Tuesday, June 9, 2015
Monday, May 11, 2015
दो क्षणिका
खाली कनस्तर सी हो गयी
तुम्हारी स्मृतियाँ, झूठी - सच्ची
रखूं किसी अलमारी में, या
या, कबाड़ी वाले को ही न बेच दूं ??
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ऐसे ही एक ख्याल :)
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मेरी हथेली में
है कटी-फटी रेखाएँ
जीवन, भाग्य और प्रेम की
पर है सिर्फ एक
खुशियों का आभासी द्वीप
अंगूठे के नीचे
ठीक बाएं कोने पर !!
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उम्मीदें जवां हैं :)
Saturday, May 2, 2015
प्यारी ठिठोली
ओन ऑफ करते
पिट पिट की आवाज के साथ स्विच
रिमोट से भर भर करते हुए
स्वैप करते टीवी चैनल्स
नल के पानी के नीचे
काटते या रोकते जलधारा
दूर बैठ कर रिमोट से ही
कार के दरवाजे की बीप बीप सुनते
गुलाब के फूल की पंखुरियां
एक उसके नाम एक मेरे
छोटे छोटे कंकडो से
टिप टिप निशाना बांधते खनक के साथ
मोबाईल के अक्षर
बिना सोच के डाल देते स्टेटस पर
शायद बचपना है
या उँगलियाँ भी जता रही
प्यार भरी बेचैनियाँ !!
आखिर हाथ की नसें सुनती है
प्यारे दिल की बात !!
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ऐवें ठिठोली :-)
Tuesday, April 21, 2015
ढक्कन सीवर का ......
ढक्कन सीवर का
भीमकाय वजन के साथ
ढके रहता है, घोर अँधेरे में
अवशिष्ट ! बदबूदार !! उफ़ !!
जोर लगा के हाइशा !
खुलते ही, बलबलाते दिख पड़े
कीड़े-पिल्लू! मल-मूत्र!
फीता कृमि ! गोल कृमि आदि भी !!
रहो चिंतामुक्त !
नहीं बैठेगी मक्खियाँ नाक पर
आज फिर 'वो' उतर चुका है
अन्दर ! बेशक है खाली पेट
पर, देशी के दो घूँट के साथ
वो आज फिर लगा है काम पर !!
सेठ ! अमीर ! मेहनतकश ! किसान !
सभी अपने मेहनत का शेष
रखते हैं तिजोरी में !
एक लॉकर ये भी
शेष अवशेष का
कर रहा था, बेचारा हाथ साफ़
सडांध और दुर्गन्ध के बीच
चोरों की तरह, नशे के साथ
खाली पेट ! दर्दनाक !!
आखिर भूख मिटानी जरुरी है
है न !
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भूख बहुत कुछ करवाती है !!
Monday, March 30, 2015
पुरुष मन और बच्चियां
छोटी छोटी
नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !
पार्क में, घर के सामने
खिलखिलाती दौड़ती है
साथ ले जाती मन को
दुनियावी विसंगतियों से दूर
भुला देती है हर स्याह सफ़ेद!
कुछ पलों के लिए
परियों के देश सा
अहसास देता है ये पार्क
जब चंचल, खुशियों भरी हंसी
ठुनकन व गुस्सा
सब गड्डमड्ड करके
एक साथ खिलती है कलियाँ
और, बच्चियां !!
हाँ! चाहता है मन
भूलूं उम्र के रंग
भागूं खेलूं उनके संग
जी लूं सतरंगी बचपन!
उफ़, पर ये हर दिन की न्यूज
जिसमे होता है बच्चियों का शोषण व बलात्कार
कलंकित करती छुअन
फिर उनसे उपजते
उनको ही तार तार करते व्यूज
लग ही जाता है ब्रेक स्वयंमेव हाथों में
महसूसने लगता हूँ
नागफनी की टहनियां!!
