जिंदगी की राहें

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Thursday, November 18, 2010

प्रेम का स्वरुप


जिंदगी बदली
बदली सोच
बदला सम्बन्ध और उसका मूल्य
तभी तो
मन के अन्दर
झंकृत करने वाला
बदला वीणा का राग
पर क्या बदल सकता है
प्रेम या प्यार?
बदल सकता है
उससे जुडी
खुशियाँ अपार?


लेकिन कहना होगा
वो भी बदला...
बदल गयी
प्रेम के लिए
जीने मरने की कसमें
बदला प्रेम से प्रस्फुटित होता
त्याग, प्रतीक्षा, वायदा !!
यथार्थ की धरातल
पर आ पहुंचा प्यार
सपनो की दुनिया बदलकर
दिखने लगी
स्वभिव्कता
दिखने लगा
प्यार के पार की जिंदगी..

अब दैहिक सौंदर्य
और बिताये गए
अन्तरंग क्षण
बदल देते हैं
रूप प्रियतमा का
इसलिए लगता है
बदल गया है
प्रेम का स्वरुप !!

पहले बनते थे
प्यार में ताजमहल
पर बदल गए
वो प्रेम समीकरण..
पहले की तरह
नहीं होता कोई मजनू या राँझा
अब तो कहते हैं
लैला या हीर नहीं तो
कोई और ही आजा...

यहाँ तक की
सांसे भी महसूस करने लगी
सच्चाई
की कोई नहीं
वो नहीं तो कोई और सही..
सच में कितना बदल गया है
प्यार!!
प्यार ही है न.......!!

Wednesday, October 27, 2010

महीने की पहली तारिख


एक आम नौकरी पेशा

व्यक्ति के आँखों की चमक

है लहराती

जब आ जाती

महीने की पहली तारिख

होता है

हाथो में पूरा वेतन

परन्तु फिर भी

होती है

एक चुनौती

क्योंकि बीत चुके

फाके के दिन

और

अनदेखे भविष्य का सामना

हर महीने

का हर पहला दिन

दिखता है एक साथ

रहती है उम्मीद

बदलेगा दिन

बदलेगा समय

दोपहर की धुप हो पायेगी नरम

ठंडी गुनगुनाती हो पायेगी शाम

सुबह का सूरज

निकलेगा एक अलग अहसास के साथ

पर,

पता नहीं क्यूं

हर महीने

हर उस दिन

हर बार

कुछ नहीं बदलता

नहीं बदलती है

मुश्किलें

नहीं बदलती है

कमियां

बदलती है

तो जरूरतें

बदलती है

तो फरमाइश

बदलती है

तो एक और

नए महीने की

पहली तारिख

एक और तारिख.............!



Sunday, September 19, 2010

~:: पल ::~

कैप्शन जोड़ें
















पल

बीते हुए पल

गुजरे हुए पल

मीठे पल

दर्द भरे पल

आनंददायक पल

आह्लादित पल

उल्लासित पल

अनमोल पल

कसकदार पल

जज्बाती पल

लहूलुहान पल

खुनी पल

यादगार पल

उत्तेजित पल

उन्मादित पल

रोमांचकारी पल

रुआंसे पल

शांत पल

ठसकदार पल

आह भरते पल

बेशकीमती पल

जिंदगी के ये सारे पल!!



और इन पलो की

गुंथी हुई माला

बन जाती है स्मृतियां

यादगार स्मृतियाँ

अगर सहेज कर रखो

तो बन जाती है.......

जीने की आधार स्मृतियाँ .......


उपरोक्त पंक्तियाँ मैंने बस ऐसे ही सोचा और कागज में उतार दिया. फिर अपने एक मित्र ब्लॉगर "श्रीमती नीलम  पूरी" को बताया तो उन्होंने कुछ मिनटों में इन पंक्तियों को एक सशक्त कविता में रूपांतरित कर दिया........! वैसे सच कहूँ तो उन्होंने एक तरह से मेरी पंक्तियों पे रोड रोलर ही चलाया है, लेकिन उनका कुछ मिनटों का प्रयास अच्छा लगा, इसलिए उसको नीचे लिख रहा हूँ......:


