जिंदगी की राहें

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Monday, June 7, 2010

काली रात


वो काली और गाढ़ी रात
पर नींद नहीं आँखों में ........
कड़कते काले बादल
 इस सुनसान गगन में.........
इठला कर चमक रही है बिजली
जैसे आग लगने वाली हो तन मन में..........
सो रहे हैं सब
लेकिन इस ख़ामोशी में भी
कोलाहहल सा हो रह है मन में.......
किसपे चिल्लाऊं
किसको बुलाऊं
इस सूनेपन में........
सितारे भी तो नजर
नहीं आते इस गगन में.........
क्या यही है जिंदगी
ऐसे ही कुछ सवाल
उठ रहें हैं मन में
कौंध रहे हैं मन में............