जिंदगी की राहें

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Tuesday, July 28, 2015

"बुद्धं शरणम् गच्छामि................."

ऐ धरती
मैं तुम पर खड़ा रहने के बदले
चाहता हूँ तुम्हारे गोद में सोना,
चाहता हूँ महसूस करना
चाहता हूँ मेरी देह में 
लिपटी हो मिट्टी
जहाँ-तहां घास और खर-पतवार भी
और फिर, वही पड़े निहारूं
नीली चमकीली कोंपल से भरी,
चमकती दरख्ते, और उस पर बैठी काली मैना
मेरे चेहरे पर, हो लगी
नम कीचड़ से सनी
जीवनदायिनी मिटटी और उसके सौंधेपन में
खोया हुआ 'मैं'
निहारूं नीले गगन को
और दिख जाए दूर उड़ता हुआ
झक्क सफ़ेद, घर लौटते
हंसो का समूह, एक कतार में
ऐ धरती
तुम्हे छूना
तुम्हारा स्पर्श
ठीक वैसे ही न
जैसे मिलती हो ममता माँ की
या प्रेमिका का दैहिक, उष्ण स्पर्श
दोनों ही प्रेम, संवेदनाओं का अतिरेक
ख़ुशी की पराकाष्ठा
ओ मेरी वसुधा
तुममें लेट जाना
ठीक वैसे ही न
जैसी बौधि वृक्ष के नीचे
बुद्ध ने पाया हो परम ज्ञान
या फिर जैसे मेरे मरने पर मिलेगी
मुझे शांति !
या बहुतों को शांति !
अभी तो बस मैंने ये
महसूसा, हूँ तुम पर लेटा
और दूर से बौद्ध मठ से आ रही आवाज
"बुद्धं शरणम् गच्छामि"
ज्ञानं शरणम् गच्छामि!
~मुकेश~

Tuesday, November 4, 2014


धरती पर कहीं स्वर्ग है 
तो सिर्फ यहीं हैं, यहीं है, यहीं है
ऐसा जपने वालों
ए कश्मीर के निवासियों 
पहली बार देखा व झेला तुमने 
भीषण दर्द और विभीषिका बाढ़ की 
पुरे देश की हेड लाइंस में 
फिर से आ ही गए,
चौतरफ़ा छा ही गये
चौकुठे कैमरे के साथ 
गंभीर बैठा मीडीया
उधेड़ रहा अब तुम्हारे
ज़ख़्मों की बखिया
दर्शाते हुए चिंता
घोषित किया गया
इसे राष्ट्रीय आपदा
और तुरंत फुरंत ही पूरा देश
खड़ा है अब तुम्हारे पीछे
हर भारतीय को प्यारा है कश्मीर
आख़िर हमारा है कश्मीर
हमें दिली हमदर्दी है कश्मीर !
आखिर दिल में बसते हो यार
सुन रहे हो न ए-कश्मीर !!
बेशक घाव देते रहे हो, तुम
फिर भी हमें चिंता है तुम्हारी !!

पर कभी तुमने
उस बिहार की बाढ़ विभीषिका पर
हलकी अधमुंदी नजर भी डाली
वही बिहार, जो इस देश का कभी सिरमौर था
वहां हर वर्ष होता है त्राहिमाम
नेपाल से निकलती नदियाँ
लीलती है लाखों जानें
मूक..बिना अखबारों की सुर्खियां बने
लाखों लाशें बह.. गल.. जल जाती हैं
फिर भी बिहार, नहीं होती हकदार
किसी खास पॅकेज का
अनुदान का, संवेदना का
आंसू तक नहीं मिलते, टपकाने वाले
फिर भी ये बिहार, मजबूती के साथ
तुम्हारे साथ खड़ा है, कश्मीर !!

याद रखना कश्मीर
हर बिहारी के दिल में, बसते हो तुम !!
वैसे भी हर बदमाश बच्चे का ध्यान
माँ बाप ज्यादा ही रखते हैं
ऐसा सुनते आये हैं हम .....
करते भी आए हैं हम...
सच ही है न .......!!
कश्मीर!! कभी दिल में बिहार को
बसा कर देखो न .......प्लीज !!
शायद दिख जाए कभी
एक हल्की झलक तुम्हारी,
पीर कहाँ मेरी-तेरी
एक ही तो है हमारी !
---------
काश हम रहे साथ जिए साथ 
हरदम साथ साथ 




Monday, July 21, 2014

धरती और आकाश


ए आकाश !!
बुझाओ न मेरी प्यास
सूखी धूल उड़ाती, तपती गर्मी से
जान तो छुड़ाओ
ठुनकती हुई नवोदित हिरोइन की तरह
बोल उठी हमरी धरती अनायास !!

यंग एंग्री मैंन की तरह
पहले से ही भभका हुआ था बादल
सूरज की चमकती ताप में जलता
गुर्रा उठा हुंह, कैसे बरसूँ
नहीं है मेरे में अभी बरसने का अहसास !!

पता नहीं कब आयेंगे
पानी से लदे डभके हुए मेघ भरे मॉनसून
और कब हम बादलों में
संघनित हो भर जायेंगे जल के निर्मल कण
ए धरती सुनो, तुम भी तो करो प्रार्थना
हे भगवन, भेजो बादल, तभी वो सुनेंगे तुम्हारी अरदास!!

वैसे भी इस कंक्रीट जंगल में
भुमंडलीकरण ने हर ली है हरियाली
फिर भी भले, जितने भी बीते दिन
हो सकता है लग जाये समय, पर
ए धरती, आऊंगा भिगोने
ऐसा तुम रख सकती हो आस !!

भिगोता रहेगा तुम्हे, हमारे
रिश्तो का नमी युक्त अहसास
भींग जाओ तुम तो
फ़ैल जाएँ चहुँ ओर खुशियाँ
चमक उठे पेड़, चहचहाने लगे विहग
मैं आऊंगा, छमछम – छमाछम
बरसाऊंगा नेह जल
सुन रही हो न !!
कह रहा तुम्हारा आकाश, रखना विश्वास !!

मिलन होगा,
जरुर होगा
मिलेंगे एक दिन हम
धरती और आकाश !!
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एक मौनसुनी कविता :)