जिंदगी की राहें

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Thursday, June 17, 2010

"समय"


"समय"
जिसमे है सिर्फ तीन अक्षर
जो है एक छोटा सा शब्द मात्र
लेकिन है इसमें समाहित
अति विशाल शक्तियों को
समेटे रखने वाला पात्र
जड़ जगत के जीव सर्वत्र
नाचते हैं, गाते हैं...
इसके धुरी पर हो कर एकत्र.........!!!

इसके गति के साथ
जिसने भी बैठाया ताल-मेल
सफलता की बुलंदियों पर
पहुंचा बन कर सुपर मेल
परन्तु, हम जैसे साधारण लोगो की सोच..!
हमारे लिए तो ये वही है
पसेंजेर, वही रलेम-पेल!!!!!!!!!!




Monday, June 7, 2010

काली रात


वो काली और गाढ़ी रात
पर नींद नहीं आँखों में ........
कड़कते काले बादल
 इस सुनसान गगन में.........
इठला कर चमक रही है बिजली
जैसे आग लगने वाली हो तन मन में..........
सो रहे हैं सब
लेकिन इस ख़ामोशी में भी
कोलाहहल सा हो रह है मन में.......
किसपे चिल्लाऊं
किसको बुलाऊं
इस सूनेपन में........
सितारे भी तो नजर
नहीं आते इस गगन में.........
क्या यही है जिंदगी
ऐसे ही कुछ सवाल
उठ रहें हैं मन में
कौंध रहे हैं मन में............



Monday, May 31, 2010

सड़क पे बचपन

तपती गर्मी
दौड़ती सड़क
भागती मेरी
कार एकाएक सिग्नल हुआ लाल
चर्र्र्रर.......... ब्रेक
थम गयी कार
जेब्रा क्रोशिंग से ठीक पहले......!!
.
"सारे सपने कहीं खो गए,
हाय ! हम क्या से क्या हो गए...."
सुरीली गमगीन आवाज
में था खोया
तभी था कोई जो
खिड़की पर हाथ हिलाते हुए चिल्लाया
"बाबूजी! ले लो
ये नीली चमकीली कलम"
नहीं!!! - मैंने कहा!
.
झुलसती गर्मी में
था वो फटेहाल
उम्र...?????
शायद आठ साल,
लेकिन फिर भी
तपती गर्मी में कांपती आवाज
"बाबूजी! ले लो न"
"एक के साथ, एक मुफ्त है!!"
ओह! रहने दे यार!!
क्यूं करता है बेहाल॥
.
मुफ्त! मुफ्त!! मुफ्त!!!
इस छोटे से शब्द में
मुझे दिखी एक चमक!!
वो छोरा जा ही रहा था
चिल्लाया मैं
दिखा जल्दी
सिग्नल होने वाली है!
और फिर उसे पकडाया
दस का नोट
थी मेरे हाथों में दो कलम!!
.
सिग्नल हुई हरी
गियर बदली
निकल गया सर्रर्रर!!
पर उस छोटे से वक़्त का
किया मैंने आत्म-मंथन!!!!!!
उस छोटे बच्चे की बचपनसे बड़ा
क्यूं दिखा "मुफ्त" का लालच
क्यूं नहीं दिखी
उस गरम तपिश
में, उसके जीने की कोशिश..........
क्यूं नहीं दिखी..............................








Friday, May 28, 2010

ब्लोगोत्सव 2010





















ब्लोगोत्सव २०१० के पर रश्मि दी के निर्देशन के कारण मेरी एक कविता "कन्वेस" http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7945.html


और "MALL CULTURE" पे मेरा एक आलेख


उपरोक्त साईट पे प्रकाशित हुई...आप सबो से अनुरोध है , कृपया एक बार जरुर है उत्सव वर्धन के लिए वहां पहुचें..........:)

धन्यवाद्!!













Monday, May 17, 2010

खुले आँखों से देखा सपना!





