जिंदगी की राहें

जिंदगी की राहें

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Friday, March 2, 2012

शेर सुनाऊं...



















कब और कैसे शेर सुनाऊं!!


हो जाये भोर, छिटके हरीतिमा

...तो शेर सुनाऊं!!

गरम चाय का कप

सुबह सुबह जबरदस्ती उठाना...

तो कैसे शेर सुनाऊं!!

बच्चो कि तैयारी

प्यारी की फुहारी..

तब शेर कैसे सुनाऊं!!

टूथ ब्रश, सेविंग ब्रश, जूते का ब्रश

सबको है जल्दी...

कैसे शेर सुनाऊं!!

आफिस के लिए हो रहा लेट

करना है नाश्ता...

कैसे शेर सुनाऊं!!

सामने पड़ी है फाइलें

काम का बोझ

किस तरह शेर सुनाऊं !!

दिमाग में चल रहे हैं

छत्तीस काम

कहाँ से शेर लाऊं !!

हो गयी शाम

पहुंचे घर

बच्चो की फरमाइश

दब गयी शेर...

अब शेर कैसे सुनाऊं!!

सब्जी, दूध, राशन

पर्स में पैसे

आमदनी अट्ठन्नी

खर्चा रुपैया

शेर हो गया ग़ुम.

कैसे शेर सुनाऊं !!

हो गयी रात

प्रिये के बंधन में

आने लगी नींद..

खिलने लगे खबाब

ऐ!!!

कानो में प्यार के बोल

क्या? प्यार से शेर बुदबुदाऊं........!!!!
 

Monday, February 13, 2012

"यूटोपिया" ............


सबसे पहले तो HAPPY ST. VALENTINE'S DAY!! इस प्यार महोत्सव पर मैंने कुछ शब्दों जो जोड़ा है... उम्मीद करता हूँ पसंद करेंगे...:)
और हाँ! मेरे FOLLOWERS की संख्या पिछले दिनों 200 को पार कर कर गयी, अच्छा  लगता है आप सबों से इतना प्यार पा कर... धन्यवाद् !!!

प्यार-मोहब्बत
नजदीकियां-अपनापन
जान-दिलबर-महबूबा
LIKE YOU- LOVE YOU

सिर्फ तुम - मेरी जिंदगी
ऐसे खुबसूरत शब्दों से
भरी पड़ी है दुनिया
जिसको इन खुली आँखों ने
किया अनुभव
...................!!!!

पर,
इन वास्तविक दृश्यों
को अनुभव करने के लिए
खोला दिल का दरवाजा
तो इन्ही शब्दों के साथ दिखा
दर्द-विषाद
वितृष्णा-दुराव
परेशानी-तनाव
छेड़खानी-बदतमीजी
HATE YOU - KILL YOU
जैसे भाव...!!
.

इतना अंतर..???
अंतर नहीं..

एक सिक्के के दो पहलू
प्यार जिससे है ..

उसी से तो होगी तकरार
भाव के सारे रंग उसपर ही तो बिखरेंगे
ये क्यूँ नहीं समझ पाता दिल
दिल के दरवाज़ों को खोलने से पहले
अपेक्षाओं को अम्बार में आंखें बंद कर
हकीकत से पीठ फेर कर .
....सपने देखता है
सपने पूरे तब होंगे न
....जब समझदारी के छींटे डाल कर
जागते हुए उन्हें जियेगा ..
मिलेगा तभी..प्यार का नजराना
खुशियों का छुपा खज़ाना ..
फिर बच के जायेगा कहाँ
"यूटोपिया" ............


Friday, January 20, 2012

''आभासी मैं''


चेहरे पे ब्रश से फैलाता


शेविंग क्रीम..

तेजी से चलता हाथ

आफिस जाने के जल्दी

सामने आईने में

दिखता अक्स...

ओह !!

आज अनायास

टकरा गयीं नज़रें

दिखे ..दो चेहरे..

शुरू होगई

आपस में बात

एक तो ''मैं'' ही था

और..!!!

एक ''आभासी मैं''...!!

.

मैंने कहा

आधी से ज्यादा जिंदगी गयी बीत...

