जिंदगी की राहें

जिंदगी की राहें

Followers

Thursday, April 3, 2014

छोटका पप्पा

(मेरे छोटे पापा, छोटी माँ और मेरे बेटे और भाई के बेटी के साथ)

छोटका पप्पा !

है न प्यारा सा सम्बोधन,

दिल से बहुत करीब,

बचपन की यादों से जुड़ा

एक महत्वपूर्ण हिस्सा !!


पापा से ज्यादा डर था,

पर प्यार भी पाते थे पापा से ज्यादा,

साइकिल के डंडे पर बैठकर,

पूरे शहर के सफर में हम होते थे  हमसफर,

उफ! कितना समझते-समझाते हमें,

लगता, कितना उपदेश देते !

खूब पढ़ो! खूब खेलो ! खूब खाओ !!

और हम,

हूँ हाँ ! के साथ उनकी बातों को उड़ाते रहते

पढ़ाई के लिए डांट का होता अजीब सा डर,

तभी तो, सामने रख कर विज्ञान/गणित की किताब

हवा हूँ, हवा मैं, बसंती हवा हूँ” ....

जैसी बावली सी कविता चिल्लाने लगते और

उनके ओझल होते ही खिलखिला उठते,

दूर आटा गूँथती छोटी माँ नहीं रह पाती चुप,

मुस्कुरा ही देती ...


था मुझे दिल से संबन्धित रोग

घर में खुसफुसाहट बराबर चलती

चक्कर लगता मेरा डाक्टर के क्लीनिक पर,

मैं साइकिल के डंडे पर सवार और

छोटका पप्पाथे न मेरे साथ

बहुतों बार देखी थी मैंने उनके माथे पर चमकती पसीने की बूंद पर,

धीरज रखो सब ठीक, होगा

यही, आवाज सुनी थी उनसे !



मेहनत और चाहत

ये दो शब्द कैसे होते हैं

अब समझा हूँ उनसे

बेशक पारिवारिक उलझन व दूरियाँ

है वो वजह जो हैं हम दूर

परछोटका पप्पा दिल के बहुत अंदर बसते हो तुम” !!



Tuesday, April 1, 2014

हार्ड बाउंड डायरी

काश एक पूरी मानव जिंदगी को
देख सकें हार्ड बाउंड डायरी में समेट कर
अधिकतर पन्नें होंगे ऐसे
रूटीन कार्यों से भरें हो जैसे
जैसे समय से खाया-पीया
थोड़ी बहुत जरूरत के लायक
निगल ली साँसे, और सो गए
फिर औंधे मुंह ...
मतलब पन्ने बेशक पलट गए
पर न बदली ये जिंदगी
कुछ पन्नें रहें होंगे कोरे
आखिर कुछ दर्द, कुछ कठिनाइयाँ
शब्दों में कहाँ बंध पाते हैं
किसी किसी पन्नें पर
होगी लिखावट बेतरतीब, जल्दबाज़ी की
क्योंकि जिंदगी में कई दिन होते हैं ऐसे
जिसमें न मिलता है सुकून, न होता है दर्द
पर पूरे दिन भागते हैं जैसे तैसे
कुछ खास पन्नें, थे स्टार-मार्क किए
जैसे कुछ तो ऐसा किया, जो था अहम
दिल से जुड़ा, जिंदगी से जुड़ा
और हाँ, दो-चार पन्ने में लगे थे फ्लेप
आखिर दो दिलों का मिलना
जिंदगी में नए रिश्तों का गढ़ना
नए अहसासों का जन्म लेना आदि
जैसे महत्वपूर्ण अद्वितीय सहेजे हुए पल
खूबसूरती से .....
पर अंतिम पन्ना !! उफ़्फ़ !!
था कोने से फटा
आखिर मृत्यु के लिए
यही तो है एक अकस्मात सूचना....
मानव जीवन की जिंदगी
थी हार्ड बाउंड डायरी में उकेरीत .........!!  


Friday, March 28, 2014

उदास कविता

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से ली गई एक तस्वीर

मैं भी लिखना चाहता हूँ

एक कविता उदासी पर

पाब्ला नेरुदा की तरह !

उकेरुंगा पन्नो पर

अंधकार, दर्द, व तिरस्कार

दर्द व घुटन का लबादा ओढ़ कर

रचूँगा शब्दचित्र

अश्कों भरी स्याही से

पर, मेरे अंदर की सोच

कभी कलम की नोक से

फूटती है मुस्कान

तो कभी दाँत दिखाते

झिलमिलाते सितारे

क्या जरूरी है उदास होना

एक उदास कविता के सृजन हेतु !


चलो काटो चिकोटी

या मारो थप्पड़

शायद ऐसे ही उदास सोच जन्में

या फिर सोचता हूँ वो चेहरा

हाँ वही !!

मेरे असफल प्रेम का प्रतीक !!

अब तो लिख पाऊँगा न !!

एक उदास कविता !!

