जिंदगी की राहें

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Monday, February 10, 2014

प्यार !



प्यार जो है ढाई आखर शब्द

प्यार मौन का

प्यार नजरों का

प्यार अहसासों का

प्यार साँसो का

प्यार दिलों का

प्यार स्पर्श का

प्यार दूरी का

प्यार धड़कन का

प्यार गंध का

प्यार सुगंध का

प्यार शब्दो का

प्यार लिखावट का

प्यार चिन्ह का

प्यार प्यार का

प्यार उसकी इबादत का

प्यार उसकी हसरतों का

प्यार उसकी अहमियत का

प्यार जिंदगी का

प्यार ज़िंदगानी का

प्यार उसका

प्यार मेरा

प्यार हम दोनों का

प्यार ही है न :)



Wednesday, February 5, 2014

मित्रता का गणितीय सिद्धांत



शांत सौम्य निश्छल
थी उम्रदराज
बस थोड़ी होंगी उम्र में बड़ी
यानि संभावनाएं....
मित्रता के साथ
थी, मिलने वाली सलाह की
उम्मीद तो रहती ही है
पर ये उम्मीद हुई भी पूरी
कभी मिली सलाह
कभी की उन्होने खिंचाई
कुछ साहित्यक त्रुटियाँ भी बताई
हमने भी सीखा व सराहा !

एक बार, अनायास ही हुआ उजागर
उनके व्यक्तित्व का नया अनबूझा सा पन्ना
नितांत वैयक्तिक उपलब्धियों की लालसा में
चतुराई से किया हुआ
जोड़, घटाव, गुणा भाग का
एक अलग गणित
संबंधो के धरातल पर
क्योंकि वो गढ़ रही थी
रिश्तों के नए प्रमेय
जो था नए संबंधो पर आधारित!
तभी तो “दो सामानांतर रखाओं को
जब त्रियक रेखा काटे तो
होते हैं, एकांतर कोण बराबर”
इसी सिधान्त पर समझा रहीं थी
ढूंढ रही थी, मेरी गलतियाँ
ताकि, दिख पाये, सब बराबर
आजमाए गए गणितीय सूत्र
ताकि सिद्ध हो पाये कि
रिश्तों के प्रमेय
का गढ़ना है उचित !!

माफ करो यार !!
ऐसी मित्रता को दूर से सलाम
एक गणितीय सिद्धान्त और है
“समानान्तर रेखाएँ
मिलती हैं अनंत पर जाकर”
तो एक स्पेसिफिक स्पेस
बना लिया है मैंने
हर समय के लिए
बी हॅप्पी न ................!! 

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कहानीकार के तरह कवितायें गढ़ने के लिए भी प्लॉट की जरूरत होती है, कभी कभी ........ एक ऐसे ही प्लॉट के साथ !!


Wednesday, January 29, 2014

शब्द


है अजीब दुनिया शब्दों की
कभी दर्द से कराहते हैं शब्द
तो कभी खुशियों से से खिलखिलाते शब्द
जिंदगी में संबल भरते शब्द
मिठास उढ़ेलते, गरम एहसास जगाते शब्द !

हथियारों जैसे संहार करते शब्द
तो अंकुरित सृजन करते सुंदर शब्द
कभी प्रार्थना व दुआ देते शब्द
तो बद-दुआओं से भरे कठिन शब्द
चोट पहुँचते खतरनाक शब्द
तो दवा-दारू जैसे मरहम करते शब्द
केंद्र होते हुए परिधि को संचालित करते शब्द
परिधि से केंद्र पर आश्रित होते
आभारी शब्द
परस्पर अन्योनाश्रित
जीवनशक्ति होते शब्द
जिंदा, ज़िंदादिल, जिंदाबाद शब्द
मर-मर कर तड़पते मुर्दाबाद शब्द !

उफ! आह! से आहा ! तक की
दूरी तय करते शब्द !
तो कभी चमत्कृत करते शब्द !!   
इंसान को मुखर बनाते शब्द
कभी मौन हो इंसान बनाते शब्द !!