खुले आँखों से देखा है मैंने सपना
जो था बहुत सुहाना......
.
माना अपने चालीसवें बसंत में कदम रख चुका हूँ
पर उस दिन
जब टीवी के परदे पर
दिखा थिरकता सैफ
और उसके बाँहों
हसीन कटरीना कैफ
तो मेरी मटर सी आँखे हो गयी स्थिर!!
.
पहले तो परदे पे चेहरा झिलमिलाया
फिर आँखे बौरायीं
हो गया चमत्कार
दिख रह था मेरा हमशक्ल
ख़्वाबों सा मस्त, कड़क, जवान!!......:)
.
ओंठो पे तैर उठी मुस्कान
आँखें चमकीं मटक के
दिल...."वो तो बच्चा है जी"
की तर्ज़ पर हो गया नादान!!
.
इस सुहाने सपने में ही
था पूरा डूबा
की एक आवाज ने
कर दी तन्द्रा भंग..........
"पापा!!!!!!!!!!
साईकल में हवा भरवा दो........!!"
हकीकत का झटका दिया!
.
उफ़!
खुले आँखों से देखा था जो सपना
जो था सुहाना......
पर ... सब हुआ बेगाना ! !!







Monday, April 26, 2010

कैनवस



एकांत में बैठे-बैठे सोचा
काश! मैं होता ऐसा चित्रकार
कि हाथ में होती तक़दीर की ब्रश
और सामने होती, एक ऐसी कैनवस
जो होती खुद की ज़िन्दगी
जिसमें मैं रंग पाता अपनी चाहत
भर पाता वो कुछ खास रंग,
जो होते मेरे सपने, होते जो बेहद अपने

जरूरत होती कुछ चटक रंगों की
लाल, पीले, हरे, नारंगी
या सुर्ख सुफैद व आसमानी
जैसे शांत सौम्य रंग
ताकि मेरे तक़दीर की ब्रश
सजा पाए ज़िन्दगी को
जहाँ से झलके बहुत सारी खुशियाँ
सिर्फ खुशियाँ !!

तभी किसी ने दिलाया याद
इन चटक और सौम्य रंगों के मिश्रण में
है एक और रंग की जरूरत
जिसे कहते हैं "स्याह काला"
जो है रूप अंधकार का
जो देता है विरोधाभास
ताकि जिंदगी में हो सब-सब
मलिन, निराशाजनक, अंधेरा, विषादपूर्ण

तब आया समझ
जब तक दुःख न होगा
दर्द न होगा
नहीं भोग पाएंगे सुख
अहसास न हो पायेगा ख़ुशी का
और इस तरह
मैंने अपने सोच को समझाया
अब हूँ मैं खुश, प्रफुल्लित
अपनी ज़िन्दगी से
अपने इस रंगीन कैनवस से

जिसमें भरे है मैंने सारे रंग
दुःख के भी
दर्द के भी
साथ में सहेजे हैं,
खुशियों के कुछ बेहतरीन पल..............!!!


Wednesday, March 31, 2010

वो बचपन!!!



जाड़े की शाम
धुल धूसरित मैदान
बगल की खेत से
गेहूं के बालियों की सुगंध
और मेरे शरीर से निकलता दुर्गन्ध !
तीन दिनों से
मैंने नहीं किया था स्नान
ऐसा था बचपन महान !
.
दादी की लाड़
दादा का प्यार
माँ से जरुरत के लिए तकरार
पढाई के लिए पापा-चाचा की मार
खेलने के दौरान दोस्तों का झापड़
सर "जी" की छड़ी की बौछाड़
क्यूं नहीं भूल पाता वो बचपन!!
.
घर से स्कूल जाना
बस्ता संभालना
दूसरे हाथों से
निक्कर को ऊपर खींचे रहना
नाक कभी कभी रहती बहती
जैसे कहती, जाओ, मैं नहीं चुप रहती
फिर भी मैया कहती थी
मेरा राजा बेटा सबसे प्यारा ..
प्यारा था वो बचपन सलोना !
.
स्कूल का क्लास
मैडम के आने से पहले
मैं मस्ती में कर रह था अट्टहास
मैडम ने जैसे ही मुझसे कुछ पूछा
रुक गयी सांस
फिर भी उन दिनों की रुकी साँसें ,
देती हैं आज भी खुबसूरत अहसास !
वो बचपन!!
.
स्कूल की छुट्टी के समय की घंटी की टन टन
बस्ते के साथ
दौड़ना , उछलना ...
याद है, कैसे कैसे चंचल छिछोड़े
हरकत करता था बाल मन
सबके मन में
एक खास जगह बनाने की आस लिए
दावं, पेंच खेलता था बचपन
हाय वो बचपन!!
.
वो चंचल शरारतें
चंदामामा की लोरी
दूध की कटोरी
मिश्री की चोरी !
आज भी बहुत सुकून देता है
वो बचपन की यादें
वो यादगार बचपन!!!!!!

.