जिंदगी की राहें

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Tuesday, March 16, 2010

~अख़बार~







दिन था रविवार,
सुबह की अलसाई नींद
ऊपर से श्रीमती जी की चीत्कार...
देर से ही सही, नींद का किया बहिष्कार
फिर, चाय की चुस्की, साथ में अख़बार
आंखे जम गई दो शीर्षक पर
"दिल्ली की दौड़ती सड़क पर, कार में बलात्कार"
"सचिन! तेरा बैट कब तक दिखायेगा चमत्कार"
.

सचिन के बल्ले के चौके-छक्के की फुहार
हुआ खुशियों का मंद इजहार
दिल चिहुंका! हुआ बाग-बाग! चिल्लाया॥
सचिन! तू दिखाते रह ऐसा ही चमत्कार
कर बार-बार! हजारो बार......
.
तदपुरांत, धीरे धीरे पलटने लगा अखबार
पर, तुरंत ही आँखें और उँगलियों ने किया मजबूर
आँखे फिर से उसी शीर्षक पर जा कर हो गयी स्थिर
एक दृश्य बिना किसी टेक-रिटेक के गयी सामने से गुजर
सोच भी गयी थम!
आँखे हो गयी नम!!
.
उसी दिल से, वहीँ से, उसी समय
एक और बिना सोचे, समझे, हुआ हुंकार
क्या ये भी होगा बार-बार!! हजारो बार॥
क्या ऐसे ही महिलाओं की इज्जत होगी तार-तार.....
.
.
आखिर कब तक...........!!!!!!!!!!!!!!!


Thursday, February 4, 2010

~ लाइफ इन मेट्रो ~

कल की ही तो बात थी,
इस बड़े मानव जंगल में
सूर्यास्त के समय
रोड़े पत्थर के जंगलो के
बीच चलता जा रह था
एक आम जानवर की तरह
अपनी मांद की ऑर!!
.
तभी चौंका!
रस्ते में पड़ी थी
मेरे जैसे एक जानवर की "लाश"!!
घेर रखा था बहुतो ने........
शायद किसी अत्याचारी शिकारी ने
कर दिया था शिकार!
हो गया था बेचारा ढेर,
खून से लथ-पथ
निस्तेज, निर्विकार!!
.
उफ़!! चारो ऑर था!
कलरव, कोलाहल! मचा हुआ
परन्तु जो थे उसके चारो ऑर
वो भी थे तो जानवर ही
क्योंकि चिल्ला रहे थे
चीख रहे थे
पर, फिर खिसक रहे थे, चुपचाप..
जैसे वो ऐसे हादसे से थे बिलकुल अनभिज्ञ .......
.
मैं भी रुका,
हुआ स्तंभित!!
एक टीस सी उठी मन में!
अन्दर से एक हलकी सी आवाज आई --
"भगवन! इसकी आत्मा को शांति देना!"
लेकिन फिर! मैं भी
बढ़ गया आगे, धीरे से
आखिर मैं भी तो हूँ
इसी मानव जंगल का हिस्सा
भावना- शून्य !!
"एक जानवर"....................!!
.

Wednesday, February 3, 2010

विमोचन: अनमोल संचयन!!





३१ जनवरी २०१० को विश्वा पुस्तक मेला, प्रगति मैदान, दिल्ली में हिंदी युग्म दोग कॉम के तत्वाधान में इस पुस्तक "अनमोल संचयन" का विमोचन पद्म श्री बल स्वरुप राही के द्वारा हुआ, प्रशिध कवि, चित्रकार श्री इमरोज भी उपस्थित थे........इस पुस्तक को शर्मी मति रश्मि प्रभा ने सम्पादित किया और श्री मति प्रीती मेहता ने इसके कवर को डिज़ाइन किया है! इस पुस्तक में मेरी एक कविता भी शामिल थी..............."प्यार,प्यार और प्यार!"