Tuesday, January 21, 2014

वोटों के भिखारी



बड़ा पेट, भोला चेहरा
नेताजी का है सबसे जुदा चेहरा
जमीन से जुड़े कहे जाते थे
जब छुटभैये नेता के शुमार में आते थे
हर छोटे-बड़े कामों में व सभाओं में
जनता के बीच ये चेहरा नजर आता था
बेशक जनता का काम तब भी नहीं हो पाता था
पर नेताजी का अपनापन अपना सा लगता था
                 
धीरे धीरे बदला वक़्त, बदली किस्मत
बड़े नेताओं के कतार में, आ गए नेताजी
बड़े मंच से अब वो बड़े मुद्दे पर दहाड़ते  हैं
अगले क्रम के नेता कहलाते हैं
नेताजी के दिल में करुणा का कारख़ाना होता था
पर वक़्त आने पर उसका फाटक खुल नहीं पाता था

कहते  हैं जब लोग बड़े- पहुंचे हो जाते हैं
तो कीचड़ में पैर ज्यादा फंस जाते हैं
पर जनता को कौन समझाये, इतना तो बनता है
नेताजी के ऊपर पड़े भ्रष्टाचार की छींटो को
साफ करने हेतु पार्टी व सरकारी अमला लग जाता है
एक सूत्री कार्यक्रम फिर होता है,
हार नहीं मानेंगे, ठान लिया है, कर दिखाएंगे
नेताजी को झक सफ़ेद चमकाएंगे

यूं तो मुआ कैमरे का लेंस, इसको देख कर
नेताजी की आँखें, पहले चमचमा उठती थी
पर बदले चश्मे में वो आज तमतमा उठी थी
नेताजी, गुस्से में चिल्लाये, जांच करा लीजिये
पाक साफ हैं, हम, हमें न सीखाइए
नेताजी का आवेश, रुक नहीं पाता था
वैसे भी खुद की गलती पर हर कोई बरसता है

कभी कुछ हजारों की संपत्ति वाले फटेहाल नेताजी
अब बस कुछ अरबों में खेलते हाँ
लेकिन आज भी चुनाव आने पर
वोटों के लिए भिखारी बन तरसते हैं !!  




Wednesday, January 15, 2014

“छमिया”

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची गई तस्वीर
"छमिया" ही तो कहते हैं
मोहल्ले से निकलने वाले
सड़क पर, जो ढाबा है
वहाँ पर चाय सुड़कते
निठल्ले छोरे !
जब भी वो निकलती है
जाती है सड़क के पार
बरतन माँजने
केदार बाबू के घर !!

एक नवयुवती होने के नाते
हिलती है उसकी कमर
कभी कभी खिसकी होती है
उसकी फटी हुई चोली
दिख ही जाता है जिस्म
जब होती है छोरों की नजर
पर इसके अलावा
कहाँ वो सोच पाते हैं
भूखी है उसकी उदर !!

आजकल छमिया” भी
जानबूझ कर
मटका देती हैं आंखे
साथ ही लहरा देती है
वो रूखे बालों वाली चोटी
जो छोरों के दिल में
ला देती है कहर
आखिर घूरती आँखों
के जहर
से, वो शायद हो गई
है, बेअसर !!

छमिया आखिर समझने
लगी है
मिटाने के लिए भूख
भरने के लिए उदर
जरूरी है ये सफर

अंतहीन सफर !!!   

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची गई तस्वीर

Thursday, January 9, 2014

मौसम और रिश्ते !!


दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची हुई तस्वीर 

मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर !
ठंडी संवेदनाएं
और जम कर बनता बर्फ
जैसा हो जाता है रिश्ता
अंधेरी सर्द भरी रात
बिलकुल घुप्प एवं ठंडी
दूरी में रहती है गर्माहट
तो नज़दीकियाँ लाती है सर्द
ये रिश्ता भी है अजीब
मौसम की आवोहवा करती है असर !!

कभी कभी रिश्तों के बीच
चलती है लू जैसी गरम हवा
ढाती है कहर
झुलसा देती है अंदर तक
क्षण भर के कडवे गरम बोल
बना देते हैं पराये
ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी के तरह  
मौसम की आवोहवा रिश्तों पर करती है असर

ये संबंधो का अलबेला रिश्ता
सुख-दुख के दामन के बीच
खेलता है, अठखेलियाँ करता है
फिर कभी कभी यही रिश्ता
सावन के मूसलाधार बारिश के तरह
आँखों से झरझराने लगता है
ला देती है अंदर तक नमी
फिर यही बरसता सावन
लाता  है गर्मजोशी
रिस जाता है दर्द
तो सही  है न
मौसम की आवोहवा करती है रिश्तों पर असर !!

दिल्ली फिल्म फेस्टिवल से खींची हुई तस्वीर