जिंदगी की राहें

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Wednesday, August 19, 2020

स्वरों को मिला सुर


उम्मीदों की बात कहूँ तो

कभी लगा था, वो
'ह्रस्व उ' की तरह घूम फिर कर लौटेगी
पर 'दीर्घ उ' की सरंचना सरीखी
एक बार जो मोड़ से घूमी
दूर तक चली गयी

'ए-कार' सा रह गया अकेला
पर 'ऐ-कार' बनने की उम्मीद में
ताकता रहा हर समय एक आंख से 'चन्द्रबिन्दु' जैसा
किंतु परन्तु के सिक्के को उछाले
दरवज्जे से तिरछी हो, झांकी ऐसे, जैसे हो
'अ:' की तरह, दुपट्टा से खुद को छिपाए

बस, बेशक दरवाजा था बन्द 'ह्रस्व इ' सा
पर आ कार सा खुला, 'अ' आया और
'दीर्घ इ' की तरह अंदर से बहते प्रेम संग बन्द हो गया

जिंदगी फंसी रही 'ऋ' जैसे दुविधाओं में
पलटती तो कभी खोलती रही
पर अंततः 'ओ-कार' के झंडे में
आना ही पड़ा 'औ-कार' की तरह उसको भी।

इस तरह, स्वरों को मिल ही गया सुर।

~मुकेश~ #poetryonpaper