ुशी'
सब तो चले गए ....

फफोले आ गए होंठो पर
मुस्कुरा न पाने की वजह से
पर तू ...
रौशनी दीखते ही
मेरे वजूद से निकल पड़ता है
और रौशनी छुटते ही
फिर से
सिमट आता है मेरे आगोश में
मेरे इतने करीब की
समा जाता है मुझमे
एक अहसास की तरह
'मैं हूँ न तेरे साथ'
वजूद मेरा खुरदडा थोडा
और थोडा कड़वा-गरम
जैसे ड्रामेटिक क्लाइमेक्स के साथ
मैं व मेरी परछाई ............!!


Wednesday, March 13, 2013

लाइफ आफ्टर डैथ


कहाँ जनता था उसे??? 
पर कुछ लोगों का ज़िन्दगी में शामिल होने या खोने पर अपना जरा भी बस नहीं होता.. सब यूँ होता है जैसे कोई ख्वाब देखा हो...
कब और कैसे, मेरी आभासी दुनिया में शामिल हो गया और फिर उस दायरे को लांघ गया .... बिलकुल दबे पाओं, हौले से,चुपचाप मुझे खबर तक न चली...
ये सोशल मीडिया की साइट्स पता नहीं क्यों, मुझे बहुत भाती रही हैं | कभी कभी लगता है इसकी मुख्य वजह मेरे लिए ज़िन्दगी में दोस्ती को तरजीह देना है तो कभी लगता है कहीं इसकी वजह मेरी दोहरी जिंदगी जीना तो नहीं? खुद को तनावमुक्त करने में बहुत मददगार रही हैं ये मित्रता भरी दुनिया... दरअसल मैं हूँ भी वास्तविकता मे थोड़ा चुप! शांत! पर इस सोशल मीडिया पर मुखर व मित्रवत।
उसने कब मुझे फ्रेंड रिकुएस्ट भेजी, कब मैंने एक्सेप्ट की, याद नहीं। फिर याद करने लायक कोई वजह भी तो नहीं था। सरसरी तौर पर एक फेक प्रोफ़ाइल जैसा ही तो था, बिना रियल फोटो के, यहाँ तक की "अबाउट मी" में भी ज्यादा कुछ खास नहीं लिख रखा था उसने।
हाँ ! उसकी पहली बात जो याद है मुझे, जब मैंने अपने एक मित्र की कविता शेयर की थी अपने वाल पर, कविता वास्तव मे मुझे ऐसी लगी थी जो बेहतरीन थी, पर उसको बड़ी नागावर गुजरी, और मेरे इनबॉक्स में उसका मैसेज चमका - "कुमार साब! इस कविता को शेयर करने की वजह?"
उफ़्फ़! एक दम से मैंने चिढ़ कर कहा - क्यों? तुम्हें क्या परेशानी, मुझे पसंद आया, शेयर किया, बस। और जिसकी रचना है, मुझे नहीं लगता उसको कोई दिक्कत होगी।
बस ये छोटी सी "तू-तू में-में" जान पहचान की शुरुवात थी , फिर कब और कैसे वो इतना करीबी हो गया, पता ही नहीं चल पाया। बाद में उसी मित्र ने बताया, जिसकी कविता मैंने शेयर की थी, कि "इस बंदे की जिंदगी के कुछ गिने चुने दिन ही बचे हैं, किसी ऐसे रोग से ग्रसित है।" इस्स !!!!!!
शायद ये जान कर मैं खुद में बदलाव महसूस कर रहा था... उसके पोस्ट पर बरबस नज़र चली जाती, उसका सबसे बात करना दीखता तो ख्याल आता जरुर की कैसे जीता होगा ये...जानते हुए भी की... ज़िन्दगी उसे पहले ही दाँव पर लगा चुकी है...
तो बस ऐसे ही हमारे नेट लाइफ मे शामिल हुआ ये शख्स , हर दिन लाइक्स और छोटे मोटे कमेंट्स के माध्यम से प्रागाढ़ता बढ्ने लगी, फिर धीरे धीरे म्यूचुअल दोस्तों की संख्या भी बढ्ने लगी। वो जब भी ऑनलाइन आता तो उसकी ज़िंदादिली व मस्ती अंदर तक खुशी ला देती। उसके शब्दों से खुशियाँ छलकती थी, बेशक वो दर्द में डूबा होता। एक दम जोकर जैसी जिंदगी, खुद दर्द में डूबकर सबको खुश देखना, कोई उस से सीखे। कहीं पढ़ा भी था - "वेदना के सुरों में ही स्वर्गिक संगीत की सृष्टि होती है"
