जिंदगी की राहें

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Wednesday, January 6, 2016

रूट कैनाल ट्रीटमेंट !!


तुम्हारा आना
जैसे, एनेस्थेसिया के बाद
रूट कैनाल ट्रीटमेंट !!

जैसे ही तुम आई
नजरें मिली
क्षण भर का पहला स्पर्श
भूल गया सब
जैसे चुभी एनेस्थेसिया की सुई
फिर वो तेरा उलाहना
पुराने दर्द का दोहराना
सब सब !! चलता रहा !

तुम पूरे समय
शायद बताती रही
मेरी बेरुखी और पता नही
क्या क्या !
वैसे ही जैसे
एनेस्थेसिया दे कर
विभिन्न प्रकार की सुइयों से
खेलता रहता है लगातार
डेटिस्ट!!
एक दो बार मरहम की रुई भी
लगाईं उसने !!

चलते चलते
कहा तुमने
आउंगी फिर तरसो !!
ठीक वैसे जैसे
डेटिस्ट ने दिया फिर से
तीन दिन बाद का अपॉइंटमेंट !!

सुनो !!
मैं सारी जिंदगी
करवाना चाहता हूँ
रूट केनाल ट्रीटमेंट !!
बत्तीसों दाँतों का ट्रीटमेंट
जिंदगी भर ! लगातार !

तुम भी
उलाहना व दर्द देने ही
आती रहना
बारम्बार !!
आओगी न मेरी डेटिस्ट !!


Monday, December 21, 2015

मेरे गाँव के कुत्ते


मेरे गाँव के कुत्ते
मान लो, उन्हें मिल जाए ऐसा कुछ मौका
कि, शहर  का देशाटन करने पहुंचे वो
मानो न, तो होगा क्या ?
सबसे पहले तो होगा नाम परिवर्तन
वो अब नहीं कहलायेंगे कुत्ता या झबरू या पिल्ला
उन्हें या तो स्ट्रीट डॉग का तमगा मिलेगा या कोई
पशु प्रेम में  पुचकारेगा  डोगी या टाइगर कह कर !!

गाँव में जब होते थे निरीह
तब बिना बंधे भी
किसी एक दरवाजे पर टिक कर भूंकते
करते रखवाली , दिखाते स्वामिभक्ति
बेशक नहीं मिलता वक़्त पर खाना, या मिलता तो
प्रेम सिक्त सुखी रोटी या मालिक का छोड़ा निवाला
हाँ, खाना मिलता जरुर, साथ में प्यार भरी चपत भी !!

बहुतों बार उस कुत्तें ने अपने
गरीब मालिक में भरी थी गर्मी
उस ठन्डे जाड़े की रात में चिपक कर स्पर्श से
बताया था उसने अपने मालिक को हाँ, मैं हूँ तुम्हारा अभिन्न !!

बिना किसी रस्सी , चेन या पट्टे के
बिना किसी ट्रेनिंग के
वो गाँव का कुत्ता सदा रहता अपने मालिक के पीछे
याद करो, सबने देखा होगा, वोडाफोन के एड में !!

मरदूद जैसे ही पहुंचे शहर के किसी मोहल्ले में
कहीं से मिला चिकन का बचा खुचा टुकड़ा
या फिर कभी मिला बचा पकवान
पर हर वक़्त, खाते समय रहती उन्हें चिंता और डर
पीछे से पड़ने वाले वार का, स्टिक का
या फिर कोई सुन्दर बाला कह देती
उफ़, सो अगली!! भगाओ इस स्ट्रीट डॉग को !!

सच ही तो है,
ये विस्थापन, गाँव से शहर का
देता है आसान तरीका पेट भरने का, पोषण का
पर नहीं दे पाता
वो प्यार, वो मिटटी की सुगंध
वो तवज्जो, वो अपनापन !!

तभी तो,
गाँव से शहर पहुंचा हुआ "मैं"
मेरे अन्दर का भूकता कुत्ता !!
विस्थापन के दर्द को झेलते हुए !!
जी रहा है !! जीने देना !!

दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल 2015 में प्राप्त करता "बेस्ट पोएट ऑफ़ द इयर" का अवार्ड

Sunday, December 6, 2015

सफ़र जिंदगी के



सफ़र के आगाज में मैं था तुम सा
जैसे तुम उद्गम से निकलती
तेज बहाव वाली नदी की कल कल जलधारा
बड़े-बड़े पत्थरों को तोड़ती
कंकड़ों में बदलती, रेत में परिवर्तित करती
बनाती खुद के के लिए रास्ता.
थे जवानी के दिन
तभी तो कुछ कर दिखाने का दंभ भरते
जोश में रहते, साहस से लबरेज !!