गूगल से


Wednesday, March 26, 2014

वक़्त




तुम्हारा गुस्से से कहना कि
“कभी वक़्त है तुम्हारे पास,
सिर्फ मेरे लिए !”
तुम्हारा
अपने लिए समय का मांगना
मेरे अंदर की
जलती प्रेम की मोमबत्ती से
तुम्हारे प्यार के हलचल से
डबक कर मोम के गिरने सा
देता है अनुभव

आखिर ये अतिरेक प्रेम ही तो कहता है
“हर दम चाहिए साथ"
काश! तुम ताजिंदगी
ऐसे ही मेरे साथ की
रखो चाहत !
वैसे भी, प्रेम के सिक्के के
दूसरी ओर ऐसे ही होता है
गुस्सा व क्षोभ
पर सिक्का उछलने पर
जीत की संभाविता
प्रेम का ही है !
विशुद्ध प्रेम !!
“लव यू”
(चमकती स्मृति और प्रेम पुराना थोड़ी होता है)
~मुकेश~


Friday, March 21, 2014

प्रेम व चुइंग-गम


कल जब टहल रहा था सड़कों पर

तो मुंह में थी चुइंग-गम

और मन में उभरी एक सोच

क्या ढाई अक्षर का प्यार

और चुइंग-गम है नहीं पर्यायवाची ?

नवजीवन की नई सोच !

फिर चूंकि सोच को देनी थी सहमति

इसलिए मुंह में घुलने लगा चुइंग-गम !


देखो न शुरुआत में अधिक मिठास

जैसे मुंह से निकलती मीठी “आई लव यू” की आवाज

अंतर तक जाते ठंडे-ठंडे प्यारे एहसास

वाह रे मिंट और मिठास


कुछ वक्त तक चुइंग गम का मुंह में घुलना

जैसे कुछ समय तक प्यार का

दो दिलों के भीतर प्यारे से एहसास को

तरंगित करते हुए महसूसना ...


पर समय के साथ

यही मिठास और ठंडे एहसास

घूल कर रिस जाते हैं

रह जाती है इलास्टिक खिंचवाट

जो न देती है उगलने, न ही निगलने

उगलो तो कहीं चिपकेगा

निगले तो सितम ढाएगा


ऐसा ही कुछ गुल खिलता है

ये आज का प्यार

और मुंह में डाला हुआ चुइंग गम !


जो फिर भी होता है सबका पसंदीदा

आखिर वो पहला मिठास

और तरंगित खूबसूरत एहसास

है न सबकी जरूरत !!


अंत में मेरी रचना चाय का एक कप सुनिए यू ट्यूब पर :)


Tuesday, March 18, 2014

मृत्यु



काश ! वतन के लिए

हो पाता शहीद

फिर चरकुटठे काफिन में

लायी जाती ....... !!

मेरा शरीर

अगरबती व लोबान के सुगंध में

फूल-मालाओं से प्रदीप्त होता

शायद, कुछ टोपियाँ भी झुकती

आंखे तो नम होती ही ॥ !!


पर लग रहा

किसी भेड़िये के आतंक से

डर कर, हो जाऊंगा शिथिल

फिर वो नोच लेगा बोटी बोटी

कहीं आत्मा भी न मर जाए

क्योंकि फिर

मरे हुए जानवर सा

बदबू देगा ........ मेरा शरीर !!


पता नहीं !!

भविष्य का ???




साथ में, वेब मैगजीन साहित्य रागिनी में मेरा साक्षात्कार पढ़ें, मुझे अच्छा लगेगा ! 

Friday, March 14, 2014

होली


होली का पर्व है अलबेला

है मस्ती भरा!!


जब भी आती है ये मनभावन होली

आता है याद

गाँव का कीचड़, साथ में गोबर, मिट्टी राख़ भी ...


जब भी आती है ये स्वादिष्ट होली

आता है मुंह में पानी

क्योंकि बनते ये घर घर में

मालपूआ, दहीबड़ा, गुजिया और बहुत से पकवान


जब भी आती है ये रोमांचक होली

मन के आंखो से दिख जाती है

माँ के उम्र की भौजियाँ

उनका रंगा हुआ गाल और खुद का छोटा सा

रंगो भरा हाथ


जब भी आती है ये यादगार होली

स्मृतियों मे होती है

मैया-बाबा को मेरा चरण-स्पर्श

अबीर-गुलाल के साथ

व माथे पर, मैया का प्रेम से अतिरेक चुम्मा


जब भी आती है रंग बिरंगी होली

दिख जाता है खुद का

झक्क सफ़ेद कुर्ता व पैजामा

और फिर उसके रंग जाने के कारण

मेरे बचपन की खीज और गुस्सा


जब भी आती है मस्त मस्त होली

तो आती है आवाज़

ढ़ोल मजीरे और भांग के साथ

मस्ती में गाते होली के गीत

खुशियाँ और संगीत


और अब जब भी आती है ये नशीली होली

होता है अपना

दो कमरे का घर

सिर्फ बीबी व बच्चो का साथ

थोड़ा अकेलापन, थोड़ा अनमनापन !!