खुद के हाथ ही लगते हैं ऐसे
जैसे दरिन्दे की लम्बी नाख़ून भरी हो झाड़ियाँ
न न न! ऐसे में लहुलुहान न हो जाएँ
ये बचपन, ये परियां !
दहलता है दिल
फुट पड़ता है ज्वालामुखी कहीं अन्दर! क्यूँ?
हर दिन! हर पल!
दिख ही जाता है खलनायक
खूनी आँखे ! आईने में !!
मर्द हूँ न!
साफ़ नज़र के लिए
आईना पोछने लगता हूँ
ढूंढ़ नहीं पाता रक्त सम्बन्ध
पर ये अखबार
उनके जलते समाचार
जलाते हैं यार !!
इस जलन ने शायद
आज कुछ हौसला भर दिया
सच ही तो हो तुम सब
मेरी परियां
हाँ सच ...
मेरी इसकी उसकी सबकी परियां
परों वाली परियां!!
तुम्हारे परों में
इन्द्रधनुषी रंगों में
एक रंग मेरा एक उसका
और एक उसका भी होगा
उड़ो जितना उड़ सको!!
पंखो की ताकत
तुम्हे तुम्हारे आस्मां तक ले जाएगी
खुद को अकेला ना समझना !!
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नन्ही, खुबसूरत व प्यारी सी बच्चियां !
Monday, March 23, 2015
ब्लॉग यात्रा
ऑरकुट के समय, लोगो को देखादेखी 2008 में ही ब्लॉग बना लिया था, हिंदी का 'ह' भी नही आता था उन दिनों, पर ब्लॉग के नाम "जिंदगी की राहें" के अनुरूप पगडण्डी जैसी राह ही बनती चली गयी!
चूँकि ब्लॉग बना तो पोस्ट भी जरुरी है! और फिर जिस भी ब्लॉग पर उन दिनों नजर पड़ी वो कवितायें ही लिखते थे ! इस वजह मन में ये धारणा बन गयी की ब्लॉग पर सिर्फ कवितायें ही पोस्ट किये जाते हैं ! हम भी तुकबन्दियाँ जोड़ने लगे ! कुछ मेरे मेंटर या हमदर्द उसपर वाह या बहुत खूब लिखते, सीना चौड़ा हो जाता !
एक बार किसी चर्चा या ब्लॉग बुलेटिन पर मेरी पोस्ट आयी, हमें तो ऐसे फील हुआ जैसे हंस या पाखी के संपादक मेरे घर से मेरी रचना ससम्मान ले गये हों !!
गिव एन टेक का ज़माना उस समय भी था, कुछ पोस्ट पर सचिन के तरह कमेन्ट का सैकड़ा लग गया !! फिलिंग अशोक वाजपेई जैसी जन्म ले ली !! वो अलग बात है करीब डेढ़ लाख की ट्रेफिक मेरे ब्लॉग पर अब तक है 382 फोलोअर हैं !
हाँ भूल गये, रश्मि दी ने एक कविता 2010 में संकलन में प्रकाशित करवा दी ! :-D साहित्य के पुरौधा ही बन बैठे !!
हाँ सच कहता हूँ, जोड़ तोड़ नही किये, पर हिंदी ब्लोगर का अंतर्राष्ट्रीय सम्मान रविन्द्र प्रभात जी के वजह से 2011 व 2012 में वर्ष के सर्वश्रेष्ठ युवा कवि के रूप में मिला :-) :-D !! हँसते मुस्कुराते रोते सफ़र चलता रहा !
अंजू चौधरी से मित्रता हुई एक अलग रास्ता मिला व देखा ! जिसकी खुद की रचनाओं में ढेरों व्याकरण की गलतियां होती है उसने सह संपादन में कस्तूरी पगडंडीयां व गुलमोहर जैसी तीन साझा संग्रह लाने की गुस्ताखी की ! इनमे करीबन सौ नये पुराने रचनाकार जुड़ चुके! प्रत्येक संग्रह की 500 से ज्यादा प्रतियाँ लोगो के हाथों तक पहुंची!