सफ़र के मध्यान में भी तुम सा ही हूँ
कभी चपल, कभी शांत,
कभी उन्मुक्त खिलखिलता
लहरों की अठखेलियों मध्य संयमित
गंदले नाले की छुवन से उद्वेलित
शर्मसार ...कभी संकुचित
नदी के मैदानी सफ़र सा
बिलकुल तुम्हारे
सम और विषम रूप जैसा !!

तेज पर संतुलित जलधारा
अन्नदाताओं का संरक्षक
खेवनहारों की पोषक
उम्मीद व आकांक्षाओं का
लिए सतत प्रवाह
बेशक होता
अनेक बाधाओं से बाधित
पर होता जीवन से भरपूर
कभी छलकता उद्विग्न हो
विनाशकारी बन
कभी खुशियों का बन जाता  संवाहक

सफ़र के आखिरी सप्तक में भी
मद्धम होती कल कल में
थमती साँसे
शिथिल  शरीर
मंथर वेग
निश्चित गति से धीरे-धीरे
क्षिति जल पावक गगन समीर में
सब कुछ  विलीन करते समय भी
तुम सा ही मुक्त हो जाऊंगा

डेल्टा पर जमा कर अवशेष
फिर हो जायेगी परिणति मेरी भी
आखरी पड़ाव पर
महा समुद्र से महासंगम
बिलकुल तुम्हारी तरह !!!

हे ईश्वर !!
मेरा और नदी का सफ़र
शाश्वत और सार्थक  !!


Monday, November 30, 2015

प्रेम के वैज्ञानिक लक्षण



जड़त्व के नियम के अनुसार ही, वो रुकी थी, थमी थी,
निहार रही थी, बस स्टैंड के चारो और
था शायद इन्तजार बस का या किसी और का तो नहीं ?

जो भी हो,  बस आयी,  रुकी, फिर चली गयी
पर वो रुकी रही ... स्थिर !
यानि उसका अवस्था परिवर्तन हुआ नहीं !!

तभी, एकदम से सर्रर्र से रुकी बाइक
न्यूटन के गति के प्रथम नियम का हुआ असर
वो, बाइक पर चढ़ी, चालक के कमर में थी बाहें
और फिर दो मुस्कुराते शख्सियत फुर्र फुर्र !!

प्यार व आकर्षण का मिश्रित बल
होता है गजब के शक्तिसे भरपूर
इसलिए, दो विपरीत लिंगी मानवीय पिंड के बीच का संवेग परिवर्तन का  दर
होता  है, समानुपाती उस प्यार के जो  दोनों  के  बीच पनपता  है
प्यार की परकाष्ठा  क्या न करवाए !!
न्यूटन गति का द्वितीय नियम, प्यार पर भारी !!

प्रत्येक क्रिया के  बराबर और  विपरीत प्रतिक्रिया
तभी तो
मिलती नजरें, या बंद आँखों में सपनों का आकर्षण
दुसरे सुबह को फिर से करीबी के अहसास के साथ
पींगे बढाता प्यार
न्यूटन के तृतीय नियम के सार्थकता के साथ  !!

गति नियम के
एक - दो - तीन  करते  हुए  प्यार  की प्रगाढ़ता
जिंदगी में समाहित होती हुई
उत्प्लावित होता सम्बन्ध
विश्थापित होते प्यार की तरलता के बराबर !!

जीने लगते है आर्कीमिडिज के सिद्धांत के साथ
दो व्यक्ति
एक लड़का - एक लड़की !!



Thursday, November 19, 2015

दिवाली के दुसरे दिन

दिवाली के दुसरे दिन प्रदूषित आसमान

दिवाली  के दूसरे दिन की सुबह
अजीब सी निरुत्साहित करने वाली सुबह
चमकती रात के बाद बुझे-बुझे सूर्य के साथ
कुछ नहीं बुझी लड़ियों की दिखती ख़ामोशी
बुझ चुके दीपक,  और पिघली मोमबत्तियां
बिना चमक के हो चुकी होती है सुबह !!

चारो और फैले पटाखों के अवशिष्ट
रद्दी, चिन्दी चिन्दी हुए कागज़,
मिठाई के खाली  डब्बे
काले कार्बन से बनते बिगड़ते सांप
जो किसी बच्चे ने देर रात जला कर
फैलाया था प्रदूषण का भभका
लग रहा था डंसेगा, फैला रखा था फन !

ऊबता हुआ दिल, थका हुआ मन
मुंदी मुंदी आँखों से, जलते प्रदूषण के आसमान  में
ऊँघते चेहरे के साथ झांकता बालकनी से मैं
देखता दीवाली के दूसरे दिन अजीब सी सुबह !

कुछ छोटे छोटे बच्चे
ढूंढ रहे थे कूड़े में
तभी इस उदास सुबह  में दिखा मुझे
एक चंचल प्यारी सी मुस्कराहट
चहक कर चिल्लाया, अपने साथ वाले को उसने बुलाया
देख भाई - बम !
नहीं है इसमें पलीता, पर फूटने से बचा रह गया न !