वो बोला...

हुंह! अभी आधी जिंदगी पड़ी है मित्र...

मैंने कहा..

.....तो क्या हुआ? क्या कर लिया?

क्या कर पाउँगा..?

उत्सुकता से पूछा उसने ..

बहुत जल्दी है तुम्हें...??

क्या नहीं कर पाया? सिर्फ ये तो बता?

पढ़ लिया उसने

मेरे चेहरे पर

मेरा जवाब..और हताशा भी

मुझे खुद से थी बहुत सी उम्मीदें...

थे खालिस अपने सपने..

जुडी..थी जिनसे अपनों की उम्मीदें..

कहीं खोती चली गए...

जिंदगी के दोराहें में.....



वो हंसा... बेवकूफ इंसान!!

सपने, उम्मीदें, आवश्यकता,...

पूरे होने का नहीं होता पैमाना..

होती है सिर्फ सुन्तुष्टि

होती है सिर्फ खुशियों की महक..

आँखे बंद कर के सोच

फिर होगा अनुभव

कितना कुछ पाया..

क्या शाम को घर पहुचते ही

नहीं करती स्वागत

कुछ चमचमाहट भरी आँखे..(

क्या कभी किसी मित्र ने

तुम्हें देख, फेरा चेहरा..??

नहीं न..........

ऐसी थी उम्मीद कभी?

यही तुने पाया .

कम है क्या??

खुश रहना सीख..



अब तक कट चुकी थी दाढ़ी

''आभासी मैं'' से

फिर मिलने का वादा ..

आईने में दिखा

अपने ही अक्स में

कुछ नया सा..अनोखा आकर्षण

थोड़ी ज्यादा चमक..

थोडा ज्यादा विश्वास

क्योंकि आभासी चेहरे ने

आईने के ओट से..

मुझे दिखा दी थी

मेरी ही अपरमित क्षमताओं की पोटली

और जगा दी थी मुझमें

फिर से उम्मीद

बहुत सारे उम्मीद...
 

Tuesday, January 3, 2012

हाथ की लकीरें


























ये  हाथ की लकीरें
छपी होती है 
मकड़े के जालों जैसी 
हथेली पर 
जिसमे  रेखाएं
होती है अहम्
जिनके मायने 
होतें हैं ..हर बार
अलग अलग
एक छोटा सा क्रास 
एक नन्हा सा  तारा
बदल देता है 
उनके अर्थ
या फिर
लकीरों का
मोटापा या दुबलापन
भी बढ़ा देती है 
हमारी परेशानी

चन्द्र बुध
शुक्र बृहस्पति
जैसे ग्रहों को
इन जालों में समेटे 
हम लड़ते हैं ..
ढूंढते हैं खुशियाँ
इन लकीरों में ही 
कभी चमकता दिखता 
भाग्योदय
तो कभी ..प्रकोप
शनि दशा का !!!!!!
और हम  
रह जाते हैं...
मकड़े की तरह
फंसे इन लकीरों में..
इन जालों की तरह
उकेरी  हुए लकीरों 
को अपने वश में 
करने हेतु 
हम करते हैं धारण
लाल हरे पीले
चमकदार
महंगे-सस्ते  पत्थर
अपनी औकात को देखते हुए 
बंध के
रह जाते हैं..
पर..किन्तु परन्तु में
हो जाते हैं 
लकीर के फ़कीर


वहीँ जिसने ढूढी
एक और राह ..
तो फिर 
जहाँ चाह वहीँ राह..
इन लकीरों से 
भरी हथेलियों को
भींच लिया 
मुठी में 
एक इमानदार 
 कोशिश ..बस इतना ही 
शायद बन जाय शहंशाह 
तकदीर से ऊपर 
उठ कर 
मेहनत का बादशाह..........!!!!




Tuesday, November 22, 2011

एक टुकड़ा आसमान






















छत की मुंडेर पर बैठा
निहार रहा था
सुबह का नीला आसमान
मन था उद्विग्न 
चित था अशांत
....थी ढेरों परेशानियाँ
घेरे हुए थे लाखो प्रश्न
क्या करूँ, क्या न करूँ
कब करूँ, क्यूं करूँ
करूँ तो कैसे
ये, वो, जो, तो.............????