Monday, November 30, 2009

~: फासला :~


दूरियां
हर एक से बना कर रखिये
अपनों के दरमियाँ भी
थोड़ा फासला तो रखिए
दोस्त या दुश्मन
की परख तो रखिये
दिल की किताब में
हर एक का हिसाब तो रखिये
.
जिंदगी
में है कई रंज-औ-गम
पर कुछ गमो को
हमराज बना कर तो रखिये
दोस्ती है
तो गुफ्त-गु और दिल-ऐ-बयां भी कीजिये
मगर
कुछ तो पर्दा भी रखिये
दिल है तो
गमो का बादल भी होगा
पर खुशियों के बरसात की उम्मीद
बरसा कर के तो रखिये
फिर कह रहा हूँ
दूरियां
हर एक से बना कर रखिये
अपनों के दरमियाँ भी
थोड़ा फासला तो रखिए
~मुकेश~



Monday, February 9, 2009

Friday, July 18, 2008

!!~:मकान:~!!


मुहब्बत की खुशबु से जब महक उठता है
ईंट गारे से बना मकान!
तो बन जाता है प्यार का घरोंदा
चहक उठता है मकान!
जब इस घरोंदे में
दो दिलो के प्यार की निशानी
खिलता है एक नन्हा सा फूल
तो स्वर्ग मैं तब्दील हो जाता है यह मकान!

पर इतना आसान होता नहीं
मुहब्बत का हसीं जहाँ बसाना
इसकी खातिर,
मुहब्बत के एहसास
और रिश्तो की महक से होता है सींचना
तब जाकर बनता है स्वर्ग जैसा मकान!

फिर, मकान के आँगन में,
खिलता है रिश्तो का फुल
जिसके प्यार की खुशबु
रहती है ता-उम्र बरक़रार
इस खुबसूरत सफ़र में
माँ बनाने की जिम्मेदारी पाता है मकान!

एक अटूट और अनोखा रिश्ता होता है
जब शिशु की जन्म का साथ
जन्म होता है एक नयी माँ का
और इस जन्म का साथ
माँ का हर पल हो जाता है संतान का नाम
साथ ही शिशु की किलकारी से
जगमगा उठता है मकान!

फिर वो दिन आता है
जब प्रकाश व फूलो से सज उठता है मकान
क्योंकि वह शिशु हो गया है जवान
है घोडी पर चढ़ने को तैयार
माँ के ह्रदय को पुलकित देख
अंगराई लेता है मकान!
.
इस नश्वर जीवन मैं क्या रखा है
बहुत किया, बहुत कुछ उम्मीद रह गयी
मृत्यु सैया पर पड़ी है माँ
बेटे को अंतिम समय मैं निहारने के लिए
थक गयी है माँ की अंखिया
पर रो भी तो नहीं सकता है मकान!
माँ की अनुभूति को देख तड़प रहा है मकान!!
.

Wednesday, July 2, 2008

प्यार, प्यार और प्यार!!!!


न आसमान को मुट्ठी में,

कैद करने की थी ख्वाइश,

और न, चाँद-तारे तोड़ने की चाहत!

कोशिश थी तो बस,

इतना तो पता चले की,

क्या है?

अपने अहसास की ताकत!!


इतना था अरमान!

की गुमनामी की अँधेरे मैं,

प्यार के सागर मैं,

ढूँढूँ अपनी पहचान!!

इसी सोच के साथ,

मैंने निहारा आसमान!!!


और खोला मन को द्वार!

ताकि कुछ लिख पाऊं,

आखिर क्या है?

ढाई आखर प्यार!!

पर बिखर जाते हैं,

कभी शब्द तो कभी,

मन को पतवार!!!

रह जाती है,

कलम की मुट्ठी खाली हरबार!!!!


फिर आया याद,

खुला मन को द्वार!

कि किया नहीं जाता प्यार!!

सिर्फ जिया जाता है प्यार!!!

किसी के नाम के साथ,

किसी कि नाम के खातिर!

प्यार, प्यार और प्यार!!!!