पल

जो बीत गए कल

जो कुछ मीठे कुछ खट्टे पल

वो कसक भरे, दर्द भरे पल

कुछ आनंद दायक कुछ आह्लादित पल

कुछ कसक से भरे हुए पल

कुछ बहा ले गए जज्बाती पल

कुछ लहूलुहान करते पल

कुछ खुनी खंजर से दिल में उतारते पल

वो प्रीत के यादगार पल

जो कर गए थे उत्तेजित वो पल

उन्मादित पल

कुछ कर गए रुआंसे से

कुछ रह गए बचे हुए शांत पल

कुछ ठसकदार पल

और बाकि आह भरते हुए पल

फिर भी बेशकीमती पल

जिंदगी के ये सारे पल

जो बन गयी मेरी यादो के

कुछ दर्द भरे कुछ हसीन पल

कुछ कर गए उल्लासित वो बीते हुए पल

कुछ खुनी खंजर से दिल में उतारते हुए पल



और इन पलो की

गुंथी हुई माला

बन जाती है स्मृतियां

यादगार स्मृतियाँ

अगर सहेज कर रखो

तो बन जाती है.......

जीने की आधार स्मृतियाँ .......


Saturday, September 4, 2010

राखी की चमक

 (दीदी, जीजाजी, उनकी तीन बेटियां और मेरे दो बेटे) 

वैसे तो आज मेरा जन्मदिन है..........:),
लेकिन मैं आज किसी और वजह से यहाँ ब्लॉग पे हूँ. पिछले दिनों 29.08.2010 को आधी रात में  मेरी प्यारी बड़ी दीदी ने मेरे सामने अस्पताल में दम तोड़ दिया..वो बहन जो मेरे से सिर्फ ३ वर्ष बड़ी थी.......वो जो मेरे लिए एक अच्छी दोस्त जैसी थी, जिसके साथ पूरा बचपन बिताया, खेले, पढ़े, मार-पीट की. वो उस दिन बिना बताये चली  गयी , और मैं कुछ नहीं कर पाया...जिंदगी में क्या क्या दिन देखने को मिलते हैं, ये उस दिन समझ में आया....जिस दीदी के लिए मैं समझता था, वो भाग्यशाली  है, हम जैसे माध्यम वर्गीय परिवार में जन्म लेने के बाबजूद उसके पति आज रांची उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसे पद पे हैं.........लेकिन ऊपर वाले को कुछ और मंजूर था.............अपने तीन कम उम्र की बेटियों को छोड़ कर पता नहीं कहा किस दुनिया में चली गयी........अब क्या कहूँ, भगवन उसकी आत्मा को शांति देना..........!!

कुछ पंक्तियाँ उसके लिए.............

आधी रात का वो पहर जो थी बहुत काली
अस्पताल का एक कमरा
जिसके बेड पर थी
मेरी वो दीदी
जिसने दो दिन पहले ही
उसी बेड पर बैठे हुए 
मेरी कलाई पे बंधी थी राखी
वो राखी जो दो दिन बाद तक 
चमकते हुए कह रही  थी
ऐ! दीदी के भैया 
कर कोशिश, बचा के रख 
उसकी जीवन नैया!!
तू है खैवैया!!!
पर वो मनहूस रात!!
जब मैं बैठा था सिराहने
सामने बेड के ऊपर लगा स्क्रीन
और उसकी आवाज
बता रही थी दीदी की वजूद
एक विश्वास - कुछ नहीं होगा!!

मैंने ली एक झपकी 
तो लगा दीदी ने दी थपकी
खोली आँख तो सामने दिखी
अश्रुपूरित नयन, जिसमे था दर्द
उफ़! आँखों में भी दिख 
सकता है दर्द
ये बस हो रहा था अनुभव
मैं हो रहा था सर्द!!
मैंने प्यार से किया स्पर्श 
"दीदी"! मैं हूँ न!!
"पागल हो क्या??"
बस एक की थी कोशिश
की दे सकूँ ढाढस !!!

पर होना था वही 
जो दिल चाहता था नहीं
एकाएक स्क्रीन के सारे
मीटर हो गए ग़ुम
मैंने खुली आँखों से 
उस मंजर को देखा
क्या कहूँ दिल चिहुंका..
चिल्लाया ...........दीदी..............!!!!!
लेकिन वो हो चुकी थी स्थिर
निस्तेज, शांत
जा चुकी थी चिर निद्रा में 

ऐसे लगा जैसे 
सब हैं खामोश
सारा अस्पताल खामोश
मैं भी एकदम से 
स्तंभित!! स्तब्ध!!
ऐ दीदी................!!!
पर मेरे कलाई की राखी
की चमक कह रही थी.........
पगले!! मैं हूँ तेरे साथ
कहाँ भागेगा मेरे से
विश्वास न हुआ,, पर उस माहौल में भी
मेरा चेहरा धीरे से मुस्कुराया था..........
पता नहीं क्या सच था.......
क्या जीवन है...........
क्या जीवन था..........