साला! वो दिन भी आ गया, जो गहरी नींद में देखा करते थे ! 'हमिंग बर्ड' की फुदकन सोलो संग्रह के रूप में सितम्बर में प्रकाशित हुआ! अगर भिखारी को एक हजार का नोट पकड़ा दे तो वो एक एक पैसे का वेल्यु समझेगा ! वैसा ही हुआ जो सोचा नही था वो मिला! हमने भी दोस्ती जिंदाबाद के नारे के साथ ऐसी कोशिश की कि 600 प्रति का पहला संस्करण ख़त्म हो कर पुनर्मुद्रित संस्करण आ चुकी है !! जियो दोस्तों :-)
अब करीब 60 नये पुराने प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ 'गूँज' व 'तुहिन' के नाम से दो सम्मिलित कविता संग्रह इन्फिबिम पर सिर्फ 105 रूपये में प्री बुकिंग पर है जिसका विमोचन 4 अप्रैल को संध्या 5 बजे हिंदी भवन में होना निश्चित हुआ है !! आइयेगा न !!
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"जिंदगी के राहें" के साथ समय समय पर मिलें दोस्तों , तुम्हारा शुक्रिया !
आगे भी साथ चलना प्लीज :-)
जिंदगी की राहें
Wednesday, March 11, 2015
बीडी बनाते बच्चे
मेरे गाँव और उसके आसपास
बीडी बनाते दिख जाते हैं
ढेरों छोटे-छोटे बच्चे
उनकी छोटी-छोटी उँगलियाँ
बड़ी तेजी से
भर रही होती है
तेदु के सूखे पत्ते में
तम्बाकू !
बीडी बनाते दिख जाते हैं
ढेरों छोटे-छोटे बच्चे
उनकी छोटी-छोटी उँगलियाँ
बड़ी तेजी से
भर रही होती है
तेदु के सूखे पत्ते में
तम्बाकू !
इतनी तेज तो
वो खा भी नहीं पाते रोटी
झट मोड़ कर सूखा पत्ता
भर कर सूखी तम्बाकू
बांधते हुए धागे से
सहेजते हैं, सजाते हैं
लम्बी लम्बी बीड़ियाँ !
वो खा भी नहीं पाते रोटी
झट मोड़ कर सूखा पत्ता
भर कर सूखी तम्बाकू
बांधते हुए धागे से
सहेजते हैं, सजाते हैं
लम्बी लम्बी बीड़ियाँ !
चमकती आँखों से
बताते हैं साथी को
आज बनाई कुल
कितनी सारी बीड़ियाँ !
बताते हैं साथी को
आज बनाई कुल
कितनी सारी बीड़ियाँ !
उन्हें कहाँ पता होता
इससे जलता है फेफड़ा
वो भी बन जाते हैं,
एक्टिव या पेस्सिव स्मोकर
बनाते हुए बीड़ियाँ!
इससे जलता है फेफड़ा
वो भी बन जाते हैं,
एक्टिव या पेस्सिव स्मोकर
बनाते हुए बीड़ियाँ!
इस फेफड़े को जलाने
की तरकीब को
बनाते बनाते
कब जल उठती है
इन मरदूदों की अंतड़ियाँ
बस लपेटते जाते हैं जीवन
या जाने बीड़ियाँ !!
.........................................................
अंततः !
मासूम बच्चे
जलती बीडी
धुंआ- जिंदगी
तेदु के पत्ते
सबको काल कवलित कर रही है बीड़ियाँ !!
की तरकीब को
बनाते बनाते
कब जल उठती है
इन मरदूदों की अंतड़ियाँ
बस लपेटते जाते हैं जीवन
या जाने बीड़ियाँ !!
.........................................................
अंततः !
मासूम बच्चे
जलती बीडी
धुंआ- जिंदगी
तेदु के पत्ते
सबको काल कवलित कर रही है बीड़ियाँ !!
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