जिंदगी की राहें

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Saturday, September 23, 2017

गुड बाय 'पापा'



'पापा' तो होते है 'आसमान'
एक बेहद संजीदा अभिव्यक्ति
कहती है ये 
फिर अंतिम बार उनसे मिलने
समय के कमी की वजह से
कर रहा था हवाई यात्रा
बेहद ऊंचाई पर था शायद
पड़ रहा था दिखाई
विंडो के पार दूर तलक
फटा पड़ा था आसमान
बिखड़े थे बादलों के ढेर इधर-उधर
पापा दम तोड़ चुके थे।
तेज गति से भाग रही थी ट्रेन
उसके स्लीपर कूपे में बैठा
द्रुत गति से भाग रहा था अशांत मन
टाइम फ़्रेम को छिन भिन्न कर
बना रहा था रेतीली मिट्टी के घरौंदे
पर, गृह प्रवेश से पहले
टूट चुके थे ख़्वाब
मिट्टी में ही तिरोहित हो चुके थे पापा
ट्रेन फिर भी भाग रही थी
अपने सहज वेग के साथ।
अब ऑटो से चल पड़ा
रेलवे स्टेशन से पापा के करीब तक
खटर-पटर करता रिक्शा
उछल कूद कर रही थी 
सुषुप्त संवेदनाएं,
सड़कों ने चिल्ला कर बताने कि
की कोशिश
स्मृति पटल पर चल पड़ी
पापा की 'मोपेड'
उनके कमर पर हाथ था मेरा।
मर चुके थे पापा
फिर भी उनकी ठंडी हथेली ने
भर दी थी गर्माहट
बेशक आंखे छलछलाई
पर रो नहीं सका एक भी पल
कंधे पे था स्नेहसिक्त हाथ
छोटे भाई का,
कहना चाहता था कुछ
लेकिन कुंद हो गयी आवाज
रुआंसा हो कह पाया
बस
गुड बाय 'पापा'

~मुकेश~

दैनिक जागरण, पटना में प्रकाशित 

Monday, May 20, 2013

काश!!



काश!
मुझ में होती, नीले नभ जैसी विशालता
ताकि तुम कह पाती
मैं हूँ तुम्हारा अपना
एक टुकड़ा आसमान !
काश, मुझ में होती
समुद्र जैसी गहराई
ताकि तू डूब पाती
मेरे अहसासों के भंवर में!
काश, मुझ में होती
हिमालय सी गंभीरता
ताकि तुम्हे लगता
मैं हूँ तुम्हारे लिए कवच सा
रक्षा करने वाला, रखवाला!
काश मेरा ह्रदय होता
फूलो के पंखुड़ियों सा कोमल
ताकि तू अपने धड़कते मन में
रख पाती, सहेज कर, बाँध कर!
काश, ऐसा कुछ हो पाता
ताकि तुम मुझमे और मैं तुम में खो जाता
जो होती प्रेम की पराकाष्ठा
सिर्फ और सिर्फ प्रेम!
प्रेम !!
काश के भंवर में
डूबता उतरता प्रेम ......... 
~मुकेश~


Tuesday, November 22, 2011

एक टुकड़ा आसमान






















छत की मुंडेर पर बैठा
निहार रहा था
सुबह का नीला आसमान
मन था उद्विग्न 
चित था अशांत
....थी ढेरों परेशानियाँ
घेरे हुए थे लाखो प्रश्न
क्या करूँ, क्या न करूँ
कब करूँ, क्यूं करूँ
करूँ तो कैसे
ये, वो, जो, तो.............????


दिल में हुक सी उठी 
निकली हलकी सी आवाज
कब तक
कब तक करूँ संघर्ष
कब तक गुजरूँ
इस संघर्ष की राह पर..
कब पहुचेंगे वहां
जहाँ तक है चाह......

कब इस विशाल 
आकाश के 
एक अंश
एक कतरे 
......पर होगा
अपना हक़
कब होगा अपना
एक टुकड़ा आसमान
खुद का आसमान..
खुद का वजूद....................


तभी दिखा
एक उड़ता
फडफडाता हुआ
कबूतर.....
जो पास से उड़ कर
पहुँच गया बहुत दूर..
लगा जैसे 
जहाँ चाह वहां राह...
जैसे सारा 
जहाँ हो उसकी ...
बिना किसी सीमा के 

अचानक
सुबह की तीखी होती धूप ने
लगाया सोच पर विराम
फिर शुरू होगया
रोज़ का खेला
वही पुराना झमेला
उतर आया में मुंडेर से
... झटक आया अपनी सोच
और ले आया साथ.
....कबूतर के ओट से
उमीदों भरा एक टुकड़ा आसमान!!

क्योंकि कबूतर के फडफाड़ते पंखो पर
उम्मीदों कि ऊँची उड़ान
मुझे दे गया अपने हिस्से का 
एक टुकड़ा आसमान
आज खबाबों में..
शायद कल 
होगा इरादों में......
और फिर 
वजूद होगा मेरा....
मेरे हिस्से का आसमान..