(मेरे दीदी के साथ अंतिम राखी.)

Saturday, August 21, 2010

बुढा वीर




सर सर चलती पछुआ हवा
अन्दर तक कांपती बूढी हड्डियाँ
ओंस से भींगी धोती
घुटनों तक लहराती होती
स्वाभिमान के मरुस्थल की आंच
जरा भी कम नहीं, थी जांवाज़!!

शरीर होने लगा था शिथिल
पर संकल्प पूर्ववत, एकदम जिंदादिल
हार, का शिकन जरा भी नहीं
दर्द, बेबसी, परेशानियाँ, हताशा!!
पर!! बूढी इच्छा शक्ति की विजय
लहरा रही थी पताका........

जवानी की आग को
सहेजा था ऐसा
की जीर्ण शीर्ण शरीर व 
आत्मा, अन्दर से बनी हुई थी वीर

तभी तो नन्हे बच्चे तीन
और उसकी माँ जो थी दीन
जो थी उसके शहीद बेटे की 
विधवा, जिसकी जिंदगी थी ग़मगीन
साथ ही, उस मरे बेटे की रोती बिलखती बुढिया माँ......
फिर पुरे कुनबे को संभाले
वो बुढा, जिसे हो रखा था "दमा"!!

बता रहा था.........
बेशक देश की रक्षा में
उसने गंवाया बेटा
लेकिन वो है सक्षम
दर्शा रहा था
अपनी देशभक्ति
क्योंकि था वो
शहीद परिवार का पोषक.........
क्योंकि वही था........अकेला

अतः अंत में देख कर
दिल ने कहा - जय हो! जय हो जवान!!
जो शहीद हुआ, हो गया देश पर कुर्बान!!
पर दिमाग कह रहा था........
जय हो! जय हो बुढा वीर...........
भगवन !!!! अगर तुम सच में हो
तो बदल दो उसकी तकदीर.........
बदल दो उसकी तकदीर..........





.

Thursday, August 5, 2010

सड़क!!!







काले कोलतार व
रोड़े पत्थर के मिश्रण से बनी सड़क
पता नहीं कहाँ से आयी
और कहाँ तक गयी
जगती आँखों से दिखे सपने की तरह
इसका भी ताना - बाना
ओर - छोर का कुछ पता नहीं

कभी सुखद और हसीन सपने की तरह
मिलती है ऐसी सड़क
जिससे पूरी यात्रा
चंद लम्हों में जाती है कट!
वहीँ! कुछ दु: स्वप्न की तरह
दिख जाती है सड़कें
उबड़-खाबड़! दुश्वारियां विकट!!
पता नहीं कब लगी आँख
और फिर गिर पड़े धराम!
या फिर इन्ही सड़कों पर
हो जाता है काम - तमाम!!

इस तरह कभी आसान
तो कभी मुश्किल दिखती सड़क
और उस पर मिलते हैं
उम्र जैसे मिलते हैं
"मील के पत्थर"
जो बीतते ही हो जाते हैं खामोश
लेकिन बोलती उनकी ख़ामोशी
और इस  ख़ामोशी में भी
कट जाता है पथिक का सफ़र
है न जिंदगी के हर पहलु
को उजागर करती सड़क!!!

Monday, July 26, 2010

तो तुम याद आती हो....


मेरे अत्यंत प्रिय और घनिष्ट मित्र "गणेश" के एक पुरानी डायरी के पन्नो से उतारी हुई..........

रात के लम्बे सफ़र में
जब में करवटें बदलता हूँ
तो तुम याद आती हो....

सुबह जब टहलने निकलता हूँ
और ठंडी हवा का कोमल स्पर्श होता है
तो तुम याद आती हो....

कॉलेज जाते समय
जब अकेला राहें नापता हूँ
तो तुम याद आती हो.......

क्लास के उस खाली समय में
जब खाली कुर्सियों के कतारों के बीच
अकेला बैठा होता हूँ
तो तुम याद आती हो....

हिंदी के पाठ्यक्रम में
जब विषय, प्रेम के गलियारे में रहता है
तो तुम याद आती हो....

साइकल से घर लौटते समय
जब उन राहों से गुजरता हूँ
जहाँ से तुम गुजरी थी
तो तुम याद आती हो....

हरित बागों में जब बैठा होता हूँ
और कोयल की कुक सुनाई पड़ती है
तो तुम याद आती हो....

और अंततः जब पुरे दिन की
भाग दौर से थक जाता हूँ
तो तुम याद आती हो....