जिंदगी की राहें

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Saturday, July 3, 2010

HONOUR KILLING



पहली बरसात की हलकी फुहार
मंद मंद बहती पवन की बयार
अंतर्मन में हो रहा था खुशियों का संचार
अलसाई दोपहर के बाद
उठ कर बैठा ही था
बच्चो ने कर दी फरमाइश
पापा! चलो न "गार्डेन"!!
मैंने भी "हाँ" कह कर
किया खुशियों का इजहार
और पहुच गए "लोधी गार्डेन!!!!

मौसम की सतरंगी मस्ती
खेल रहे थे, क्योंकि थी चुस्ती
हमने भी बनाई दो टीम
लिया प्लास्टिक का बैट  
उछलती हुई टेनिस बॉल
पर लगाया एक शौट
जो उड़ता हुआ जा पहुंचा
पेड़ के पीछे, झाड़ी  के बीच!!

नौ वर्षीय बेटा दौड़ा
पर उलटे पैरों लौटा
बडबडाया
वहां है कोई, मैंने नहीं लाता....
आखिर गया मैं
पर मैं भी लौटा बिना बॉल के
होकर स्याह!
खेल हो गया बंद
सारे समझ न पाए
हुआ क्या???

धीरे से, श्रीमती को समझाया
अरे यार! कैसे  लाऊं  बॉल
स्तिथि बड़ी है विषम
पता नहीं क्यूं ये युवा जोड़े
अपने क्षुदा  पूर्ति और काम वासना 
के  सनक को
को कहते हैं, हो गया है प्यार
पब्लिक प्लेस पर
इस तरह का दृश्य गढ़  कर
क्यूं करते हैं हमें शर्मशार

मेरे आँखों में तभी कौंधा
HONOUR KILLING जैसा शब्द
लगा ये ऐसे मुद्राओ के साथ
हो नहीं रहा इज्जत से खिलवाड़
क्या इन झाड़ियों में छिप कर
होने वाला जिस्मानी प्यार
कर नहीं रहा युवाओं के
माता-पिता की इज्जत तार-तार
क्यूं इनके आँखों की शर्म
इन्हें बना देती है बेशर्म
क्यूं? क्यूं?? क्यूं???





Thursday, June 24, 2010

ये दिल्ली है मेरी जान


ये दिल्ली है मेरी जान 
चौड़ी सड़कें 
फिर भी सरसराती
बी.एम.डब्लू. 
के नीचे जाती मेहनतकश की जान



ये दिल्ली है मेरी जान 
रोड़े पत्थर का जंगल 
और प्रदुषण 
फिर भी 
सबसे हरियाली राजधानी की पहचान


ये दिल्ली है मेरी जान 
एक तरफ पैसे की चकाचौंध 
दूसरी तरफ 
दिखती मौत का तूफान


ये दिल्ली है मेरी जान 
नेताओं के चकाचक कुरते 
और उस सफेदी के पीछे 
छिपी काले कुत्ते के अरमान 


ये दिल्ली है मेरी जान 
दूर से दिखता पार्लियामेंट हाउस 
पर ये नहीं दिखता 
की उसके अन्दर लड़ते हैं 
मानव खाल में मिक्की माउस


ये दिल्ली है मेरी जान 
कोई तन को ढक नहीं पाता
क्योंकि नहीं हैं कपडे  
कोई तन को नहीं ढकता 
क्योंकि 
बनाना है पेज - ३ की शान


ये दिल्ली है मेरी जान 
विकास के नाम पर 
क्या नहीं कर रही सरकार 
पर सब बेकार 
क्योंकि  
आम आदमी महंगाई से परेशान


ये दिल्ली है मेरी जान 
जहाँ की दिल्ली पुलिस 
कहती है
विथ यू, फॉर यू, always !
लेकिन फिर भी लुटती है
लड़कियों की अस्मत, और जाती है
साधारण लोगो की जान


ये दिल्ली है मेरी जान 
कहने को है  
"दिल वालो की दिल्ली" 
लेकिन सब चुप होते हैं 
जब हादसे में रूकती है
किसी की धड़कन


ये दिल्ली है मेरी जान 
जहाँ जिंदगी देती है इतनी दर्द 
फिर भी दिल में  
उम्मीद रहती है सर्द 
आखिर कभी तो वो होगा 
जब जीतेंगे जहान..............:)

Thursday, June 17, 2010

"समय"


"समय"
जिसमे है सिर्फ तीन अक्षर
जो है एक छोटा सा शब्द मात्र
लेकिन है इसमें समाहित
अति विशाल शक्तियों को
समेटे रखने वाला पात्र
जड़ जगत के जीव सर्वत्र
नाचते हैं, गाते हैं...
इसके धुरी पर हो कर एकत्र.........!!!

