जिंदगी की राहें

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Thursday, October 13, 2016

उम्मीदों का संसार



"लो मीडियम इनकम ग्रुप" के लोग
मतलब इतनी सी आमदनी
कि, बस पेट ही भर सके
पर है, चाहत यह भी कि
रख सके एकाध निवाले शेष
अगले सुबह तक के लिए


हो घर की दीवारों पर
मटमैली सी रौशनी
लेकिन दरवाजे पर झीने परदे के टंगने के लिए
कर रहे इन्तजार
अगले दीपावली पर बोनस का

बहुत सोच-समझ कर
जलाये हैप्पी बर्थडे का कैंडल
पर, केक व दो पारले जी के बिस्किट के साथ
रहे उम्मीद
आने वाले गिफ्ट का

ऑफिस में हर दिन
बेशक खाएं डांट
और, पा जाएँ कामचोरी का तमगा
पर,
रौब दिखाएँ अपनी सरमायेदारी का
कॉलर खड़ी रहने की चाहत के साथ

फेयर एंड लवली का छोटा पैकेट
पोंड्स पाउडर का इकोनोमी डब्बा
व गुच्ची के नकली बैग के सहारे
कोशिश हो मिले
पत्नी की सूखती मुस्कराहट का
और हो चाहत, पार्टी में
इतरायें पत्नी को 'मैडम' बना पाने के गुमान पर

गृह प्रवेश की
कुंठित इच्छाओं की पूर्ति के लिए
किराए के मकान में
लगा लें नेम प्लेट
"श्री" के संबोधन के साथ

बेशक बैंक की पासबुक में
हो निल बटा सन्नाटा
पर अपडेट करवाएं पन्ना
हर महीने

मने
हम
लो मीडियम इनकम ग्रुप के लोग
रचते हैं उम्मीदों का संसार
हर दिन देखते हैं सपनों का बाजार
छलछलाती नज़रों के साथ ......!
"उम्मीद" शब्दों को पकड़े हुए
खिलखिलाए भी राशन के साथ ।

~मुकेश~
100कदम: एक प्रतिभागी रचनाकार के साथ 

Thursday, February 18, 2016

प्रेम खिड़की-दरवाजे का


घर के
कुछ दरवाजे और
कुछ से थोड़ी ज्यादा खिड़कियाँ
शायद आपस में कर रहे थे संवाद !!
शायद डेट पर जाने की कवायद या फिर कोई
उच्च स्तरीय बैठक, घर की सुरक्षा पर !!

दरवाजे पर लटका, पूरा कवर करता मटमैला पर्दा
जैसे दरवाजे ने पहन रखा हो स्वीपर का एक रंग का ड्रेस
वहीँ खिड़कियाँ दिख रही थी सजीली स्वप्नीली
एक लम्बा गाउन सा पर्दा,चमकीले कपडे का
लगी थी लम्बी चमकती डोरी भी ...
साथ में आधी खिड़की तक सफ़ेद शिफॉन का पर्दा
जैसे पहना हो उसने स्कर्ट !!

खिड़कियाँ मचल रही था,
शायद हवा चली थी, शायद उसकी चुनरी बलखाई थी
खिडकी के पल्लों ने बाहें फैलाई थी
दरवाजे पर चिटखनी चढ़ी थी
बेचारा बंद छटपटा रहा था
उसके पल्ले ऐसे बंद थे जैसे
बेचारा किवाड़ दोनों बाहों को भींच कर
खिड़की पर चिड़चिड़ाया था

पल भर में शायद कोई हुई वजह
दरवाजे का पल्ला चरमराया
खुल गया किवाड़,
उसका भी पर्दा ऐसे बलखाया
जैसे एक मर्द ने
शर्ट के बटन को खोल अपनी मर्दाना छाती दिखाई

देख कर किवाड़ को, खिड़की मुस्काई
उसके जान में जान आयी
प्रेम सिक्त उसकी बाहें फ़ैली
तभी बाहर से बहार की  फुहारें भी छिटकी
एक घर के अन्दर खिड़की दरवाजे
दोनों की मुस्की,
जैसे लैला मजनू को देख चिहुंकी !!

रात हो चुकी थी,
खिड़कियाँ और दरवाजे दोनों बंद थे,
सुखद सपने में सोये थे, भोर के सूरज के साथ
फिर बाहें फैलाने का वादा कर परदे में लिपटे थे
ये है न .....
खिड़की दरवाजे का ये अद्भुत प्यार
चमक रहा था घर संसार !!
________________________
:)


Saturday, November 15, 2014

खुली आँखों से देखा सपना


मेरे कुछ ज्यादा चलते दिमाग ने
एक दिन, लगाई घोड़े सी दौड़
होगा एक दिन
स्वयं का ख़्वाबों सा घर
खुद के मेहनत के पैसों से
ख़रीदे हुए ईंट, रेत व सीमेंट का !
आभासी, ह्रदय के आईने में
देखा, उसमें कहाँ होगा दरवाजा
कहाँ होगी खिड़कियाँ, रौशनदान भी
गमले रखूँगा कहाँ
ये भी पता था मुझे !!

घर के लॉन में
हरे दूब पर नंगे पाँव चलते हुए
कैसे ओस के बूँद की ठंडक
देगी सुकून भरा अहसास
और तभी, एक गिलहरी पैरों के पास से
गुजर जायेगी
इस्स !! ऐसा कुछ सोचा !

उस आभासी घर के
डाइनिंग टेबल पर बैठ कर
चाय की सिप लेते हुए
खिड़की से दिखते दरख्तों के ठीक पीछे
दूर झिलमिलाती झील के कोने पर
बैठी सफ़ेद फ्लेमिंगो, एक टांग उठाये
कौन न खो जाए उसके खूबसूरती में
आखिर वो मेरे से ही मिलने तो आएगी
माइग्रेट कर के, बोलीविया के तटों से !!

मुझे पता नहीं और क्या क्या सोचा
जैसे बालकनी में
मनीप्लांट के गमले के
हरे पत्ते पर हल्का सफ़ेद कलर
मैं भी उस पत्ते को प्यार से थपकी देते हुए
महसूस रहा था
छमक कर आ रही
बारिश की बूंदों को !!

बहुत सोचने से अच्छी नींद आती है न
फिर ख़्वाबों में खोना या बुनना किसको बुरा लगे
पर, ये प्यारा सा ख़्वाब
फिर, नींद टूटते ही
- पापा!! स्कूल फीस !! आज नहीं दिए, तो फाइन लगेगा !!
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जिंदगी में कितने सारी उम्मीदें, सोच जवान होती रहती है ....... है न !!