उसके इस ज़िंदादिली के कारण कभी-कभी मुझे संदेह भी होता था कि ऐसा कैसे हो सकता है, इतने दर्द में जीता हुआ व्यक्तित्व ऐसे खुशियों से बगिया महकाए।  मैंने अपने मित्र से इस बात को कनफर्म करने की कोशिश भी की, क्या वास्तव में उसकी जिंदगी इतनी छोटी है?  हमारे एक ग्रुप का अहम सदस्य कब बन गया, ये भी नहीं समझ मे आया, हर कोई बस इसी बंदे को मिस करते ... । पर हाँ, मुझे उसका कुमार साब या सिन्हा साब कहना उतनी खुशी नहीं देता था , हर वक़्त लगता, मैं इस से उम्र मे बड़ा तो हूँ, मुझे इसको भैया संबोधित करना चाहिए। शायद ये मेरी उसके लिए अपनेपन की वो भावना थी जो मैं व्यक्त ही नहीं कर पा रहा था..पर हाँ मेरे अंदर उसमे मेरा छोटा भाई दिखने जरुर लगा, कह नहीं पा रहा था बस...पर कोई नहीं, उस बंदे का सिर्फ खुश होना ही खुशी देता था। मैं मन ही मन चाहता जरुर था और मानता भी था... एक दो बार अपने मित्र से ही उसका हाल चल पूँछ कर अपने बड़े भाई होने की जरुरत और अनुभूति को निभा लेता था... इस से ज्यादा कुछ करने के काबिल भी नहीं था।
पर अब वो अब वो बंदा धीरे धीरे 4-5 दिन में एक बार आता। पर जब भी आता, सिर्फ और सिर्फ खुशियाँ उसके चारो और बिखरी नजर आती। अब उसके ऑनलाइन दिखने का समय धीरे धीरे कम होने लगा था, कहीं अंदर से बुरा भी लगता। पर क्या करना, जिंदगी तो रुकती नहीं, कुछ पल या क्षण के लिए याद आ जाता फिर हम भी अपने दुनिया मे मस्त हो जाते, अपने दिनचर्या मे भूल जाते थे।
कुछ मित्रों के सहयोग से मैंने उसके शब्दो से बुनी हुई कुछ रचनाओं को एक साझा कविता संग्रह मे भी शामिल करने की कोशिश की थी, ताकि शायद इसी बहाने वो कुछ पल के लिए सच में मुस्कुराया हो।
पर जैसे वो हम सब की दुनिया में एकदम से शामिल हुआ था, वैसे ही एक दम से गायब भी हो गया। वो पिछले करीबन एक महीने से ज्यादा दिनों से नहीं दिखा। शायद ............ पर इस शायद में कितने सारे सोच शामिल हो जाते हैं, है न...... ।
उसके लाइक पेज में सबसे ज्यादा पेज डेथ से रिलेटेड थे... जैसे "लाइफ आफ्टर डैथ" उसका ज़िन्दगी जीने का ज़ज्बा बस इसी जन्म तक सीमित नहीं था... वो शायद और जीना चाहता था...जो वो किसी से कह नहीं पता था...उसकी विवशता...उसकी नियति... सब एक तरफ और उसकी जिंदादिली...सब पर हावी... यही वजह थी की वो कम समय में ही कई मित्रों का बेस्ट फ्रेंड बस चूका था... पर उसके मन की उथल पुथल का अंदाज़ा भी कोई नहीं लगा पा रहा था...
और फिर....
उसके पेज में उसके अभिन्न ने पिछले दिनों स्टेटस डाला था "पिछले शनिवार को वो गुजर गया" ....... उफ़्फ़! उस क्षण का अनुभव शब्दों में बयान करना मेरे लिए मुश्किल है... मैं उस वक़्त सोच में पड गया खुद के लिए कुछ ज्यादा दिक्कत सी बात नही पर... मेरा अन्तर्मन कह रहा था, काश वो सच में फेक प्रोफ़ाइल ही होता, जो एक दिन एक दम से मेरे लिस्ट से गायब हो जाता, और फिर....
फिर क्या 1074 मित्रों की सूची से एक कम होना, किसको फरक पड़ता है... 
जिंदगी कहाँ रुकती है.... सच है |