इसके गति के साथ
जिसने भी बैठाया ताल-मेल
सफलता की बुलंदियों पर
पहुंचा बन कर सुपर मेल
परन्तु, हम जैसे साधारण लोगो की सोच..!
हमारे लिए तो ये वही है
पसेंजेर, वही रलेम-पेल!!!!!!!!!!




Monday, June 7, 2010

काली रात


वो काली और गाढ़ी रात
पर नींद नहीं आँखों में ........
कड़कते काले बादल
 इस सुनसान गगन में.........
इठला कर चमक रही है बिजली
जैसे आग लगने वाली हो तन मन में..........
सो रहे हैं सब
लेकिन इस ख़ामोशी में भी
कोलाहहल सा हो रह है मन में.......
किसपे चिल्लाऊं
किसको बुलाऊं
इस सूनेपन में........
सितारे भी तो नजर
नहीं आते इस गगन में.........
क्या यही है जिंदगी
ऐसे ही कुछ सवाल
उठ रहें हैं मन में
कौंध रहे हैं मन में............



Monday, May 31, 2010

सड़क पे बचपन

तपती गर्मी
दौड़ती सड़क
भागती मेरी
कार एकाएक सिग्नल हुआ लाल
चर्र्र्रर.......... ब्रेक
थम गयी कार
जेब्रा क्रोशिंग से ठीक पहले......!!
.
"सारे सपने कहीं खो गए,
हाय ! हम क्या से क्या हो गए...."
सुरीली गमगीन आवाज
में था खोया
तभी था कोई जो
खिड़की पर हाथ हिलाते हुए चिल्लाया
"बाबूजी! ले लो
ये नीली चमकीली कलम"
नहीं!!! - मैंने कहा!
.
झुलसती गर्मी में
था वो फटेहाल
उम्र...?????
शायद आठ साल,
लेकिन फिर भी
तपती गर्मी में कांपती आवाज
"बाबूजी! ले लो न"
"एक के साथ, एक मुफ्त है!!"
ओह! रहने दे यार!!
क्यूं करता है बेहाल॥
.
मुफ्त! मुफ्त!! मुफ्त!!!
इस छोटे से शब्द में
मुझे दिखी एक चमक!!
वो छोरा जा ही रहा था
चिल्लाया मैं
दिखा जल्दी
सिग्नल होने वाली है!
और फिर उसे पकडाया
दस का नोट
थी मेरे हाथों में दो कलम!!
.
सिग्नल हुई हरी
गियर बदली
निकल गया सर्रर्रर!!
पर उस छोटे से वक़्त का
किया मैंने आत्म-मंथन!!!!!!
उस छोटे बच्चे की बचपनसे बड़ा
क्यूं दिखा "मुफ्त" का लालच
क्यूं नहीं दिखी
उस गरम तपिश
में, उसके जीने की कोशिश..........
क्यूं नहीं दिखी..............................








Friday, May 28, 2010

ब्लोगोत्सव 2010





















ब्लोगोत्सव २०१० के पर रश्मि दी के निर्देशन के कारण मेरी एक कविता "कन्वेस" http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7945.html


और "MALL CULTURE" पे मेरा एक आलेख


उपरोक्त साईट पे प्रकाशित हुई...आप सबो से अनुरोध है , कृपया एक बार जरुर है उत्सव वर्धन के लिए वहां पहुचें..........:)

धन्यवाद्!!













Monday, May 17, 2010

खुले आँखों से देखा सपना!





खुले आँखों से देखा है मैंने सपना
जो था बहुत सुहाना......
.
माना अपने चालीसवें बसंत में कदम रख चुका हूँ
पर उस दिन
जब टीवी के परदे पर
दिखा थिरकता सैफ
और उसके बाँहों
हसीन कटरीना कैफ
तो मेरी मटर सी आँखे हो गयी स्थिर!!
.
पहले तो परदे पे चेहरा झिलमिलाया
फिर आँखे बौरायीं
हो गया चमत्कार
दिख रह था मेरा हमशक्ल
ख़्वाबों सा मस्त, कड़क, जवान!!......:)
.
ओंठो पे तैर उठी मुस्कान
आँखें चमकीं मटक के
दिल...."वो तो बच्चा है जी"
की तर्ज़ पर हो गया नादान!!
.
इस सुहाने सपने में ही
था पूरा डूबा
की एक आवाज ने
कर दी तन्द्रा भंग..........
"पापा!!!!!!!!!!
साईकल में हवा भरवा दो........!!"
हकीकत का झटका दिया!
.
उफ़!
खुले आँखों से देखा था जो सपना
जो था सुहाना......
पर ... सब हुआ बेगाना ! !!