सच में कुछ खुशियाँ बिना पलीते के पटाखे सी
मुस्कराहट भरती है
हाँ फिर जब वो बच्चा उसको फोड़ने की जुगत लगाएगा
तो वो हो जाएगी फुस्स !!

माँ लक्ष्मी को भी शायद नहीं लगता मनभावन
तभी तो ऐसे बच्चे के बीने-चुने हुए पटाखे भी
नहीं करते आवाज !!

काश बेशक दिवाली के दिन नहीं बिखरी खुशियाँ
हर जगह
पर काश !!
कुछ तो फैले ख़ुशी, हर नन्हे के मन में
अमीरी गरीबी से इतर !!

माँ !! या देवी सर्व भूतेषु !!
बस पटाखे की आवाज गौण कर, सिर्फ खुशियाँ की आवाजें भर दो
हर नन्हों के मन !!

इतनी सी उम्मीद !!

दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल 2015 के लिए चयनित मेरी कविता 

Sunday, November 1, 2015

सुनो!


सुनो !
ये सम्बोधन नही है
इसके या उसके लिए
समझ रहे न तुम !
ओ हेल्लो !!

तो सुनो न
सुन भी रहे हो
या सुनने का बस नाटक!

सुनो !
बेशक करो नाटक
या फिर
रचते रहो स्वांग!!

तुम्हारा
ये स्वांग ही
है बहुत
हम जैसे हारे हुए लोगो का
सम्पूर्ण सम्बल !!

तो बस !!
बेशक तुम मत करना पूरा
मत मानना
मेरी कोई भी बात !

पर मेरे
हर 'सुनो' सम्बोधन का
ध्यान मग्न हो
सुनने का स्वांग
तो रच ही सकते हो
है ना!

सुनो
सुन रहे हो न गिरिधर !!
बड़े नाटकबाज हो यार !!
------------------
सुनो न !!!


Sunday, October 25, 2015

पहला प्रेम



पहला प्रेम
जिंदगी की पहली फुलपैंट जैसा
पापा की पुरानी पेंट को
करवा कर आल्टर  पहना था पहली बार !
फीलिंग आई थी युवा वाली
तभी तो, धड़का था दिल पहली बार !

जब जीव विज्ञान के चैप्टर में
मैडम , उचक कर चॉक से
बना रही थी ब्लैक बोर्ड पर
संरचना देह की !
माफ़ करना,
उनकी हरी पार वाली सिल्क साडी से
निहार रही थी अनावृत कमर,
पल्लू ढलकने से दिखी थी पहली बार!!

देह का आकर्षण
मेरी देह के अंदर
जन्मा-पनपा था पहली बार
हो गया था रोमांचित
जब अँगुलियों का स्पर्श
कलम के माध्यम से हुआ था अँगुलियों से
नजरें जमीं थी उनके चेहरे पर
कहा था उन्होंने, हौले से
गुड! समझ गए चैप्टर अच्छे से !

मेरा पहला सपना
जिसने किया आह्लादित
तब भी थी वही टीचर
पढ़ा रही थी, बता रही थी
माइटोकॉंड्रिया होता है उर्जागृह
हमारी कोशिकाओं का
मैंने कहा धीरे से
मेरे उत्तकों में भरती हो ऊर्जा आप
और, नींद टूट गयी छमक से!!

पहली बार दिल भी तोडा उन्होंने
जब उसी क्लास में
चली थी छड़ी - सड़ाक से
होमवर्क न कर पाने की वजह से
उफ़! मैडम तार-तार हो गया था
छुटकू सा दिल, पहली बार
दिल के अलिंद-निलय सब रोये थे पहली बार
सुबक सुबक कर!
जबकि मैया से तो हर दिन खाता था मार !

मेरे पहले प्रेम का
वो समयांतराल
एक वर्ष ग्यारह महीने तीन दिन
नहीं मारी छुट्टियां एक भी दिन!!

वो पहला प्रेम
पहली फुलपैंट
पहली प्रेमिका
खो चुके गाँव के पगडंडियों पर
हाँ, जब इस बार पहुंचा उन्ही सड़कों पर
कौंध रही थी जब बचकानी आदत! सब कुछ
मन की उड़ान ले रही थी सांस
धड़क कर !!
--------------
कन्फेशन जिंदगी के ....


(ये कविता प्रतिलिपि के ऑनलाइन साईट पर प्रतिलिपि कविता सम्मान के लिए चयनित हुई है, पहला प्रेम (मुकेश कुमार सिन्हा) इस लिंक पर जाकर लाइक/कमेंट/रेटिंग/शेयर करें, .........इन्तजार रहेगा !!