दिल में हुक सी उठी 
निकली हलकी सी आवाज
कब तक
कब तक करूँ संघर्ष
कब तक गुजरूँ
इस संघर्ष की राह पर..
कब पहुचेंगे वहां
जहाँ तक है चाह......

कब इस विशाल 
आकाश के 
एक अंश
एक कतरे 
......पर होगा
अपना हक़
कब होगा अपना
एक टुकड़ा आसमान
खुद का आसमान..
खुद का वजूद....................


तभी दिखा
एक उड़ता
फडफडाता हुआ
कबूतर.....
जो पास से उड़ कर
पहुँच गया बहुत दूर..
लगा जैसे 
जहाँ चाह वहां राह...
जैसे सारा 
जहाँ हो उसकी ...
बिना किसी सीमा के 

अचानक
सुबह की तीखी होती धूप ने
लगाया सोच पर विराम
फिर शुरू होगया
रोज़ का खेला
वही पुराना झमेला
उतर आया में मुंडेर से
... झटक आया अपनी सोच
और ले आया साथ.
....कबूतर के ओट से
उमीदों भरा एक टुकड़ा आसमान!!

क्योंकि कबूतर के फडफाड़ते पंखो पर
उम्मीदों कि ऊँची उड़ान
मुझे दे गया अपने हिस्से का 
एक टुकड़ा आसमान
आज खबाबों में..
शायद कल 
होगा इरादों में......
और फिर 
वजूद होगा मेरा....
मेरे हिस्से का आसमान..




Friday, October 21, 2011

पता नहीं क्यूं??




पता नहीं क्यूं??
अपने बच्चो को
सिखाता हूँ सच कहना..
पर कल ही..
उनसे झूठ कहलवाया
कह दो अंकल को
पापा ! घर पर नहीं हैं.........

पता नहीं क्यूं??
पति - पत्नी के रिश्तो पर..
मैं उससे रखता हूँ
उम्मीद - विश्वास कि.....
पर उस दिन ही
मेरी खुद नजर
नहीं बद-नजर..
थी एक लावण्या पर  ....

पता नहीं क्यूं??
माँ- पापा को रहती है
मुझ से उम्मीद..
और क्यूँ ना हो
मै हूँ उनका सपूत
पर कल ही मम्मी ने
फ़ोन पे कहा..कुछ ना उम्मीदी से
"भूल गया न तू!!"

पता नहीं क्यूं??
भ्रष्टाचार दूर करने के
मुद्दे पर, चढ़ जाती है
मेरी त्योरियां
पर पहचानता हूँ क्या
मैं खुद की ईमानदारी ?

पता नहीं क्यूं?
इतना सब हो कर भी
लगता है मुझे
एक आम इंसान
शायद होता है
मेरे जैसा ही ..
क्या ये सच है????

वक़्त के सांचे में
खुद को ढाल
अपनी ही कमजोरियों
के साथ
खुद को बेबस मान
हम को सबके साथ
बस यूँ ही जीना है  .....




Wednesday, September 28, 2011

अनायास ही .........





कागज में कलम घसीटी..
कि अनायास ही ..
कलम से मुड़ा तुड़ा सा 
एक शब्द
उकेरित हो उठा...
अनायास ही वो याद !
चेहरे पे एक हलकी सी 
ला गयी..सिहरन....
अनायास ही लगा
एक तरुणी......
जो सामने है बैठी..
और एक दम से 
कह उठी......
कैसे हो????
अनायास ही उमड़ 
आई कुछ स्मृतियाँ..
नदियों के लहरों
के उद्वेग की तरह...
जो अनायास
की कह उठी..
"आखिर
भूल ही गए न..."
पर फिर भी 
अनायास ही 
चेहरे पे आ ही गयी
एक मुस्कराहट
जो धीरे से चेहरे से
गुजरती हुई
कानों में कह गयी...
जो होता है 
अच्छा होता है !
और वही 
शायद 
मंजूरे खुदा होता है.....!!!!!!